श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पारकीया रति ही परमा रति है, ऐसा कहते हुए श्रीरूप गोस्वामीने आलङ्कारिक भरतमुनिके वाक्यको उद्धृत किया है (उःनीः १/२०)— “बहु वार्यते यतः खलु यत्र प्रच्छन्नकामुकत्वं च। या च मिथो दुर्लभता सा मन्मथस्य परमा रतिः॥” अर्थात् “जिस रतिमें समाजगत और धर्मगत बहुत प्रकारके निवारण अर्थात् बाधाएँ रहती हैं, जिस रतिमें परस्पर प्रच्छन्न कामुकता होती है तथा परस्परके दर्शन, स्पर्शन और सम्भाषणके विषयमें भी दुर्लभता रहती है, उसीको कामकी श्रेष्ठ और परम शोभामयी रति (रमणीय या क्रिया) समझना चाहिये।” (उःनीः १/२१)— “लघुत्वमत्र यत्प्रोक्तं तत्तु प्राकृतनायके। न कृष्णे रसनिर्यास्स्वादार्थमवतारिणि॥” अर्थात् “किन्तु इस उपपतिभावकी जो लघुता बतलायी गयी है, वह केवल प्राकृत नायकोंके सम्बन्धमें ही प्रयोज्य है, स्वराट् लीला-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं। क्योंकि वे स्वयं-अवतारी हैं और मधुररस आस्वादनके लिये ही उनका अवतार हुआ है।” ‘पर’ शब्दसे एकमात्र श्रीकृष्णको ही समझना चाहिये। श्रीकृष्ण सम्बन्धीय वस्तु ही ‘पारकीय’ है। और श्रीकृष्ण ही जिस स्थानपर एकमात्र नायक हैं, उस स्थानपर परकीयताको कभी भी घृणास्पद अथवा व्यभिचार कहकर ग्रहण नहीं किया जा सकता। सामान्य कोई जीव जब ‘नायक’ पदवीको प्राप्त होता है, तब विषयके बहुत्व होनेके कारण धर्म और अधर्मका विचार आता है। गोलोकविहारी श्रीकृष्णचन्द्र जब अपने पर-रसको प्रपञ्चमें गोकुलके साथ लेकर आते हैं, तब गोपियोंके सम्बन्धमें जड़ालङ्कारगत अक्षज-विचारका वहाँ कोई स्थान नहीं होता है। श्रीउज्ज्वलनीलमणि ग्रन्थ (३/३२)में श्रीलरूपगोस्वामीपादने लिखा है— “मायाकलिततादृक्स्त्रीशीलनेनानसूयुभिः । न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः॥” अर्थात् “प्रकटलीलामें व्रजगोपियोंके पतिका अभिमान रखनेवाले केवल उन-उन भावोंके माया अवतार मात्र हैं। गान्धर्व-विवाहादि मायिक धारणामात्र है। मायाकल्पित विवाहित पतिका अभिमान रखनेवालोंके साथ श्रीकृष्ण-स्वरूपशक्ति व्रजगोपियोंका कभी भी मिलन नहीं होता है। वस्तुतः एकमात्र शक्तिमान् विग्रहकी स्वरूपगत शक्ति गोपियोंका अन्यत्र स्वरूपतः विवाह नहीं हैं, उनका उपपतित्व अथवा परदारत्व नहीं है।” तथापि परोढ़त्व अभिमान नित्य वर्तमान है। ऐसा ना होनेपर अपूर्व रसोदयका प्राकट्य कभी भी स्वभावतः नहीं होता। रसज्ञ व्यक्ति ही इस बातको अनुभव कर सकते है। दूसरे लोगोंके पक्षमें आलोचना प्रसार निष्प्रयोजनीय है। चित्शक्ति योगमाया गोलोकस्थ नित्य-मूल-स्वरूप परोढ़ा-अभिमानको श्रीकृष्णकी नित्य-स्वरूपशक्तियों (गोपियों) के साथ-साथ व्रजमें लाकर उस-उस अभिमानको पृथक् सत्तारूपमें (पतिरूपमें) स्थित करती है। उनके साथ गोपियोंका विवाह सम्पादन कराके श्रीकृष्णको नश्वर विषय-भोक्ता पतिके स्थानपर नित्यपति निर्देश करके योगमाया श्रीकृष्णको उनके नित्य अनुरागका विषय कहती हैं। सर्वज्ञ पुरुष श्रीकृष्ण और उनकी
चौथा अध्याय | १७१
[ ४/४६-५० सर्वज्ञा स्वरूपशक्तियाँ योगमायाके द्वारा अपने-अपने रसके आवेशमें उस-उस प्रत्ययको स्वीकार करते हैं; इससे रसका उत्कर्ष और स्वेच्छामय लीला-पुरुषोत्तमकी इच्छाशक्तिका परमोत्कर्ष लक्षित होता है। इस प्रकार उत्कर्ष वैकुण्ठ या द्वारकामें नहीं होता है। उज्ज्वलरसमें नायकचूड़ामणि श्रीकृष्ण ही विषयालम्बन अथवा नायक हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त श्रीकृष्णके राम-नृसिंहादि अवतार अथवा नारायण उज्ज्वल रसके नायक नहीं हो सकते। श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति गोपियाँ 'पर' अर्थात् परमपुरुष श्रीकृष्ण सम्बन्धी हैं। अद्वितीय भोक्ता श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कोई भी उनका भोक्ता नहीं हो सकता। योगमायाके प्रभावसे अभिमन्यु आदि मायाकल्पित अवतारगण उन सब गोपियोंमें अपनी विवाहिता पत्नीका अभिमान करते हैं। अभिमन्यु आदि कृष्णेतर-तत्त्वकी वञ्चना करना ही व्रजगोपियोंकी जड़-भोगरत कृष्णसेवाविमुख पतियोंकी वञ्चना है। इसलिये इस प्रकारके पतियोंकी वञ्चना करके एकमात्र पति श्रीकृष्णके सुखतात्पर्यका विधान करना ही व्रजगोपियोंकी पारकीयत्व अथवा श्रीकृष्ण-सम्बन्धमें नित्य अवस्थिति है। इसलिये गोलोकके पारकीय और स्वकीय रसका अचिन्त्य-भेदाभेद सम्बन्ध है। वहाँ पारकीय-सार जो स्वकीय-निवृत्ति है और जो स्वकीय-सार जो पारकीय-निवृत्तिरूप स्वरूपशक्ति-रमण है, दोनोंमें एक रस होकर दोनों वैचित्रताके आधाररूपमें विराजमान है। श्रीकृष्णमें धर्म-अधर्मशून्य पतित्व और उपपतित्व शुद्ध निर्मल रूपमें युगपत् अवस्थित है॥४६॥ इनमेंसे परकीय-भावका श्रीकृष्णप्रीतिका सर्वाधिक्य और केवलमात्र व्रजमें ही इसका अधिष्ठान :- परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास॥४७॥ व्रजललनाओंमें पारकीय-भावका नित्यावस्थान और श्रीराधामें उसकी पराकाष्ठा :- व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥४८॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्य्यरस-आस्वाद-कारण॥४९॥ श्रीराधाका भाव अङ्गीकार करके श्रीगौररूपमें अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :- अतएव सेइ भाव अङ्गीकार करि' । साधिलेन निजवाञ्छा गौराङ्ग-श्रीहरि॥५०॥ अनुवाद-परकीया भावमें रसका अत्यन्त उल्लास होता है और व्रजके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी इसका वास नहीं है। व्रजवधुओंमें यह भाव सब समय रहता है और उनमें श्रीराधामें इस भावकी चरमसीमा-मादनाख्या महाभाव तक है। उनका श्रीकृष्णैकसुख-तात्पर्यमय परिपक्व निर्मलभाव ही सर्वोत्तम प्रेम है और यही प्रेम श्रीकृष्णके द्वारा माधुर्यरसके आस्वादनका कारण है। इसलिये उसी भावको अङ्गीकार करके गौराङ्ग श्रीहरिने अपनी इच्छाएँ पूर्ण कीं॥४७-५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्य तीन रसोंसे शृङ्गार रसकी माधुरी अधिक होनेके कारण उसको 'मधुररस' कहा जाता है। वह मधुररस दो प्रकारका होता है-स्वकीय और पारकीय। श्रीकृष्णको १७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
विवाहित पति रूपमें ग्रहण करनेसे जो मधुररस उदित होता है, उसे स्वकीय-मधुररस कहते हैं। श्रीकृष्णको उपपति माननेसे जो मधुररस उदित होता है, उसे पारकीय-मधुररस कहा जाता है। मधुररस विचारकोंका यही एकमत है कि पारकीयभावमें मधुररसमें उल्लास अधिक है और व्रजके अतिरिक्त और यह भाव कहीं भी नहीं है। अनेक लोग ऐसा सोचते हैं कि श्रीकृष्ण तो गोलोकमें नित्य विहार करते हैं और उन्होंने केवल अल्प समयके लिये व्रजमें प्रकट होकर इस पारकीय-भावमें लीला की थी। हमारे पूर्व आचार्य गोस्वामियोंका यह मत नहीं है। उनके मतानुसार व्रजविहार भी नित्य है। नित्य चिन्मयधाम गोलोकके अति-अन्तरङ्ग प्रकोष्ठका नाम ही 'व्रज' है। जिस प्रकार प्रपञ्चावतारमें श्रीकृष्णकी लीलाएँ हुई हैं, नित्यधाम व्रजमें भी उसी प्रकार लीलाएँ नित्य विराजमान हैं। व्रजमें पारकीय रसका नित्य अवस्थान है। कविराज गोस्वामीने तीसरे अध्यायमें कहा है— “अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे। ब्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे॥” 'व्रजेर सहिते'- इस शब्दसे स्पष्ट रूपसे समझा जाता है कि चिन्मयधाममें 'व्रज' एक अचिन्त्य लीलीस्थली है, उसी लीलास्थलीके साथ श्रीकृष्ण अपनी चित्शक्तिबलसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण हुए थे। गोलोकके अन्तःपुर उस नित्य व्रजके अतिरिक्त पारकीय रसकी अन्यत्र स्थिति नहीं है, क्योंकि वहाँपर गोलोककी अपेक्षा अनन्तगुणा श्रेष्ठ रसका अवस्थान है। प्रकटव्रजमें अप्रकटव्रजकी विचित्रता जीवकी आँखोंके समक्ष दिखलायी देती है, दोनोंमें यही मात्र अन्तर है। व्रजवधुओंके भावकी अवधि अर्थात् अन्तिम सीमा श्रीराधामें हैं। परिपक्व विमलभावरूप श्रीराधाका व्रजगत-प्रेम ही सर्वोत्तम है। श्रीकृष्णके माधुर्यरसका जहाँतक आस्वादन सम्भव है, उसकी प्राप्ति ही इस प्रेमका कारण है। इसलिये उस भावको अङ्गीकार करके गौराङ्ग-श्रीहरिने अपनी इच्छाएँ पूर्ण की॥