भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/६२-६३ जगत्में ब्रह्मासे लेकर स्थावर-पत्थरादि बड़े-छोटे शरीरोंके द्वारा तटस्थाशक्तिसे प्रकटित जीवोंको आवृत करके अवस्थान करती है। स्वरूपशक्ति तीन विभागोंमें परिलक्षित होती है। उन तीनोंको अंशिनी स्वरूपशक्तिका अंश कहा जाता है। शक्तिकी नित्यता अथवा सत्-अंश अर्थात् जो कालके द्वारा क्षोभित नहीं होता, उसे सन्धिनी कहते हैं। ज्ञातृत्व अथवा चित्-अंश नित्य आनन्दसे विशेषरूपसे युक्त होकर अद्वयज्ञान 'सम्वित्' नामसे कहलाता है अर्थात् जिसके द्वारा श्रीकृष्णका स्वतःकर्त्तृत्व पूर्ण चिद्धर्मसे परिचित है, वही 'सम्वित्-शक्ति' के नामसे प्रसिद्ध है। अंशिनीके जिस अंशकी सत्-चित्से विशेषता है, वही आनन्दमयी शक्ति है। विशेषताके वर्णनसे शक्तिका तीन प्रकारसे परिचय होनेपर भी ये तीनों अंश स्वरूपशक्तिमें ही अवस्थित हैं। और भी, तटस्था एवं बहिरङ्गाशक्तिमें इन तीन शक्तियोंका विभिन्न अधिष्ठान परिलक्षित होता है। बहिरङ्गा शक्तिमें ये त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम) रूपमें और तटस्थाशक्तिके बद्धजीव-अंशमें इन तीन गुणोंकी क्रिया रूपमें एवं मुक्तजीव-अंशमें सच्चिदानन्दकी आश्रयजातीयकी सेवावृत्तिसे सेव्यके उपयोगी शक्त्यांश रूपमें विराजमान हैं॥६२॥ श्रीविष्णुपुराणमें (१/१२/६९) ध्रुवकी उक्ति- ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥६३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्! आप सभीके आश्रय और निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्', तीनों चिन्मय हैं। मायाके वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति 'ह्लादकारी', 'तापकरी' और 'मिश्रा'-इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती है॥६३॥ अनुभाष्य-[हे भगवन्!] एका (मुख्या अव्यभिचारिणी स्वरूपभूता शक्तिः) ह्लादिनी (आह्लादकारी) सन्धिनी (सन्तता) सम्वित् (विद्याशक्तिः) सर्वसंस्थितौ (सर्वेषां सम्यक् स्थितिय॑स्मात् तस्मिन् सर्वाधिष्ठानभूते) त्वयि एव [न तु जीवेषु। तत्र च या गुणमयी त्रिविधा सा त्वयि नास्ति]; ह्लादतापकरी मिश्रा (ह्लादकरी मनःप्रसादोत्था सात्त्विकी, विषयवियोगादिषु तापकरी तामसी, तदुभयमिश्रा विषयजन्या राजसी) गुणवर्जिते (प्राकृत-सत्त्वादिगुणैः वर्जिते) त्वयि (भगवति) न [परन्तु जीवेषु एव। अत्र क्रमादुत्कर्षेण सन्धिनीसम्वित्ह्लादिन्यो ज्ञेयाः]। श्लोक-भावानुवाद-हे भगवन्! एक ही मुख्य अमिश्रित स्वरूपभूता शक्तिके अन्तर्गत ह्लादिनी-सन्धिनी-सम्वित्के अधिष्ठानरूप आप ही हैं, वह जीवोंमें नहीं है। जीवोंमें जो तीन गुणोंवाली अर्थात् मनकी प्रसन्नतासे उत्पन्न सुखप्रद सात्त्विकी, विषयोंके वियोगसे कष्ट प्रदान करनेवाली तामसी और इन दोनोंकी मिश्रित राजसिक माया है, वह प्राकृत सत्त्वादि गुणोंसे रहित आप भगवान्में नहीं है। यहाँ सन्धिनी, सम्वित् और ह्लादिनीको क्रमसे श्रेष्ठतर जानना चाहिये। इस श्लोककी और भागवत (१/७/६) श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीने श्रीविष्णुस्वामिके 'सर्वज्ञसूक्त'से यह श्लोक उद्धृत किया है-'ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः। १८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत