श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
४/६३-६६ ] स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः॥' अर्थात् सच्चिदानन्द ईश्वर ह्लादिनी और सम्वित्-इन स्वरूपशक्तिके द्वारा आश्लिष्ट हैं, परन्तु जीव अविद्यासे ढका है, इसलिये क्लेशोंकी निधिका मूल है॥६३॥ सन्धिनीकी भगवान् और उनके सेवोपकरण-प्राकट्य विधानरूप सेवा :- सन्धिनी सार अंश—'शुद्धसत्त्व' नाम। भगवानेर सत्ता हय याहाते विश्राम॥६४॥ अनुवाद—सन्धिनीके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है, जिसमें भगवान्की सत्ता विश्राम ग्रहण करती है॥६४॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके माता-पिता, धाम-गृहादि सभी शुद्धसत्त्वकी परिणति हैं। परिणत शुद्धसत्त्वमें भगवान्का स्वरूप शुद्धसत्त्वात्मकरूपसे परिदृष्ट होता है। श्रीकृष्णका मूल स्थल जो शुद्धसत्त्व है, उसमें श्रीकृष्णकी उत्पत्तिका स्वरूप दिखलायी देनेपर भी श्रीकृष्ण वसुदेवात्मक शुद्धसत्त्वमात्र नहीं हैं, वे अद्वयज्ञान सम्वित्-सार भगवत्-ज्ञानके नित्य अधिष्ठाता देवता हैं। आश्रयजातीय कृष्णसम्बन्धी सभी वस्तुएँ शुद्धसत्त्वात्मक हैं और सेवोन्मुखचित्तसे उनसे श्रीकृष्णका सम्बन्ध देखा जा सकता है; वास्तवमें भगवान् चित्स्वरूप ही हैं॥६४॥ माता, पिता, स्थान, गृह, शय्यासन आर। एसब कृष्णेर शुद्धसत्त्वेर विकार॥६५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके माता-पिता, स्थान (धाम), गृह और शय्या-आसन-ये सब श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार हैं॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्ताविस्तारिणी सन्धिनीशक्तिके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है। सत्त्व दो प्रकारके हैं—मिश्रसत्त्व और शुद्धसत्त्व। वस्तुसत्ताका ही नाम 'सत्त्व' है। सन्धिनीकी क्रियाके बिना कोई भी सत्त्व हो नहीं सकता अर्थात् किसीकी सत्ता नहीं हो सकती। भगवान्की सत्ताका प्रकाश भी सन्धिनीका कार्य है। शुद्धचित्-तत्त्वमें सन्धिनीकी जो क्रिया है, उसका ही नाम 'शुद्धसत्त्व' है। भगवान्के माता, पिता, स्थान, गृह, शय्या और आसनादि श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार अर्थात् विशेषरूप कार्य हैं। यहाँपर इस तत्त्वको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये यह भी जानना उचित कि स्वरूप अर्थात् चित्शक्तिके अन्तर्गत सन्धिनी ही चित्-जगत्की पूर्ण सत्ता है अर्थात् उसीने भगवान्के चिन्मयस्वरूप, भगवान्के दास, दासी, सङ्गिनी, पिता, मातादि सभी चिन्मयस्वरूपकी सत्ताको प्रकाश किया है; मायाशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जड़जगत्की सभी भौतिक सत्ताका विस्तार किया है और जीवशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जीवकी चित्कणरूप सत्ताका विस्तार किया है॥६४-६५॥ श्रीमद्भागवत (४/३/२३)— सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव-शब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः। सत्त्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते॥६६॥ चौथा अध्याय | १८१
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमहादेवने कहा-"भगवान्की स्वरूपशक्तिगत सन्धिनीके प्रभावसे ही शुद्धसत्त्वरूप जो नित्यतत्त्व है, उसीका नाम 'वसुदेव' है। उसी शुद्धसत्त्वसे चैतन्यस्वरूप भगवान्ने नित्यप्रकाश प्राप्त किया है, इसलिये उनका नाम 'वासुदेव' हैं। वे जड़़ीय और मायिक सभी इन्द्रियोंसे अतीत हैं। भक्तिसे पवित्र हुए हृदयसे मैं उनको प्रणाम करता हूँ।" इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णका स्वरूपादि उनकी स्वरूपशक्ति-गत सन्धिनीका नित्यकार्य है॥६६॥ अनुभाष्य-सती जब अपने पिता दक्षके घर यज्ञके दर्शनके लिये जा रही थीं, तब दक्षको विष्णुविमुख जानकर महादेवकी उक्ति,- विशुद्धं (स्वरूपशक्तिवृत्तित्वात् जाड्यांशेन रहितं) सत्त्वं (चिच्छक्तिवृत्तिमयम् अप्राकृतं) वसुदेव-शब्दितं (वसंत्यस्मिन्निति वसुः तथा दीव्यति द्योतते इति देवः, स चासौ स चेति) यत् (यस्मात्) तत्र (सत्त्वे) पुमान् (पुरुषः) अपावृतः (आवरणशून्यः सन्) ईयते (प्रकाशते)। तस्मिन् सत्त्वे अधोक्षजः (अधःकृतम् अतिक्रान्तम् अक्षजम् इन्द्रियजज्ञानं येन सः) भगवान् वासुदेवः (वसुदेवे भवति प्रतीयते इति वासुदेवः परमेश्वरः प्रसिद्धः, वासयति देवमिति व्युत्पत्त्या) मे (मया) मनसा विधीयते (विशेषेण चिन्यते)। श्लोक-भावानुवाद-विशुद्ध सत्त्व अर्थात् जड़ांशसे सर्वथा रहित स्वरूपशक्तिकी वृत्ति जिसे वसुदेव (जो वास करते हैं, वे वसु हैं; जो प्रकाश करते हैं, वे देव हैं; अथवा जो वसु हैं, वही देव हैं) कहते हैं, उससे भगवान् आवरणशून्य होकर प्रकाशित होते हैं। उन अधोक्षज (जिनके द्वारा इन्द्रियज्ञान अधःकृत अर्थात् नीचे पड़ जाता है अर्थात् जो इन्द्रियज्ञानसे अतीत हैं) भगवान् वासुदेव (जो वसुदेवमें प्रतीत होनेके कारण 'वासुदेव' नामसे प्रसिद्ध हैं; व्युत्पत्तिगत अर्थ है जो देवको वास कराते हैं) का मैं विशेषरूपसे चिन्तन करता हूँ। श्रीजीवप्रभु (भगवत् सन्दर्भ १०२ संख्यामें)-"अथ मूर्त्या परतत्त्वात्मकः श्रीविग्रह प्रकाशते; इयमेव वासुदेवाख्या।" अर्थात् विशुद्धसत्त्वसे परतत्त्वात्मक श्रीविग्रह प्रकाशित होते हैं, उन्हींका नाम वासुदेव है। परवर्त्ती अन्तिम अंशमें और श्रीमद्भागवतमें इस श्लोकका गौड़ीय भाष्य द्रष्टव्य है॥६६॥ सम्बित्-शक्तिके द्वारा श्रीकृष्णमें अद्वयतत्त्व भगवत्ता-ज्ञान :- कृष्णे भगवत्ता-ज्ञान-सम्बितेर सार। ब्रह्म-ज्ञानादिक सब तार परिवार ॥ ६७॥ अनुवाद-श्रीकृष्णमें भगवत्ताका ज्ञान अर्थात् वे ही स्वयं-भगवान् हैं, ऐसा ज्ञान ही सम्बित्का सार है, ब्रह्मज्ञानादि अर्थात् ब्रह्म और जड़ विषयोंका ज्ञान सब उसके परिवार हैं॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सम्बित्-क्रियाका नाम 'ज्ञान' है। दो द्रष्टा हैं-श्रीकृष्ण और जीव। श्रीकृष्णका दर्शन पूर्णज्ञानमूलक होनेके कारण उनके सम्वेदन और कार्यमें अन्तर नहीं है, इसलिये उनके ज्ञानको 'ईक्षण-मात्र' कहा जाता है। परन्तु जीवके दर्शनमें उससे बहुत अन्तर है, इसलिये उसके दर्शनको 'सम्वेदनस्वरूपज्ञान' कहा जाता है। वह ज्ञान तीन प्रकारका