४६-५०॥ स्तवमाला प्रथम चैतन्याष्टकमें (२)- सुरेशानां दुर्गं गतिरतिशयैनोपनिषदां मुनीनां सर्वस्वं प्रणतपटलीनां मधुरिमा। विनिर्यांसः प्रेम्णो निखिलपशुपालाम्बुजदृशां स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥५१॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवताओंके लिये दुर्गम, उपनिषदोंके लिये कष्टगम्य, मुनियोंके सर्वस्व, शरणागत भक्तोंकी मधुरिमा, व्रजयुवतियोंके नयनोंके लिये प्रेमकी सार-वस्तु स्वरूप, वे चैतन्यचन्द्र क्या पुनः मेरे दृष्टिगोचर होंगे?॥५१॥ अनुभाष्य-सुरेशानां (महेन्द्रादीनां) दुर्गं (दुरधिगम्यः आश्रयः), उपनिषदं (वेदशिरोभागानाम्) अतिशयेन गतिः (लक्ष्यं), मुनीनां सर्वस्वं (जड़निर्विज्ञानां एकमात्रधनं), प्रणतपटलीनां (भक्तसमूहानां) मधुरिमा (सौन्दर्याश्रयः) निखिलपशुपालाम्बुजदृशां (समस्तव्रजवनितानां) प्रेम्णः विनिर्यांसः (सारः) स चैतन्यः पुनः अपि किं मे दृशोः पदं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद-इन्द्रादि देवताओंके आश्रय, वेदोंके श्रेष्ठ भाग उपनिषदोंके प्रमुख लक्ष्य, जड़ासक्तिरहित मुनियोंका एकमात्र धन, भक्तोंके लिये सौन्दर्यके आश्रय और समस्त गोपियोंके प्रेमके सार, वे श्रीचैतन्यचन्द्र क्या पुनः मेरे दृष्टिपथपर प्राप्त होंगे ? ॥५१॥ चौथा अध्याय | १७३
[ ४/५२-५४ स्तवमाला द्वितीय चैतन्याष्टकमें (३)— अपारं कस्यापि प्रणयिजनवृन्दस्य कुतुकी रसस्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तु रुचं स्वामावव्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कौतुकी श्रीकृष्ण अपने प्रेमीजनोंके रसोंको आस्वादन करते हुए अपार (असीम) किसी एक प्रकारके मधुररसविशेषको भोग करनेके उद्देश्यसे अपने वर्णको गोपन करके श्रीराधाकी द्युति स्वीकारकर चैतन्याकृतिमें प्रकट हुए हैं, वे मेरे ऊपर विशेष कृपा करें॥५२॥ अनुभाष्य—कुतुकी (भावास्वादानन्दः) यः कस्य अपि प्रणयिजनवृन्दस्य (निजप्रीतिविग्रहस्य) कमपि [अनिर्वचनीयम्] अपारं मधुरं रसस्तोमं हृत्वा उपभोक्तुं (स्वयं तद्भावग्रहणेन आस्वादयितुं) तदीयां (तत्प्रणयिजनसम्बन्धिनीं) द्युतिं (शोभां) प्रकटयन् (प्रकाशयन्) स्वां (स्वकीयां घनश्यामरूपां द्युतिं ) आवव्रे (आवृतवान्) सः चैतन्याकृतिर्देवः (गोपीजनवल्लभः) नः (अस्मान्) अतितरां कृपयतु। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५२॥ भावग्रहणेर हेतु करिल धर्म स्थापन। तार मुख्य हेतु कहि, शुन सर्वजन॥५३॥ मूल हेतु आगे श्लोकेर कैल आभास। एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ प्रकाश॥५४॥ अनुवाद—भावग्रहण ही वह मुख्य कारण जिसके लिये भगवान्ने अवतार लिया और युगधर्मकी स्थापना की। सभी लोग सुनो! अब उस मुख्य कारणको विस्तारसे कहूँगा। मैंने पूर्व श्लोकमें महाप्रभुके अवतारके मूल कारणका केवल आभास दिया, अब उसी श्लोकका वास्तविक अर्थ प्रकाश कर रहा हूँ॥५३-५४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीचैतन्य महाप्रभु] श्रीराधाका भावग्रहणके आशयसे धर्मस्थापनके कार्यमें प्रवृत्त हुए थे। उस कार्यका जो मुख्य प्रयोजन है, वह अब वर्णन कर रहा हूँ। मूल कारणको बतलानेके लिये श्लोकके आभासका अभी तक वर्णन किया है॥५३-५४॥ अनुभाष्य—इन चार पंक्तियोंके स्थानपर किसी-किसी संस्करणमें ये छह पंक्तियाँ दिखायी देती हैं— “भावग्रहणेर हेतु करिल धर्मस्थापन। मूलहेतु आगे श्लोकेर करिब विवरण॥ भावग्रहणेर एइ शुनह प्रकार। ताहा लागि पञ्चम श्लोकेर करिये विचार॥ एइ त' पञ्चम श्लोकेर कहिल आभास। एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ परकाश॥”५३-५४॥ १७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/५५-५७ ] आदि चौदह श्लोकोंमें पाँचवें श्लोककी व्याख्या :- श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चासे- राधा कृष्णप्रणयविकृतिर्ह्लादिनीशक्तिरस्मा- देकात्मानावपि भुवि पुरा देहभेदं गतौ तौ। चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्द्वयञ्चैक्यमाप्तं राधाभावद्युतिसुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम् ॥५५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रणय-विकृतिरूप ह्लादिनीशक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण स्वरूपतः एकात्मक होनेपर भी विलासतत्त्वकी नित्यताके कारण श्रीराधा-कृष्ण नित्यरूपसे दो स्वरूपोंमें विराजमान हैं। वही दो तत्त्व अब एक स्वरूपमें चैतन्य-तत्त्वरूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये श्रीराधाकी भाव और कान्तिके द्वारा सुवलित उन्हीं श्रीकृष्णस्वरूप गौरसुन्दरको मैं प्रणाम करता हूँ॥५५॥ अनुभाष्य-राधा कृष्णप्रणयविकृतिः (कृष्णस्य प्रणयविकृतिः प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिः); एकात्मानौ (अभित्रात्मानौ) अपि पुरा (अनादिकालत:) तौ (राधाकृष्णौ) भुवि देहभेदं (विषयाश्रयगत-विग्रहद्वयभेदं) गतौ (प्राप्तौ)। अधुना (इदानीं) तद्द्वयं (तयोर्द्वयं) ऐक्यम् आप्तम्; राधाभावद्युतिसुवलितं (भावश्च द्युतिश्च भावद्युती, राधायाः भावद्युती, ताभ्यां सुवलितं युक्तम्, अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं) चैतन्याख्यां प्रकटं (प्रकटितविग्रहं) कृष्णस्वरूपं नौमि (प्रणमामि)। श्लोक-भावानुवाद-राधा कृष्णके प्रणयकी विकार अर्थात् प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण अभिन्न आत्मा होते हुए भी अनादिकालसे विषय और आश्रय-इन दो विग्रहोंके भेदको प्राप्त हुए थे। अब वे दोनों एक रूप हुए हैं। राधाजीके भाव और द्युति, इन दोनोंसे युक्त, अन्दर श्रीकृष्ण और बाहर श्रीगौरसुन्दर, श्रीकृष्णस्वरूप उन श्रीचैतन्य नामसे प्रकटित विग्रहको मैं प्रणाम करता हूँ॥५५॥ पहले श्रीराधा-कृष्णतत्त्व :- राधाकृष्ण एक आत्मा, दुइ देह धरि'। अन्योन्ये विलासे रस आस्वादन करि' ॥ ५६ ॥ अनुवाद-श्रीराधाकृष्ण एक आत्मा होनेपर भी दो शरीर धारण करके परस्पर विभिन्न प्रकारके विलासमैं रसास्वादन करते हैं॥५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'अन्योन्ये' - अर्थात् परस्परमें। इस पद्यका वाक्यार्थ स्पष्ट है, किन्तु भावार्थ गूढ़ हैं। राधाजी शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान् तत्त्व हैं। "शक्तिशक्तिमतोरभेदः"-इस वेदान्त-वाक्यका अर्थ यह है-किसी भी विचारसे शक्तिके आधारसे शक्तिको पृथक् नहीं किया जा सकता है। किन्तु अचिन्त्य-शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण परस्पर विलासके रसास्वादन करनेके लिये नित्य पृथक् होनेपर भी युगपत् (सब समय) एक ही हैं॥५६॥ राधागोविन्दका मिलित तनु गौर हैं :- सेइ दुइ एक एबे चैतन्य गोसाञि। भाव आस्वादिते दोँ हे हैला एक ठाँइ ॥ ५७ ॥ चौथा अध्याय | १७५
