भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/६३-६६ ] स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः॥' अर्थात् सच्चिदानन्द ईश्वर ह्लादिनी और सम्वित्-इन स्वरूपशक्तिके द्वारा आश्लिष्ट हैं, परन्तु जीव अविद्यासे ढका है, इसलिये क्लेशोंकी निधिका मूल है॥६३॥ सन्धिनीकी भगवान् और उनके सेवोपकरण-प्राकट्य विधानरूप सेवा :- सन्धिनी सार अंश—'शुद्धसत्त्व' नाम। भगवानेर सत्ता हय याहाते विश्राम॥६४॥ अनुवाद—सन्धिनीके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है, जिसमें भगवान्‌की सत्ता विश्राम ग्रहण करती है॥६४॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके माता-पिता, धाम-गृहादि सभी शुद्धसत्त्वकी परिणति हैं। परिणत शुद्धसत्त्वमें भगवान्‌का स्वरूप शुद्धसत्त्वात्मकरूपसे परिदृष्ट होता है। श्रीकृष्णका मूल स्थल जो शुद्धसत्त्व है, उसमें श्रीकृष्णकी उत्पत्तिका स्वरूप दिखलायी देनेपर भी श्रीकृष्ण वसुदेवात्मक शुद्धसत्त्वमात्र नहीं हैं, वे अद्वयज्ञान सम्वित्-सार भगवत्-ज्ञानके नित्य अधिष्ठाता देवता हैं। आश्रयजातीय कृष्णसम्बन्धी सभी वस्तुएँ शुद्धसत्त्वात्मक हैं और सेवोन्मुखचित्तसे उनसे श्रीकृष्णका सम्बन्ध देखा जा सकता है; वास्तवमें भगवान् चित्स्वरूप ही हैं॥६४॥ माता, पिता, स्थान, गृह, शय्यासन आर। एसब कृष्णेर शुद्धसत्त्वेर विकार॥६५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके माता-पिता, स्थान (धाम), गृह और शय्या-आसन-ये सब श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार हैं॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्ताविस्तारिणी सन्धिनीशक्तिके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है। सत्त्व दो प्रकारके हैं—मिश्रसत्त्व और शुद्धसत्त्व। वस्तुसत्ताका ही नाम 'सत्त्व' है। सन्धिनीकी क्रियाके बिना कोई भी सत्त्व हो नहीं सकता अर्थात् किसीकी सत्ता नहीं हो सकती। भगवान्‌की सत्ताका प्रकाश भी सन्धिनीका कार्य है। शुद्धचित्-तत्त्वमें सन्धिनीकी जो क्रिया है, उसका ही नाम 'शुद्धसत्त्व' है। भगवान्‌के माता, पिता, स्थान, गृह, शय्या और आसनादि श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार अर्थात् विशेषरूप कार्य हैं। यहाँपर इस तत्त्वको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये यह भी जानना उचित कि स्वरूप अर्थात् चित्शक्तिके अन्तर्गत सन्धिनी ही चित्-जगत्‌की पूर्ण सत्ता है अर्थात् उसीने भगवान्‌के चिन्मयस्वरूप, भगवान्‌के दास, दासी, सङ्गिनी, पिता, मातादि सभी चिन्मयस्वरूपकी सत्ताको प्रकाश किया है; मायाशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जड़जगत्‌की सभी भौतिक सत्ताका विस्तार किया है और जीवशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जीवकी चित्कणरूप सत्ताका विस्तार किया है॥६४-६५॥ श्रीमद्भागवत (४/३/२३)— सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव-शब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः। सत्त्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते॥६६॥ चौथा अध्याय | १८१