भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/६२ ] भगवत्-प्रकाशस्वरूप है। स्वयं अनुभव करने और अन्योंको अनुभव करानेकी दो वृत्तियाँ विद्यमान रहनेके कारण वह सम्वित् भी है। मायाका स्पर्श नहीं रहनेके कारण वह विशुद्ध है। इस विशुद्धसत्त्वसे 'वैकुण्ठ' नामक धाम प्रकाशित होता है। स्वतःप्रकाशलक्षणमय भगवत्-स्वरूपशक्तिकी वृत्तिविशेषको 'विशुद्धसत्त्व' कहा जाता है। प्राकृत-सत्त्वका (रजः और तमः से मिश्रित होनेके कारण) अशुद्धता लक्षण प्रसिद्ध है, इसलिये शुद्धसत्त्व या सन्धिनी चित्शक्तिविशेष है। इस शुद्धसत्त्वको स्वरूपशक्तिकी वृत्ति कहनेसे यह भी स्वरूपशक्त्यात्मक है। श्रुति और स्मृतिमें कहा गया है कि प्राकृत सत्त्वादि गुणसमूह जीवोंके ही हैं, ईश्वरके नहीं हैं। जैसे एकादश स्कन्धमें भगवान्‌की उक्ति-“सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंका मुझसे विमुख जीवोंके साथ सम्बन्ध है, कभी भी मेरे साथ इनका कोई सम्बन्ध नहीं है।” विष्णुपुराणमें भी कहा गया है-“जिनमें अप्राकृत गुणसमूह विराजमान है, उन ईश्वरमें सत्त्वादि 'प्राकृत' गुण नहीं रहते हैं और रह भी नहीं सकते हैं; समस्त शुद्धवस्तुओंमें अमिश्रित शुद्धवस्तु आदिपुरुष भगवान् नारायण प्रसन्न हों।” यहाँपर 'प्राकृत' विशेषणके प्रयोगके द्वारा विशेषरूपसे यह दिखलाया जा रहा है कि भगवान्‌में प्राकृतसे भिन्न अप्राकृत गुणसमूह विद्यमान हैं। दशमस्कन्धमें देवराज इन्द्रकी उक्ति—“हे भगवन् ! आपका धाम विशुद्ध सत्त्वमय है, वह शान्त, तपस्यारूप सेवामय और रजो-तमो गुणोंसे रहित है; आप इन मायामय गुणप्रवाह और प्राकृत गुणोंको स्पर्श अथवा ग्रहण नहीं करते हैं।” अव्यक्तावस्थामें सत्त्वगुण; बाह्य अभिव्यक्ति और उत्पत्तिशील अनेक रूपोंके प्रकाशमें रजोगुण तथा अनेक रूपोंके प्रकाशके अभावमें तमोगुण वर्तमान है; अर्थात् तीनों गुण जिस स्थानपर परस्पर शिथिल या उदासीन हैं, वहाँपर सत्त्वगुण है; जिस स्थानपर कार्यकारिता या क्रियाशीलता है, उस स्थलपर रजोगुण है और जिस स्थानपर ध्वंस अथवा विनाशका भाव है, वहाँपर तमोगुण वर्तमान है। इस स्थानपर विशुद्धसत्त्व ही सन्धिनी-अंश प्रधान होनेपर आधारशक्ति, सम्वित्-अंश प्रधान होनेपर आत्मविद्या और ह्लादिनीशक्तिका सारांश प्रधान होनेपर गुह्यविद्या (प्रेमभक्ति) है। तीनों शक्तियाँ एक साथ प्रधान होनेपर उसे मूर्ति या विग्रह कहा जाता है। इस आधारशक्तिके द्वारा ही भगवद्धाम प्रकाशित होता है।” परतत्त्व-अर्थात् भगवान् वास्तव-वस्तुस्वरूप हैं और वे तीन शक्तियोंसे नित्य प्रकटित है। वे परतत्त्व इन चार रूपोंमें नित्य अवस्थान करते हैं- १) परा अचिन्त्य (अन्तरङ्गा) शक्तिसे वैकुण्ठादि स्वरूपवैभव रूपमें; २) तटस्था नामक शक्तिसे चिदेकात्म शुद्धजीव रूपमें; ३) बहिरङ्गा शक्तिसे जड़ात्म प्रधान रूपमें और ४) अपने पूर्णस्वरूपमें। स्वरूपशक्ति और तद्रूपवैभवशक्ति अन्तरङ्गा-शक्तिके स्वयंरूप और वैभव-प्रकाशके भेदसे दो प्रकारसे अवस्थित है। अङ्गीके आन्तरिक अङ्गमें जो शक्ति विराजमान है, उसे 'अन्तरङ्गा' कहते हैं। अन्तरङ्गा-शक्तिकी शक्तिमत्तासे स्वयंरूप भगवान् अपने वैकुण्ठादि स्वरूपवैभवको प्रकाश करते हैं। भगवान्‌के बाह्य अङ्ग- 'प्रधान' और जड़ीय पदार्थ हैं। यह बहिरङ्गा शक्ति प्राकृत चौथा अध्याय | १७९