[ ४/५७-६० ] अनुवाद-वे दोनों अब मिलकर एक चैतन्य गोसाईं हुए हैं। भावके आस्वादनके लिये दोनों एक शरीर हुए हैं॥५७॥ अमृताणुकणिका-यदि कहें-रसास्वादनके लिये श्रीराधा-कृष्ण एक होनेपर भी इन दो रूपोंमें हुए और कुछ समय रसास्वादनके बाद श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें एक देह हुए हैं, तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इससे श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाका अनादित्व और नित्यत्व नहीं होगा। श्रीकृष्ण और श्रीराधा जैसे अनादिकालसे विद्यमान हैं, उनके मिलित विग्रह श्रीकृष्णचैतन्य भी अनादिकालसे विद्यमान हैं, कलियुगमें वे केवल इस प्रपञ्चमें प्रकटित हुए हैं। श्रीकृष्णचैतन्य श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं। श्रीकृष्णके सभी अविर्भाव अथवा स्वरूप नित्य और अनादिकालसे विद्यमान हैं॥५७॥ गौरतत्त्व-महिमा वर्णनके लिये राधागोविन्दकी प्रणय-व्याख्या :- इथि लागि' आगे करि ताहार विवरण। याहा हैते हय गौरेर महिमा-कथन ॥५८॥ अनुवाद-इसलिये पहले श्रीराधाकृष्णकी एकात्मताका वर्णन कर रहा हूँ, जिससे श्रीगौरचन्द्रकी महिमा प्रकाशित होगी॥५८॥ श्रीराधाका तत्त्व और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध :- राधिका हयेन कृष्णेर प्रणय-विकार। स्वरूपशक्ति-‘ह्लादिनी’ नाम याँहार॥५९॥ अनुवाद-श्रीमती राधिका श्रीकृष्णके प्रणयका विकार हैं। वे श्रीकृष्णकी 'ह्लादिनी' नामक स्वरूपशक्ति हैं॥५९॥ ह्लादिनी-शक्तिका लक्षण :- ह्लादिनी कराय कृष्णे आनन्दास्वादन। ह्लादिनीर द्वारा करे भक्तेर पोषण॥६०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधाजी वास्तवमें श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति ह्लादिनी हैं। वे श्रीकृष्णको परमानन्दमें निमग्न करके रखती हैं, इसलिये उनका नाम ह्लादिनी है। और भी, वे श्रीकृष्णके चित्-विभिन्नांशरूप जीवोंके स्वरूपगत प्रेमपुष्टिकी क्रियाके द्वारा लक्षित होती हैं॥५९-६०॥ अनुभाष्य-श्रीजीवप्रभुने 'प्रीतिसन्दर्भ' (६५ संख्या) में लिखा है- “अथ श्रुतौ च-‘भक्तिरेवैनं नयति, भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषः, भक्तिरेव भूयसी' इति श्रूयते। तस्मादेवं विविच्यते-या चैवं भगवन्तं स्वानन्देन मदयति, सा किंलक्षणा स्यात्? इति। न तावत् सांख्यानामिव प्राकृतसत्त्वमय-मायिकानन्दरूपा, भगवतो मायानभिभाव्यत्वश्रुतेः, स्वतस्तृप्तत्वाच्च। न च निर्विशेषवादिनामिव भगवत्स्वरूपानन्दरूपा, अतिशयानुपपत्तेः। अतो नतरां जीवस्य स्वरूपानन्दरूपा, -अत्यन्तक्षुद्रत्वात् तस्य। ततो 'ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वय्येका सर्वसंश्रये। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥' इति श्रीविष्णुपुराणानुसारेण (१/१२/६९) ह्लादिन्याख्य-त्वदीयस्वरूपशक्त्यानन्द-रूपैवेत्यवशिष्यते, यया खलु भगवान् स्वरूपानन्दविशेषी भवति, ययैव तं तमानन्दमन्यानप्यनुभावयतीति। अथ तस्या अपि भगवति सदैव वर्त्तमानतयातिशयानुपपत्तेस्त्वेवं विवेचनीयं- श्रुताथान्यथानुपपत्त्यार्थापत्तिप्रमाणसिद्धत्वात्। तस्या ह्लादिन्या एव कापि सर्वानन्दातिशायिनी वृत्तिर्नित्यं १७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/६०-६१ ] भक्तवृन्देष्वेव निक्षिप्यमाणा भगवत्प्रीत्याख्यया वर्त्तते। अतस्तदनुभवेन श्रीभगवानपि श्रीमद्भक्तेषु प्रीत्यातिशयं भजत इति।” वेदोंमें भी यह वर्णित है कि भक्ति ही भक्तोंको भगवान्के निकट ले जाती है, भक्ति ही भक्तको भगवान्का दर्शन कराती है, भक्तिके द्वारा ही भगवान् वशीभूत होते हैं और वेदोंमें अधिकांश भक्तिका ही वर्णन है। इसलिये यह विचार करें कि जो वस्तुशक्ति भगवान्को अपने आनन्दके द्वारा उन्मत्त कराती है, उसके क्या लक्षण हैं? उसके उत्तरमें कह रहे हैं—सांख्यमतवादियोंके सिद्धान्तानुसार उस वस्तुशक्तिको कभी भी प्राकृत-सत्त्वगुणमयी मायिकी-आनन्दरूपा नहीं कह सकते। क्योंकि श्रुतियोंमें कहा गया है कि 'माया भगवान्का अतिक्रम नहीं कर सकती है' और 'भगवान् स्वयं तृप्त हैं', इसलिये स्वतः-तृप्त भगवान् मायाके गुणमें कभी भी आसक्त नहीं होते। उस वस्तुशक्तिको निर्विशेषवादियोंकी भाँति भगवत्स्वरूपानन्द भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह सिद्धान्त पूर्व और बादमें विचार करनेसे विशेषरूपसे असिद्ध है, क्योंकि भगवान् अपने स्वरूपानन्दकी अपेक्षा भक्त्यानन्दकी ही अधिक आकाङ्क्षा किया करते हैं। इसलिये वह जीवके स्वरूपानन्दरूपा भी नहीं है, क्योंकि जीव नित्य होनेपर भी अत्यन्त क्षुद्र है। वह भगवान्को वशीभूत नहीं कर सकता। इसलिये “हे भगवन्, सबके आश्रयस्वरूप आपमें केवल 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्' नामक तीन शक्तियाँ अवस्थित हैं। गुणातीत आपमें आह्लाद (सात्त्विक) और क्लेश (तामसिक) तथा मिश्रा (राजसिक) भाव नहीं है”—इस विष्णुपुराण-वाक्यसे उनकी ह्लादिनी-नामक स्वरूपशक्ति ही आनन्दस्वरूपा है, क्योंकि इसी शक्तिके द्वारा ही भगवत्-स्वरूपमें आनन्द विशेष लक्षित होता है और भगवान् इस शक्तिके द्वारा ही वैसा आनन्द अन्य भक्तोंको प्रदान करते हैं—यही चरम सिद्धान्त है। भगवान्में ह्लादिनीशक्ति नित्य विद्यमान रहनेके कारण निर्विशेषवादियोंका उक्त सिद्धान्त विशेषरूपसे परित्यज्य है। क्योंकि श्रुतिके अर्थसमूहकी अन्यरूप असङ्गति होनेपर फलान्तरकी आशङ्का होती है अर्थात् विष्णुपुराणका उक्त प्रमाण वेदके अर्थके साथ एक रूपमें सिद्ध है, इसलिये निर्विशेषवादियोंकी इस प्रकारकी उक्ति वेदोंके अर्थसे विपर्ययजनक (विपरीत) और वेदार्थ-तात्पर्यके विषयीभूत नहीं है। उस ह्लादिनी शक्तिकी ही सर्वानन्दातिशायिनी किसी एक वृत्तिको भक्तोंमें नित्य प्रदान करनेपर वह 'भगवत्-प्रीति' कहलाती है। श्रीभगवान् भी उस प्रीतिको भक्तमें अनुभव करके भक्तके प्रति अतिशय प्रीति प्रदर्शित करते हैं। विष्णुपुराणमें श्रीभगवान्में तीन प्रकारकी शक्तियोंका वर्णन है, जो शक्ति भगवान्के आनन्दका विधान करती है, वह सांख्यके जड़ानन्द अथवा निर्विशेषवादियोंके शक्ति-शक्तिमान्के पार्थक्यकी अनभिज्ञताके कारण केवल चिदेकानन्द नहीं है। ह्लादिनी शक्ति ही भगवान्को आनन्द प्रदान करती है और भगवान् ह्लादिनी शक्तिके द्वारा जीवको उनका अपने प्रति प्रेमधर्म प्रदान करते हैं तथा भक्तकी भगवत्-प्रीतिसे बाध्य होकर प्रीति पुष्ट करते हैं॥६०॥ एक ही शक्तिमान्की एक ही शक्तिके तीन रूप :- सच्चिदानन्द, पूर्ण, कृष्णेर स्वरूप। एकइ चिच्छक्ति ताँर, धरे तिन रूप॥६१॥ चौथा अध्याय | १७७
[ ४/६१-६२ अनुवाद—सच्चिदानन्द और स्वयंमें पूर्ण, यह श्रीकृष्णका स्वरूप है। उनकी चित्-शक्ति एक ही होकर तीन रूप धारण करती है॥६१॥ आनन्दांशे ह्लादिनी, सदंशे सन्धिनी। चिदंशे सम्वित्—यारे ज्ञान करि' मानि॥६२॥ अनुवाद—वह चित्-शक्ति आनन्द-अंशसे ह्लादिनी, सत्-अंशसे सन्धिनी और चित्-अंशसे सम्वित् जिसको ज्ञान भी कहा जाता है, इन तीन रूपोंको धारण करती है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्णतत्त्व श्रीकृष्ण सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। उनकी एक ही चित्-शक्ति पहले सत्-अंशसे सन्धिनी अर्थात् सत्ताका विस्तार करनेवाली है, चित्-अंशसे पूर्ण ज्ञानरूप सम्वित्तत्त्व अर्थात् श्रीकृष्णका स्वरूपतत्त्व है और आनन्द-अंशसे ह्लादिनी अर्थात् उसी स्वरूपतत्त्वको आह्लाद-प्रदान करनेवाली है॥६१-६२॥ अनुभाष्य—श्रीजीवप्रभु श्रीभगवत्-सन्दर्भमें (संख्या १०२) में कह रहे हैं— “सद्रूपत्वेन व्यपदिश्यमानो यया सत्तां दधति धारयति च सा सर्वदेश-काल-द्रव्यादि-प्राप्तिकरी सन्धिनी; तथा सम्विद्रूपोऽपि यया सम्वेत्ति सम्वेदयति च, सा सम्वित्; तथा ह्लादरूपोऽपि यया सम्विदुत्कर्षरूपया तं ह्लादं सम्वेत्ति सम्वेदयति च, सा ह्लादिनीति विवेचनीयम्। तदेवं तस्या मूलशक्तेस्त्रयात्मकत्वे सिद्धे येन स्वप्रकाशतालक्षणेन तद्वृत्तिविशेषेण स्वरूपं स्वयं स्वरूपशक्तिर्वा विशिष्टं वाविर्भवति तद्विशुद्धसत्त्वम्। तच्चान्य-निरपेक्षस्तत्प्रकाश इति ज्ञापनज्ञानवृत्तिकत्वात् सम्विदेव। अस्य मायया स्पर्शाभावात् विशुद्धत्वम्। यतश्च सत्त्वात् लोको वैकुण्ठाख्यः प्रकाशते। सत्त्व-शब्देन स्वप्रकाशता-लक्षण-स्वरूप-शक्तिवृत्तिविशेष उच्यते। प्रकृतिगुणः सत्त्व-मित्यशुद्धसत्त्व-लक्षणप्रसिद्धयनुसारेण तथाभूतश्विच्छक्तिविशेषः सत्त्वमिति सङ्गतिलाभात्। ततश्च तस्य स्वरूपशक्तिवृत्तित्वेन स्वरूपात्मतैवेत्युक्तम्। प्राकृताः सत्त्वादयो गुणा जीवस्यैव न त्वीशस्येति श्रूयते। यथैकादशे—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे’ इति। श्रीविष्णुपुराणे च—‘सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र न प्राकृता गुणाः। स शुद्धः सर्वशुद्धेभ्यः पुमानाद्यः प्रसीदतु॥’ अत्र प्राकृता इति विशिष्याप्राकृतास्त्वन्ये गुणास्तस्मिन् सन्त्येवेति व्यञ्जितम्। तथा च दशमे देवेन्द्रणोक्तम्—‘विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम्। मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहे न विद्यते ते ग्रहणानुबन्धः॥’ प्रकृतिगुणः सत्त्वं, गोचरस्य बहुरूपत्वे रजः, बहुरूपस्य तिरोहितत्वे तमः। तथा परस्परस्योदासीनत्वे सत्त्वम्; उपकारित्वे रजः; अपकारित्वे तमः। अत्र चेदमेव विशुद्धसत्त्वं सन्धिन्यंशप्रधानं चेदाधारशक्तिः; सम्विदंशप्रधानमात्मविद्या, ह्लादिनीसारांशप्रधानं गुह्यविद्या। युगपत् शक्तित्रयप्रधानं मूर्तिः। अत्राधारशक्त्या भगवद्धाम प्रकाशते।” (अर्थात्) “सत्-रूपसे प्रसिद्ध भगवान् जिस शक्तिके द्वारा सत्ताको धारण करते हैं और कराते हैं, वह समस्त देश-काल-द्रव्यादिको प्रकाशित करनेवाली ‘सन्धिनी’ शक्ति है; (उसी प्रकार सम्वित्-रूप होकर भी भगवान्) जिस शक्तिके द्वारा वे स्वयं जानते और दूसरोंको जनानेमें समर्थ होते हैं, वह ‘सम्वित्’ शक्ति है; (तथा आनन्दरूप होकर भी भगवान्) चित्-प्रधान जिस शक्तिके द्वारा वे स्वयं आनन्दको जानते हैं और दूसरोंको जनानेमें समर्थ होते हैं, उसको ‘ह्लादिनी’ शक्ति कहते हैं, ऐसा समझना होगा। इसलिये उस मूल पराशक्तिके तीन रूप सिद्ध हुए हैं; उसकी स्वतःप्रकाश लक्षणवाली जिस विशेष वृत्तिके द्वारा भगवान् स्वयं और उनकी स्वरूपशक्ति अथवा चित्-वैशिष्ट्यादिका आविर्भाव होता है, वही ‘विशुद्धसत्त्व’ है। वह किसी भी अन्यकी अपेक्षासे रहित और १७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/६२ ] भगवत्-प्रकाशस्वरूप है। स्वयं अनुभव करने और अन्योंको अनुभव करानेकी दो वृत्तियाँ विद्यमान रहनेके कारण वह सम्वित् भी है। मायाका स्पर्श नहीं रहनेके कारण वह विशुद्ध है। इस विशुद्धसत्त्वसे 'वैकुण्ठ' नामक धाम प्रकाशित होता है। स्वतःप्रकाशलक्षणमय भगवत्-स्वरूपशक्तिकी वृत्तिविशेषको 'विशुद्धसत्त्व' कहा जाता है। प्राकृत-सत्त्वका (रजः और तमः से मिश्रित होनेके कारण) अशुद्धता लक्षण प्रसिद्ध है, इसलिये शुद्धसत्त्व या सन्धिनी चित्शक्तिविशेष है। इस शुद्धसत्त्वको स्वरूपशक्तिकी वृत्ति कहनेसे यह भी स्वरूपशक्त्यात्मक है। श्रुति और स्मृतिमें कहा गया है कि प्राकृत सत्त्वादि गुणसमूह जीवोंके ही हैं, ईश्वरके नहीं हैं। जैसे एकादश स्कन्धमें भगवान्की उक्ति-“सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंका मुझसे विमुख जीवोंके साथ सम्बन्ध है, कभी भी मेरे साथ इनका कोई सम्बन्ध नहीं है।” विष्णुपुराणमें भी कहा गया है-“जिनमें अप्राकृत गुणसमूह विराजमान है, उन ईश्वरमें सत्त्वादि 'प्राकृत' गुण नहीं रहते हैं और रह भी नहीं सकते हैं; समस्त शुद्धवस्तुओंमें अमिश्रित शुद्धवस्तु आदिपुरुष भगवान् नारायण प्रसन्न हों।” यहाँपर 'प्राकृत' विशेषणके प्रयोगके द्वारा विशेषरूपसे यह दिखलाया जा रहा है कि भगवान्में प्राकृतसे भिन्न अप्राकृत गुणसमूह विद्यमान हैं। दशमस्कन्धमें देवराज इन्द्रकी उक्ति—“हे भगवन् ! आपका धाम विशुद्ध सत्त्वमय है, वह शान्त, तपस्यारूप सेवामय और रजो-तमो गुणोंसे रहित है; आप इन मायामय गुणप्रवाह और प्राकृत गुणोंको स्पर्श अथवा ग्रहण नहीं करते हैं।” अव्यक्तावस्थामें सत्त्वगुण; बाह्य अभिव्यक्ति और उत्पत्तिशील अनेक रूपोंके प्रकाशमें रजोगुण तथा अनेक रूपोंके प्रकाशके अभावमें तमोगुण वर्तमान है; अर्थात् तीनों गुण जिस स्थानपर परस्पर शिथिल या उदासीन हैं, वहाँपर सत्त्वगुण है; जिस स्थानपर कार्यकारिता या क्रियाशीलता है, उस स्थलपर रजोगुण है और जिस स्थानपर ध्वंस अथवा विनाशका भाव है, वहाँपर तमोगुण वर्तमान है। इस स्थानपर विशुद्धसत्त्व ही सन्धिनी-अंश प्रधान होनेपर आधारशक्ति, सम्वित्-अंश प्रधान होनेपर आत्मविद्या और ह्लादिनीशक्तिका सारांश प्रधान होनेपर गुह्यविद्या (प्रेमभक्ति) है। तीनों शक्तियाँ एक साथ प्रधान होनेपर उसे मूर्ति या विग्रह कहा जाता है। इस आधारशक्तिके द्वारा ही भगवद्धाम प्रकाशित होता है।” परतत्त्व-अर्थात् भगवान् वास्तव-वस्तुस्वरूप हैं और वे तीन शक्तियोंसे नित्य प्रकटित है। वे परतत्त्व इन चार रूपोंमें नित्य अवस्थान करते हैं- १) परा अचिन्त्य (अन्तरङ्गा) शक्तिसे वैकुण्ठादि स्वरूपवैभव रूपमें; २) तटस्था नामक शक्तिसे चिदेकात्म शुद्धजीव रूपमें; ३) बहिरङ्गा शक्तिसे जड़ात्म प्रधान रूपमें और ४) अपने पूर्णस्वरूपमें। स्वरूपशक्ति और तद्रूपवैभवशक्ति अन्तरङ्गा-शक्तिके स्वयंरूप और वैभव-प्रकाशके भेदसे दो प्रकारसे अवस्थित है। अङ्गीके आन्तरिक अङ्गमें जो शक्ति विराजमान है, उसे 'अन्तरङ्गा' कहते हैं। अन्तरङ्गा-शक्तिकी शक्तिमत्तासे स्वयंरूप भगवान् अपने वैकुण्ठादि स्वरूपवैभवको प्रकाश करते हैं। भगवान्के बाह्य अङ्ग- 'प्रधान' और जड़ीय पदार्थ हैं। यह बहिरङ्गा शक्ति प्राकृत चौथा अध्याय | १७९
[ ४/६२-६३ जगत्में ब्रह्मासे लेकर स्थावर-पत्थरादि बड़े-छोटे शरीरोंके द्वारा तटस्थाशक्तिसे प्रकटित जीवोंको आवृत करके अवस्थान करती है। स्वरूपशक्ति तीन विभागोंमें परिलक्षित होती है। उन तीनोंको अंशिनी स्वरूपशक्तिका अंश कहा जाता है। शक्तिकी नित्यता अथवा सत्-अंश अर्थात् जो कालके द्वारा क्षोभित नहीं होता, उसे सन्धिनी कहते हैं। ज्ञातृत्व अथवा चित्-अंश नित्य आनन्दसे विशेषरूपसे युक्त होकर अद्वयज्ञान 'सम्वित्' नामसे कहलाता है अर्थात् जिसके द्वारा श्रीकृष्णका स्वतःकर्त्तृत्व पूर्ण चिद्धर्मसे परिचित है, वही 'सम्वित्-शक्ति' के नामसे प्रसिद्ध है। अंशिनीके जिस अंशकी सत्-चित्से विशेषता है, वही आनन्दमयी शक्ति है। विशेषताके वर्णनसे शक्तिका तीन प्रकारसे परिचय होनेपर भी ये तीनों अंश स्वरूपशक्तिमें ही अवस्थित हैं। और भी, तटस्था एवं बहिरङ्गाशक्तिमें इन तीन शक्तियोंका विभिन्न अधिष्ठान परिलक्षित होता है। बहिरङ्गा शक्तिमें ये त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम) रूपमें और तटस्थाशक्तिके बद्धजीव-अंशमें इन तीन गुणोंकी क्रिया रूपमें एवं मुक्तजीव-अंशमें सच्चिदानन्दकी आश्रयजातीयकी सेवावृत्तिसे सेव्यके उपयोगी शक्त्यांश रूपमें विराजमान हैं॥६२॥ श्रीविष्णुपुराणमें (१/१२/६९) ध्रुवकी उक्ति- ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥६३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्! आप सभीके आश्रय और निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्', तीनों चिन्मय हैं। मायाके वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति 'ह्लादकारी', 'तापकरी' और 'मिश्रा'-इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती है॥६३॥ अनुभाष्य-[हे भगवन्!] एका (मुख्या अव्यभिचारिणी स्वरूपभूता शक्तिः) ह्लादिनी (आह्लादकारी) सन्धिनी (सन्तता) सम्वित् (विद्याशक्तिः) सर्वसंस्थितौ (सर्वेषां सम्यक् स्थितिय॑स्मात् तस्मिन् सर्वाधिष्ठानभूते) त्वयि एव [न तु जीवेषु। तत्र च या गुणमयी त्रिविधा सा त्वयि नास्ति]; ह्लादतापकरी मिश्रा (ह्लादकरी मनःप्रसादोत्था सात्त्विकी, विषयवियोगादिषु तापकरी तामसी, तदुभयमिश्रा विषयजन्या राजसी) गुणवर्जिते (प्राकृत-सत्त्वादिगुणैः वर्जिते) त्वयि (भगवति) न [परन्तु जीवेषु एव। अत्र क्रमादुत्कर्षेण सन्धिनीसम्वित्ह्लादिन्यो ज्ञेयाः]। श्लोक-भावानुवाद-हे भगवन्! एक ही मुख्य अमिश्रित स्वरूपभूता शक्तिके अन्तर्गत ह्लादिनी-सन्धिनी-सम्वित्के अधिष्ठानरूप आप ही हैं, वह जीवोंमें नहीं है। जीवोंमें जो तीन गुणोंवाली अर्थात् मनकी प्रसन्नतासे उत्पन्न सुखप्रद सात्त्विकी, विषयोंके वियोगसे कष्ट प्रदान करनेवाली तामसी और इन दोनोंकी मिश्रित राजसिक माया है, वह प्राकृत सत्त्वादि गुणोंसे रहित आप भगवान्में नहीं है। यहाँ सन्धिनी, सम्वित् और ह्लादिनीको क्रमसे श्रेष्ठतर जानना चाहिये। इस श्लोककी और भागवत (१/७/६) श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीने श्रीविष्णुस्वामिके 'सर्वज्ञसूक्त'से यह श्लोक उद्धृत किया है-'ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः। १८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/६३-६६ ] स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः॥' अर्थात् सच्चिदानन्द ईश्वर ह्लादिनी और सम्वित्-इन स्वरूपशक्तिके द्वारा आश्लिष्ट हैं, परन्तु जीव अविद्यासे ढका है, इसलिये क्लेशोंकी निधिका मूल है॥६३॥ सन्धिनीकी भगवान् और उनके सेवोपकरण-प्राकट्य विधानरूप सेवा :- सन्धिनी सार अंश—'शुद्धसत्त्व' नाम। भगवानेर सत्ता हय याहाते विश्राम॥६४॥ अनुवाद—सन्धिनीके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है, जिसमें भगवान्की सत्ता विश्राम ग्रहण करती है॥६४॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके माता-पिता, धाम-गृहादि सभी शुद्धसत्त्वकी परिणति हैं। परिणत शुद्धसत्त्वमें भगवान्का स्वरूप शुद्धसत्त्वात्मकरूपसे परिदृष्ट होता है। श्रीकृष्णका मूल स्थल जो शुद्धसत्त्व है, उसमें श्रीकृष्णकी उत्पत्तिका स्वरूप दिखलायी देनेपर भी श्रीकृष्ण वसुदेवात्मक शुद्धसत्त्वमात्र नहीं हैं, वे अद्वयज्ञान सम्वित्-सार भगवत्-ज्ञानके नित्य अधिष्ठाता देवता हैं। आश्रयजातीय कृष्णसम्बन्धी सभी वस्तुएँ शुद्धसत्त्वात्मक हैं और सेवोन्मुखचित्तसे उनसे श्रीकृष्णका सम्बन्ध देखा जा सकता है; वास्तवमें भगवान् चित्स्वरूप ही हैं॥६४॥ माता, पिता, स्थान, गृह, शय्यासन आर। एसब कृष्णेर शुद्धसत्त्वेर विकार॥६५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके माता-पिता, स्थान (धाम), गृह और शय्या-आसन-ये सब श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार हैं॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्ताविस्तारिणी सन्धिनीशक्तिके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है। सत्त्व दो प्रकारके हैं—मिश्रसत्त्व और शुद्धसत्त्व। वस्तुसत्ताका ही नाम 'सत्त्व' है। सन्धिनीकी क्रियाके बिना कोई भी सत्त्व हो नहीं सकता अर्थात् किसीकी सत्ता नहीं हो सकती। भगवान्की सत्ताका प्रकाश भी सन्धिनीका कार्य है। शुद्धचित्-तत्त्वमें सन्धिनीकी जो क्रिया है, उसका ही नाम 'शुद्धसत्त्व' है। भगवान्के माता, पिता, स्थान, गृह, शय्या और आसनादि श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार अर्थात् विशेषरूप कार्य हैं। यहाँपर इस तत्त्वको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये यह भी जानना उचित कि स्वरूप अर्थात् चित्शक्तिके अन्तर्गत सन्धिनी ही चित्-जगत्की पूर्ण सत्ता है अर्थात् उसीने भगवान्के चिन्मयस्वरूप, भगवान्के दास, दासी, सङ्गिनी, पिता, मातादि सभी चिन्मयस्वरूपकी सत्ताको प्रकाश किया है; मायाशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जड़जगत्की सभी भौतिक सत्ताका विस्तार किया है और जीवशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जीवकी चित्कणरूप सत्ताका विस्तार किया है॥६४-६५॥ श्रीमद्भागवत (४/३/२३)— सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव-शब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः। सत्त्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते॥६६॥ चौथा अध्याय | १८१
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमहादेवने कहा-"भगवान्की स्वरूपशक्तिगत सन्धिनीके प्रभावसे ही शुद्धसत्त्वरूप जो नित्यतत्त्व है, उसीका नाम 'वसुदेव' है। उसी शुद्धसत्त्वसे चैतन्यस्वरूप भगवान्ने नित्यप्रकाश प्राप्त किया है, इसलिये उनका नाम 'वासुदेव' हैं। वे जड़़ीय और मायिक सभी इन्द्रियोंसे अतीत हैं। भक्तिसे पवित्र हुए हृदयसे मैं उनको प्रणाम करता हूँ।" इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णका स्वरूपादि उनकी स्वरूपशक्ति-गत सन्धिनीका नित्यकार्य है॥६६॥ अनुभाष्य-सती जब अपने पिता दक्षके घर यज्ञके दर्शनके लिये जा रही थीं, तब दक्षको विष्णुविमुख जानकर महादेवकी उक्ति,- विशुद्धं (स्वरूपशक्तिवृत्तित्वात् जाड्यांशेन रहितं) सत्त्वं (चिच्छक्तिवृत्तिमयम् अप्राकृतं) वसुदेव-शब्दितं (वसंत्यस्मिन्निति वसुः तथा दीव्यति द्योतते इति देवः, स चासौ स चेति) यत् (यस्मात्) तत्र (सत्त्वे) पुमान् (पुरुषः) अपावृतः (आवरणशून्यः सन्) ईयते (प्रकाशते)। तस्मिन् सत्त्वे अधोक्षजः (अधःकृतम् अतिक्रान्तम् अक्षजम् इन्द्रियजज्ञानं येन सः) भगवान् वासुदेवः (वसुदेवे भवति प्रतीयते इति वासुदेवः परमेश्वरः प्रसिद्धः, वासयति देवमिति व्युत्पत्त्या) मे (मया) मनसा विधीयते (विशेषेण चिन्यते)। श्लोक-भावानुवाद-विशुद्ध सत्त्व अर्थात् जड़ांशसे सर्वथा रहित स्वरूपशक्तिकी वृत्ति जिसे वसुदेव (जो वास करते हैं, वे वसु हैं; जो प्रकाश करते हैं, वे देव हैं; अथवा जो वसु हैं, वही देव हैं) कहते हैं, उससे भगवान् आवरणशून्य होकर प्रकाशित होते हैं। उन अधोक्षज (जिनके द्वारा इन्द्रियज्ञान अधःकृत अर्थात् नीचे पड़ जाता है अर्थात् जो इन्द्रियज्ञानसे अतीत हैं) भगवान् वासुदेव (जो वसुदेवमें प्रतीत होनेके कारण 'वासुदेव' नामसे प्रसिद्ध हैं; व्युत्पत्तिगत अर्थ है जो देवको वास कराते हैं) का मैं विशेषरूपसे चिन्तन करता हूँ। श्रीजीवप्रभु (भगवत् सन्दर्भ १०२ संख्यामें)-"अथ मूर्त्या परतत्त्वात्मकः श्रीविग्रह प्रकाशते; इयमेव वासुदेवाख्या।" अर्थात् विशुद्धसत्त्वसे परतत्त्वात्मक श्रीविग्रह प्रकाशित होते हैं, उन्हींका नाम वासुदेव है। परवर्त्ती अन्तिम अंशमें और श्रीमद्भागवतमें इस श्लोकका गौड़ीय भाष्य द्रष्टव्य है॥६६॥ सम्बित्-शक्तिके द्वारा श्रीकृष्णमें अद्वयतत्त्व भगवत्ता-ज्ञान :- कृष्णे भगवत्ता-ज्ञान-सम्बितेर सार। ब्रह्म-ज्ञानादिक सब तार परिवार ॥ ६७॥ अनुवाद-श्रीकृष्णमें भगवत्ताका ज्ञान अर्थात् वे ही स्वयं-भगवान् हैं, ऐसा ज्ञान ही सम्बित्का सार है, ब्रह्मज्ञानादि अर्थात् ब्रह्म और जड़ विषयोंका ज्ञान सब उसके परिवार हैं॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सम्बित्-क्रियाका नाम 'ज्ञान' है। दो द्रष्टा हैं-श्रीकृष्ण और जीव। श्रीकृष्णका दर्शन पूर्णज्ञानमूलक होनेके कारण उनके सम्वेदन और कार्यमें अन्तर नहीं है, इसलिये उनके ज्ञानको 'ईक्षण-मात्र' कहा जाता है। परन्तु जीवके दर्शनमें उससे बहुत अन्तर है, इसलिये उसके दर्शनको 'सम्वेदनस्वरूपज्ञान' कहा जाता है। वह ज्ञान तीन प्रकारका है-साक्षात्-ज्ञान, व्यतिरेक ज्ञान और विकृतज्ञान। जड़विषयोंमें जीवकी जड़ेन्द्रियोंके द्वारा जो ज्ञान होता है, वह कभी भी निर्मल नहीं है, इसलिये वह विकृत है; वह माया-शक्तिगत १८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सम्बित्की विकृतिमय-क्रिया है। जड़व्यतिरेक निर्विशेषज्ञान भी जड़ज्ञानके सम्बन्धाश्रित होनेसे क्षुद्र है, वह केवल जीवगत सम्बित्-शक्तिका कार्य है, इसलिये असम्पूर्ण है। उस ज्ञानका नाम 'ब्रह्मज्ञान', 'आत्मज्ञान', 'निर्विशेषज्ञान', 'अभेदज्ञान' आदि है। चित्गत सम्बित्-शक्ति जब ह्लादिनीके साथ युक्त होकर जीवोंपर कृपा करती हैं, तब श्रीकृष्णमें भगवत्ता-ज्ञान उदित होता है; इसलिये यह ज्ञान ही सम्बित्का सार है। उपरोक्त ब्रह्मज्ञान और विषयज्ञान उनके परिवार अर्थात् अवस्था-भेदसे आवरणमात्र हैं॥६७॥ ह्लादिनीके विभाग और विविध चित्विकार; उस विकारके क्रमसे श्रीकृष्णप्रणय-पराकाष्ठा महाभाव-स्वरूपा ही श्रीराधा :- ह्लादिनीर सार 'प्रेम', प्रेमसार 'भाव'। भावेर परमकाष्ठा, नाम- 'महाभाव' ॥ ६८ ॥ महाभावस्वरूपा श्रीराधा-ठाकुराणी। सर्वगुणखनि कृष्णकान्ताशिरोमणि ॥ ६९ ॥ अनुवाद-ह्लादिनी शक्तिका सार 'प्रेम' है और प्रेमका सार 'भाव' है। भावकी पराकाष्ठाका नाम 'महाभाव' है। श्रीराधा-ठाकुराणी महाभावस्वरूपा हैं। वे सभी गुणोंकी खान और श्रीकृष्ण-प्रेयसियोंकी शिरोमणि हैं॥६८-६९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ह्लादिनीकी क्रियाका नाम 'प्रेम' है। वह प्रेम दो प्रकारका होता है, शुद्धप्रेम और मिश्रित-प्रेम। श्रीकृष्णगत ह्लादिनीशक्ति श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करके जब शुद्ध सम्बित्के साथ मिलकर जीवपर कृपा करती है, तभी जीवका श्रीकृष्णसे प्रेम होता है। जीवगत ह्लादिनीका विकार जब मायाशक्तिके द्वारा जीवको आकर्षण करता है, उस समय जीव विषयप्रेममें मत्त होकर श्रीकृष्णप्रेमसे वञ्चित होकर संसारके सुख-दुःखके वशीभूत हो जाता है। जीवोंके प्रेमका आदर्श ब्रजकी गोपियाँ हैं और उनमें श्रीराधा सर्वश्रेष्ठा हैं। चित्स्वरूपगत ह्लादिनीका सार जो 'प्रेम' है और उस प्रेमका सार जो 'भाव' है तथा उस भावकी पराकाष्ठा जो 'महाभाव' है, वही श्रीमती राधिका ठाकुराणी हैं। वे ही सर्वगुणोंकी मूल हैं और श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि हैं॥६८-६९॥ अमृताणुकणिका-(उःनीः स्थायीभाव-प्रकरण)-प्रेम क्रमशः गाढ़ताको प्राप्त करता हुआ स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग अवस्थाओंके बाद जिस चरम सीमाको प्राप्त करता है, उसे भाव कहते हैं। जो प्रेम परिपक्व होकर चरमसीमाकी प्राप्तिकर चित्तरूपी प्रदीपको प्रकाशितकर हृदयको द्रवीभूत करता है, उसे स्नेह कहा जाता है। इस स्नेहके उदय होनेपर दर्शनादिमें अर्थात् परम मधुर रूप, गुण और लीलादिके यथायोग्य श्रवण, स्मरण और अनुमोदनादिसे कभी भी तृप्ति नहीं होती। जो स्नेह और भी उत्कृष्ट होकर श्रीराधाकृष्णयुगलको नित्य नये-नये माधुर्यका अनुभव कराता है और स्वयं बाहरमें कौटिल्यको धारण करता है, उसे मान कहते हैं। अत्यन्त प्रगाढ़ विश्वास धारण करनेपर उक्त मान ही प्रणयका नाम धारण करता है। प्रणयोत्कर्षवशतः जहाँ चित्तमें अत्यन्त दुःख भी अत्यन्त सुखके रूपमें अनुभूत होता है, उसका नाम राग है। जो राग नित्य नवनवायमान होकर अनुभूत प्रियजनको सदा सर्वदा
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नित्य-नवीन ही बोध कराता है, पण्डितलोग उस रागको अनुराग कहते हैं। वह अननुभूत तत्त्व अर्थात् अनास्वादनीयत्व, कहीं-कहींपर आंशिक रूपमें और कहीं-कहींपर सर्वांश रूपमें-दो प्रकारका होता है। अनुराग अपनी अनुभवावस्थाको प्राप्त करता हुआ जब स्वजातीयाशय स्निग्ध साधक भक्तोंमें भी व्याप्ति करता है अर्थात् जिसके अनुभवसे साधक भक्तगण भी अनुरागसे विवश हो जाते है, तब उसे भाव कहते हैं अथवा यावदाश्रयवृत्ति रूपमें अनुराग जब स्वसंवेद्य दशाको प्राप्त होकर प्रकाशित होता है, तब उसे भाव कहते हैं। पण्डितोंके मतमें यह महाभाव रूढ़ और अधिरूढ़ दो प्रकारका होता है। स्तम्भादि अष्टसात्त्विक भाव विकार जहाँपर उद्दीप्त होते हैं, (अत्यन्त कष्टसे भी किसी प्रकार उन्हें छिपाया नहीं जा सके) उसको रूढ़भाव कहते हैं। जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं। यह अधिरूढ़भाव दो प्रकारका होता है-मोदन और मादन। जिस अधिरूढ़ महाभावमें नायिका और नायकके स्तम्भादि सात्त्विक भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे मोदन कहते हैं। यह मोदन ही दोनों प्रवासियोंमें उदित होकर विरहदशामें 'मोहन' नामसे कथित होता है। इस मोहन-महाभावमें भी विरह-विवशता हेतु सात्त्विकभावसमूह सूदीप्त रूपमें प्रकाशित हुआ करते हैं। रति आदि महाभावके भेद अधिरूढ़ मोदन तक भावोंका जो प्राकट्य होता है, उससे भी अधिक उत्कर्ष-विशिष्ट, अतः श्रेष्ठ मोदन महाभावसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट जो ह्लादिनी नामक महाशक्तिका स्थिरांश है, जो केवल श्रीमती राधिकामें ही सदाकाल विराजमान होता है, उसे मादन महाभाव कहते हैं। यह मादन ललिता इत्यादिमें भी उदित नहीं होता। इस पयारमें 'महाभाव स्वरूपा-श्रीराधा ठाकुरानी' कहनेसे महाभावकी सर्वोच्च अवस्था 'मादन'को ही समझना होगा। सर्वगुणखनि- (उःनीः राधा-प्रकरण) - श्रीकृष्णके समान श्रीमती राधिकाके भी असंख्य गुण हैं। उनमेंसे पच्चीस मुख्य गुण हैं- (१) मधुर अर्थात् वे देखनेमें परम सुन्दरी हैं, (२) नवयुवती अर्थात् किशोर वयसवाली हैं, (३) चञ्चल कटाक्षवाली हैं, (४) उज्ज्वल मृदुमधुर हास्यकारिणी हैं, (५) सुन्दर सौभाग्यको सूचित करनेवाली रेखाओंसे युक्त हैं, (६) अपनी अङ्गगन्धसे श्रीकृष्णको भी उन्मत्त करनेवाली हैं, (७) सङ्गीतविद्यामें पारदर्शी, (८) रम्यवाक्य अर्थात् मृदुभाषा बोलनेवाली, (९) नर्मपण्डिता अर्थात् परिहास करनेमें पटु, (१०) विनीता, (११) करुणापूर्ण अर्थात् दयालु, (१२) विदग्धा अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुर हैं, (१३) सब कार्योंमें चातुरीयुक्ता हैं, (१४) लज्जाशीला, (१५) सुमर्यादा अर्थात् साधुमार्गपर अटल रहनेवाली, (१६) धैर्यशालिनी, (१७) गम्भीर, (१८) सुविलासा अर्थात् सुविलासप्रिया हैं, (१९) महाभावके परमोत्कर्षको प्रकट करनेमें परम व्यग्र रहती हैं, (२०) गोकुलप्रेमवसति अर्थात् उनको देखते ही गोकुलवासियोंके हृदयमें प्रेम उमड़ पड़ता है, (२१) अखिल ब्रह्माण्डमें उनकी कीर्त्ति व्याप्त है, (२२) गुरुजनोंके स्नेहकी पात्री हैं, (२३) सखियोंके प्रणयके अधीन रहती हैं, (२४) श्रीकृष्णकी समस्त सखियोंमें प्रधाना हैं, और (२५) केशव सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं॥ ६८-६९॥ १८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/७०-७२ ] उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीराधा-प्रकरणसे (३)— तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका। महाभावस्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी॥७०॥ अनुवाद—श्रीराधा और श्रीचन्द्रावलीके मध्यमें भी श्रीराधा ही सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपिणी हैं अर्थात् उनका विग्रह महाभावमय हैं, क्योंकि वे ह्लादिनी शक्तिकी सारांश हैं और गुणोंमें भी अत्यन्त श्रेष्ठा हैं॥७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजविलासिनी गोपियोंमें चन्द्रावली और राधिका श्रेष्ठा हैं। उन दोनोंमें भी श्रीमती राधिका सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपा हैं, उनके तुल्य गुण किसी और गोपीमें भी नहीं हैं॥७०॥ अनुभाष्य—तयोः (श्रीराधाचन्द्रावल्योः) उभयोः अपि मध्ये राधिका सर्वथाधिका (सर्वप्रकारेण अधिका श्रेष्ठा)। इयं (श्रीराधिका) महाभावस्वरूपा (मादनाख्यमहाभावविशिष्टा अष्टभावसमन्वितविग्रहा) गुणैः (पञ्चविंशति संख्यकैः) अति वरीयसी (सर्वश्रेष्ठा)। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधा और श्रीचन्द्रावली, दोनोंके मध्यमें भी श्रीराधिका सब प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। श्रीराधिका मादनाख्या महाभावविशिष्ट अष्ट-सात्त्विक भाव-समन्वित विग्रह हैं, वे पच्चीस दिव्य गुणोंसे युक्त सर्वश्रेष्ठा हैं॥७०॥ कृष्णप्रेम-भावित याँर चित्तेन्द्रिय-काय। कृष्ण-निजशक्ति राधा, क्रीड़ार सहाय॥७१॥ अनुवाद—श्रीराधाके चित्त, इन्द्रियाँ और शरीर श्रीकृष्णप्रेमसे भावित (गठित) हैं। वे श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति हैं और वे श्रीकृष्णकी सभी प्रकारकी लीलाओंमें सहायता करती हैं॥७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमती राधिका पूर्ण चिन्मयी हैं, जड़-मायाबद्ध जीवकी भाँति उनकी जड़-इन्द्रियाँ, जड़-शरीर और लिङ्ग-शरीररूप चित्त नहीं है। उनके चिन्मय स्वरूपमें शुद्ध चिन्मय-चित्त, चिन्मय-इन्द्रियाँ और चिन्मय-शरीर है। उनका चित्त, इन्द्रियाँ और शरीर श्रीकृष्णप्रेमके द्वारा भावित हैं। वे श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति हैं, इसलिये वे एकमात्र श्रीकृष्णकी क्रीड़ा (लीला) में सहायिका हैं। शक्तिमान्-तत्त्व श्रीकृष्ण, शक्तिसे पृथक् होनेपर किसी प्रकारकी क्रीड़ा नहीं कर सकते। स्वरूपशक्तिकी सन्धिनीने श्रीकृष्णके चिन्मय कलेवर (शरीर) को प्रकट किया है। उसी कलेवरमें जब श्रीकृष्ण क्रीड़ा करते हैं, उस समय श्रीमतीकी सहायताके बिना वे क्या कर सकेंगे? इसलिये राधिका ही श्रीकृष्णकी क्रीड़ामें एकमात्र सहायिका हैं॥७१॥ गोलोकमें गोपियोंके साथ नित्य रासविलासी गोविन्द :— ब्रह्मसंहिता (५/३७)— आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः। गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥७२॥ चौथा अध्याय | १८५
[ ४/७२-७५ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आनन्दचिन्मयरसके द्वारा प्रतिभावित जितनी गोपियाँ हैं, उनके साथ अपने स्वरूपमें अखिलात्माओंके आत्मास्वरूप आदिपुरुष जो श्रीगोविन्द गोलोकमें नित्य निवास करते हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥७२॥ अनुभाष्य—अखिलात्मभूतः (गोकुलवासिनां प्रियवर्गाणाम् आत्मभूतः) यः एव आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभिः (आनन्दचिन्मयात्मकेन रसेन प्रतिक्षणं भाविताभिः) निजरूपतया (स्व-स्वरूपतया प्रसिद्धाभिः) कलाभिः (ह्लादिनीशक्तिरूपाभिः) ताभिः (व्रजसुन्दरीभिः सह) गोलोके एव निवसति, तमादिपुरुषं गोविन्दमहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—जो गोकुलवासी प्रियजनोंके आत्मस्वरूप, आनन्द चिन्मय रससे सर्वदा भावित निजस्वरूप ह्लादिनीशक्तिरूपा श्रीमती राधा और उनकी कायव्यूह गोपियोंके साथ गोलोक धाममें निवास करते हैं, उन आदि पुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥७२॥ कृष्णेरे कराय यैछे रस आस्वादन। क्रीड़ार सहाय यैछे, शुन विवरण॥७३॥ अनुवाद—श्रीमती राधिका श्रीकृष्णको जिस प्रकार रसास्वादन कराती हैं और जिस प्रकार क्रीड़ा अर्थात् लीलामें सहायता करती हैं, उसे श्रवण करो॥७३॥ ऐश्वर्य और माधुर्यगत मधुर रतिमें तीन प्रकारकी श्रीकृष्णकान्ताएँ :- कृष्णकान्तागण देखि त्रिविध प्रकार। एक लक्ष्मीगण, पुरे महिषीगण आर॥७४॥ व्रजाङ्गनारूप आर—कान्तागण-सार। श्रीराधिका हैते कान्तागणेर विस्तार॥७५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी प्रेयसियाँ तीन प्रकार की हैं—वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ, द्वारकापुरीमें महिषियाँ और व्रजमें गोपियाँ। व्रजाङ्गनाएँ इन तीनोंमें श्रेष्ठा हैं। ये सभी प्रेयसियाँ श्रीराधिकाका ही विस्तार हैं॥७४-७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आर'—अन्य प्रकार, तीसरी प्रकारकी अर्थात् व्रजाङ्गनाएँ, ये सभी प्रकारकी कान्ताओंकी सार अर्थात् श्रेष्ठा हैं॥७५॥ अमृतानुकणिका—प्रेमके तारतम्यके अनुसार ही कान्ताओंकी श्रेष्ठता कही गयी है। वैकुण्ठमें नारायणका ऐश्वर्य प्रधान होनेके कारण उनकी प्रेयसी लक्ष्मीका प्रेम ऐश्वर्यज्ञानके कारण शिथिल है। द्वारकामें माधुर्य ऐश्वर्यसे मिश्रित होनेके कारण महिषियोंके प्रेमका विकास पूर्णतम अवस्था तक नहीं है। व्रजमें श्रीकृष्णका ऐश्वर्य और माधुर्य पूर्णतम रूपमें अभिव्यक्त होनेपर भी ऐश्वर्य माधुर्यके द्वारा आच्छादित रहता है, इसलिये व्रजाङ्गनाओंके प्रेमकी अभिव्यक्ति भी वहाँ पूर्णतम रूपमें है। 'श्रीराधिका हैते कान्तागणेर विस्तार'—नारदपञ्चरात्र (२/३/६०-६५)में इसका प्रमाण देखा जाता है, नारदजीके प्रति श्रीमहादेवकी उक्ति— “राधावामांशसम्भूता महालक्ष्मीः प्रकीर्त्तिता। ऐश्वर्याधिष्ठात्री देवीश्वरस्यैव हि नारद॥ १८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/७४-७८ ] तदंशा सिन्धुकन्या च क्षीरोदमन्थानोद्भवा। मर्त्यलक्ष्मीश्च सा देवी पत्नी क्षीरोदशायिनः ॥ तदंशा स्वर्गलक्ष्मीश्च शक्रादीनां गृहे गृहे। स्वयं देवी महालक्ष्मीः पत्नी वैकुण्ठशायिनः ॥ सावित्री ब्रह्मणः पत्नी ब्रह्मलोके निरामये। सरस्वती द्विधा भूता पुरैव साज्ञया हरे॥ सरस्वती भारती च योगेन सिद्ध योगिनी। भारती ब्रह्मणः पत्नी विष्णोः पत्नी सरस्वती ॥ रामाधिष्ठात्री देवी च स्वयं रामेश्वरी परा। वृन्दावने च सा देवी परिपूर्णतमा सती ॥ अर्थात् “जो ईश्वरके ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं, वे श्रीराधाके बाएँ अङ्गसे आविर्भूत हुई हैं। क्षीरसमुद्रके मन्थनसे उद्भूता सिन्धुकन्या मर्त्यलक्ष्मी क्षीरोदशायीकी पत्नी हैं, वे महालक्ष्मीकी अंशा हैं। इन्द्रादि देवताओंके घर-घरमें जो स्वर्गलक्ष्मीके नामसे जानी जाती हैं, वे मर्त्यलक्ष्मीकी अंशा हैं। स्वयं महालक्ष्मी वैकुण्ठेश्वरकी पत्नी हैं। उन्होंने ही रोगादिरहित ब्रह्मलोकमें ब्रह्माकी पत्नीके रूपमें सावित्री नाम ग्रहण किया है। (श्रीराधा ही रसनाकी अधिष्ठात्रीरूपमें सरस्वती हैं; नाःपःराः २/३/५५)। पूर्वकालसे (अनादिकालसे) श्रीहरिके आदेशसे सरस्वती देवीने दो मूर्तियाँ धारणकी हैं—सरस्वती और भारती। भारती ब्रह्माकी पत्नी हुईं और सरस्वती विष्णुकी पत्नी हुईं। स्वयंरूपा परा देवी स्वयं रामेश्वरी रामाधिष्ठात्री श्रीराधा परिपूर्णतमा देवीरूपमें वृन्दावनमें विराजित हैं।” अथर्ववेदके अन्तर्गत पुरुषबोधिनी श्रुतिमें कहा गया हैं—लक्ष्मी-दुर्गा शक्तियाँ श्रीराधाकी अंशभूता हैं॥७४-७५॥ सभी श्रीकृष्णकान्ताएँ ही अंशिनी श्रीराधाकी अंश :— अवतारी कृष्ण यैछे करे अवतार। अंशिनी राधा हैते तिन गणेर विस्तार॥७६॥ वैभवगण येन ताँर अङ्ग-विभूति। बिम्ब-प्रतिबिम्ब-रूप महिषीर तति ॥७७॥ द्वारकामें महिषीगण और नारायण-वासुदेवादिंकी लक्ष्मीगण :— लक्ष्मीगण ताँर वैभव-विलासांशरूप। महिषीगण प्राभव-प्रकाशस्वरूप ॥७८॥ अनुवाद—अवतारी श्रीकृष्ण जिस प्रकार अनेक अवतार लेते हैं, उसी प्रकार अंशिनी श्रीराधासे पूर्वोक्त तीन प्रकारकी कान्ताओंका विस्तार होता है। वैभवगण अर्थात् वैकुण्ठमें लक्ष्मीयाँ जिस प्रकार श्रीमती राधिकाकी अङ्ग-विभूतियाँ हैं, उस प्रकार महिषियाँ उनकी बिम्ब-प्रतिबिम्बरूपा हैं। लक्ष्मीयाँ श्रीमती राधिकाकी वैभव-विलास अंशरूपा हैं और महिषियाँ उनकी प्राभव-प्रकाशस्वरूपा हैं॥७६-७८॥ अनुभाष्य—'वैभवगण येन ताँर अङ्ग-विभूति'—इसका पाठान्तर 'लक्ष्मीगण हन ताँर अंशविभूति' भी देखा जाता है॥७७॥ चौथा अध्याय | १८७
[ ४/७९-८२ ललितादि ब्रजाङ्गनाएँ कायव्यूह :- आकार-स्वरूप-भेदे व्रजदेवीगण। कायव्यूहरूप ताँर रसेर कारण॥७९॥ रसके वर्धन और चमत्कारिताके लिये एक ही ह्लादिनीके अनेक प्रकाश :- बहु कान्ता बिना नहे रसेर उल्लास। लीलार सहाय लागि' बहुत' प्रकाश॥८०॥ उसमें व्रजविलास ही श्रीकृष्णप्रीतिकी श्रेष्ठ चमत्कारिता :- तार मध्ये व्रजे नाना भाव-रस-भेदे। कृष्णके कराय रासादिक-लीलास्वादे॥८१॥ अनुवाद-रूप और स्वरूपके भेदसे अलग-अलग व्रजदेवियाँ हैं। वे श्रीमती राधिकाकी कायव्यूहरूपा हैं और उनकी विविधता ही अनेक प्रकारके रसोंका कारण है। अनेक प्रेयसियोंके बिना रसका उल्लास नहीं होता, इसलिये श्रीकृष्णकी लीला सहायताके लिये श्रीमती राधिका अनेक कान्ताओंके रूपमें अपने प्रकाश प्रकट करती हैं। श्रीमती राधिका इन प्रकाशरूप व्रजाङ्गनाओंके साथ व्रजके शृङ्गाररसकी पुष्टिके लिये विभिन्न प्रकारके भावों और रसोंके द्वारा श्रीकृष्णको रासादि लीलाओंमें रसास्वादन कराती हैं॥७९-८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अवतारी-स्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार पुरुषादि अवतारोंके रूपमें अपना विस्तार करते हैं, उसी प्रकार श्रीमती राधिका सभी कान्ताओंकी अंशिनी हैं अर्थात् उनके अंशसे लक्ष्मियों, महिषियों और व्रजाङ्गनाओंका विस्तार होता है। इन सभी कान्ताओंकी गणना उनके अङ्ग-विभूतिरूपसे वैभवोंमें होती हैं। बिम्ब-प्रतिबिम्बरूपमें महिषियोंका विस्तार है। इसके मध्य यह विचार है कि लक्ष्मियाँ श्रीमती राधिकाकी वैभव-विलास-अंशरूपा और महिषियाँ उनके प्राभव-प्रकाशस्वरूपा हैं। व्रजदेवियाँ उनकी अपनी कायव्यूह-रूपा हैं और वे आकार तथा स्वरूपके प्रभेदसे रसका कारण होती हैं। अनेक कान्ताओंके बिना रसका उल्लास नहीं होता, इसलिये लीलाके सहायकरूप इस प्रकार उनके अनेक 'प्रकाश' दिखायी देते हैं; इन सब रसोंमें व्रजरस सर्वाधिक आस्वाद्यनीय है। विभिन्न प्रकारके भाव तथा रसभेदसे व्रजाङ्गनाएँ श्रीकृष्णको वहाँपर रासादि लीलाओंका आस्वादन कराती हैं॥७६-८१॥ अनुभाष्य-'स्वरूप' शब्दके स्थानपर अन्यान्य संस्करणोंमें 'स्वभाव' शब्द है॥७९॥ श्रीराधाके पाँच नाम :- गोविन्दानन्दिनी, राधा, गोविन्दमोहिनी। गोविन्दसर्वस्व, सर्वकान्ता-शिरोमणि॥८२॥ अनुवाद-गोविन्दानन्दिनी अर्थात् गोविन्दको आनन्द प्रदानकरनेवाली, राधा, गोविन्दमोहिनी अर्थात् गोविन्दको मोहित करनेवाली, गोविन्दसर्वस्व अर्थात् गोविन्दकी सर्वस्व और सर्वकान्ता-शिरोमणि अर्थात् सभी प्रियाओंमें श्रेष्ठा-ये श्रीराधाके पाँच नाम हैं॥८२॥ अनुभाष्य-ये श्रीराधाके पाँच नाम हैं॥८२॥ १८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/८३-८७ ] बृहद्गौतमीतन्त्र :- देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ॥८३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परदेवता राधिकादेवी 'साक्षात्कृष्णमयी', 'सर्वलक्ष्मीमयी', 'सर्वकान्ति', 'कृष्णसम्मोहिनी' और 'पराशक्ति' नामसे कही गयी हैं॥८३॥ अनुभाष्य-राधिका (आराधयति या सा), देवी (द्योतते इति) कृष्णमयी (कृष्णाभिन्ना कृष्णस्फूर्त्तिमती), परदेवता (परमपूज्या), सर्वलक्ष्मीमयी (लक्ष्मीगणनां मूलाधिष्ठात्री), सर्वकान्तिः (सर्वाःकान्तयः शोभाः यस्यां सा) सम्मोहिनी (श्रीकृष्णं सम्मोहयितुं शीलं यस्याः सा) परा प्रोक्ता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-जो श्रीकृष्णकी आराधना करती हैं, जो दीप्तिमान् हैं, जो श्रीकृष्णसे अभिन्न हैं और जिनको सर्वत्र श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है, जो परमपूज्या हैं, जो लक्ष्मियोंकी मूल अधिष्ठात्री हैं, जो श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंकी कान्ति अर्थात् शोभा हैं, जो अपने शील स्वभावसे श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली हैं, वे पराशक्ति कही गयी हैं॥८३॥ श्लोकार्थ-(१) सौन्दर्य अथवा विलासका आधार :- 'देवी' कहि द्योतमाना, परमा सुन्दरी। किम्बा, कृष्णपूजा-क्रीड़ार वसति नगरी ॥८४॥ (२) श्रीकृष्णमें एकान्त तन्मयता :- कृष्णमयी-कृष्ण यार भितरे बाहिरे। याँहा याँहा नेत्र पड़े, ताँहा कृष्ण स्फुरे ॥८५॥ श्रीकृष्णके साथ अभेदात्मता :- किम्बा, प्रेमरसमय कृष्णेर स्वरूप। ताँर शक्ति ताँर सह हय एकरूप ॥८६॥ (३) श्रीकृष्णवाञ्छापूरणरूप श्रीकृष्णाराधनके कारण 'राधा'-संज्ञा :- कृष्णवाञ्छा-पूर्त्तिरूप करे आराधने। अतएव 'राधिका'-नाम पुराणे बाखाने ॥८७॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकाको 'देवी' कहनेका तात्पर्य है कि वे दीप्तिमान् और परमा सुन्दरी हैं। अथवा अन्य अर्थ है जो श्रीकृष्णकी पूजारूप क्रीड़ाका वासस्थान हैं। 'कृष्णमयी' अर्थात् श्रीकृष्ण जिनके भीतर और बाहर भी हैं। जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, उन्हें वहाँ-वहाँ श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति होती है। अथवा 'कृष्णमयी' का अर्थ यह भी है कि वे श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और वे श्रीकृष्णकी ह्लादिनीशक्ति होनेके कारण उनके साथ एकरूप हैं। श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाओं और अभिलाषाओंको पूर्ण करना ही उनकी आराधना है। इसलिये पुराणोंमें उनका 'राधिका' नामसे बखान किया गया है ॥८४-८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दीप्तिमान् परमा सुन्दरी होनेके कारण, अथवा श्रीकृष्णपूजारूप जो क्रीड़ा है, उसका वासस्थान होनेके कारण वे 'देवी' हैं। 'कृष्णमयी' शब्दके दो अर्थ हैं। एक अर्थ चौथा अध्याय | १८९
[ ४/८४-८९
यह है कि जिनके भीतरमें और बाहरमें श्रीकृष्ण हैं एवं जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ-वहाँ उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है। तथा दूसरा अर्थ है, श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और उनकी शक्ति उनके साथ एक ही तत्त्व है। श्रीकृष्णकी वाञ्छापूर्तिरूप आराधन-कार्यसे उनका नाम ‘राधिका’ कहा गया है॥८४-८७॥ भागवतमें राधानामका सङ्केत :- श्रीमद्भागवत (१०/३०/२८)— अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥८८॥ अनुवाद—इस भाग्यवती रमणीने निश्चय ही भगवान् ईश्वर श्रीहरिकी यथार्थ रूपमें आराधनाकर उन्हें विशेष रूपसे सन्तुष्ट किया है, अन्यथा हम सबको त्यागकर हमारे प्राण-प्रियतम श्रीगोविन्द केवल अकेली उसे निर्जन स्थानपर क्यों ले जाते?॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि! हमें परित्याग करके श्रीकृष्ण जिसको निभृत स्थानमें लेकर गये हैं, उसने ईश्वर श्रीहरिकी अवश्य ही अधिक आराधना की होगी। श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि होनेके कारण उनका नाम ‘राधिका’ हुआ है, यही इसका गूढ़ार्थ है॥८८॥ अनुभाष्य—रासलीलास्थलीसे श्रीराधा और श्रीगोविन्द, दोनोंके चले जानेके बाद गोपियोंकी उक्ति,— अनया (राधया) नूनं (निश्चितं) ईश्वरः (भक्ताभीष्टप्रदाता) भगवान् हरिः आराधितः (आराध्य वशीकृतः, न तु अस्माभिः व्रजवधूभिः); यत् (यस्मात्) गोविन्दः प्रीतः (प्रीतियुक्तः सन्) नः (अस्मान्) विहाय (विशेषेण त्यक्त्वा) यां (राधां) रहः (निर्जने प्रदेशे) अनयत्। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधाने निश्चित ही भक्तोंको उनके अभीष्टको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीहरिको अपनी आराधनासे वशीभूत किया है। श्रीगोविन्द हम गोपियोंके द्वारा वशीभूत नहीं हुए हैं, इसलिये वे हमारा परित्यागकर श्रीराधासे प्रीतियुक्त होकर उन्हें निर्जन स्थानमें ले गये हैं॥८८॥ (४) श्रीकृष्ण आकर्षिणी होनेसे सर्वश्रेष्ठा, समस्त भक्तों और भक्तिकी पोषिका और मूल आधार :- अतएव सर्वपूज्या, परम-देवता। सर्वपालिका, सर्व-जगतेर माता॥८९॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमती राधिका सभीकी पूज्या और परम-देवता हैं। वे सभीका पालन करनेवाली और समस्त जगत्की माता हैं॥८९॥ अमृतानुकणिका—‘सर्वपूज्या’—श्रीकृष्णकी प्रियतमा और श्रीकृष्णके प्रति सर्वापेक्षा अधिकरूपमें प्रेमवती कहनेसे श्रीराधा सभीकी पूजनीया हैं। क्योंकि जीवका कर्त्तव्य श्रीकृष्णसेवा है, उसे प्राप्त करनेके लिये श्रीकृष्णकी सेवाकी सर्वश्रेष्ठ अधिकारिणी श्रीराधाकी कृपा अति आवश्यक है, उनकी सेवा-पूजाके द्वारा ही उनकी कृपा स्फुरित होगी, इसलिये श्रीराधाको सर्वपूज्या कहा गया हैं। ‘परम-देवता’—श्रेष्ठ देवता। जो क्रीड़ाका विस्तार करे, उसे देवता कहते हैं। श्रीकृष्णकी क्रीड़ा-विस्तारकी सर्वश्रेष्ठा सहायकारिणी होनेके कारण श्रीराधाको परम-देवता कहा है।
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