है-साक्षात्-ज्ञान, व्यतिरेक ज्ञान और विकृतज्ञान। जड़विषयोंमें जीवकी जड़ेन्द्रियोंके द्वारा जो ज्ञान होता है, वह कभी भी निर्मल नहीं है, इसलिये वह विकृत है; वह माया-शक्तिगत १८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सम्बित्की विकृतिमय-क्रिया है। जड़व्यतिरेक निर्विशेषज्ञान भी जड़ज्ञानके सम्बन्धाश्रित होनेसे क्षुद्र है, वह केवल जीवगत सम्बित्-शक्तिका कार्य है, इसलिये असम्पूर्ण है। उस ज्ञानका नाम 'ब्रह्मज्ञान', 'आत्मज्ञान', 'निर्विशेषज्ञान', 'अभेदज्ञान' आदि है। चित्गत सम्बित्-शक्ति जब ह्लादिनीके साथ युक्त होकर जीवोंपर कृपा करती हैं, तब श्रीकृष्णमें भगवत्ता-ज्ञान उदित होता है; इसलिये यह ज्ञान ही सम्बित्का सार है। उपरोक्त ब्रह्मज्ञान और विषयज्ञान उनके परिवार अर्थात् अवस्था-भेदसे आवरणमात्र हैं॥६७॥ ह्लादिनीके विभाग और विविध चित्विकार; उस विकारके क्रमसे श्रीकृष्णप्रणय-पराकाष्ठा महाभाव-स्वरूपा ही श्रीराधा :- ह्लादिनीर सार 'प्रेम', प्रेमसार 'भाव'। भावेर परमकाष्ठा, नाम- 'महाभाव' ॥ ६८ ॥ महाभावस्वरूपा श्रीराधा-ठाकुराणी। सर्वगुणखनि कृष्णकान्ताशिरोमणि ॥ ६९ ॥ अनुवाद-ह्लादिनी शक्तिका सार 'प्रेम' है और प्रेमका सार 'भाव' है। भावकी पराकाष्ठाका नाम 'महाभाव' है। श्रीराधा-ठाकुराणी महाभावस्वरूपा हैं। वे सभी गुणोंकी खान और श्रीकृष्ण-प्रेयसियोंकी शिरोमणि हैं॥६८-६९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ह्लादिनीकी क्रियाका नाम 'प्रेम' है। वह प्रेम दो प्रकारका होता है, शुद्धप्रेम और मिश्रित-प्रेम। श्रीकृष्णगत ह्लादिनीशक्ति श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करके जब शुद्ध सम्बित्के साथ मिलकर जीवपर कृपा करती है, तभी जीवका श्रीकृष्णसे प्रेम होता है। जीवगत ह्लादिनीका विकार जब मायाशक्तिके द्वारा जीवको आकर्षण करता है, उस समय जीव विषयप्रेममें मत्त होकर श्रीकृष्णप्रेमसे वञ्चित होकर संसारके सुख-दुःखके वशीभूत हो जाता है। जीवोंके प्रेमका आदर्श ब्रजकी गोपियाँ हैं और उनमें श्रीराधा सर्वश्रेष्ठा हैं। चित्स्वरूपगत ह्लादिनीका सार जो 'प्रेम' है और उस प्रेमका सार जो 'भाव' है तथा उस भावकी पराकाष्ठा जो 'महाभाव' है, वही श्रीमती राधिका ठाकुराणी हैं। वे ही सर्वगुणोंकी मूल हैं और श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि हैं॥६८-६९॥ अमृताणुकणिका-(उःनीः स्थायीभाव-प्रकरण)-प्रेम क्रमशः गाढ़ताको प्राप्त करता हुआ स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग अवस्थाओंके बाद जिस चरम सीमाको प्राप्त करता है, उसे भाव कहते हैं। जो प्रेम परिपक्व होकर चरमसीमाकी प्राप्तिकर चित्तरूपी प्रदीपको प्रकाशितकर हृदयको द्रवीभूत करता है, उसे स्नेह कहा जाता है। इस स्नेहके उदय होनेपर दर्शनादिमें अर्थात् परम मधुर रूप, गुण और लीलादिके यथायोग्य श्रवण, स्मरण और अनुमोदनादिसे कभी भी तृप्ति नहीं होती। जो स्नेह और भी उत्कृष्ट होकर श्रीराधाकृष्णयुगलको नित्य नये-नये माधुर्यका अनुभव कराता है और स्वयं बाहरमें कौटिल्यको धारण करता है, उसे मान कहते हैं। अत्यन्त प्रगाढ़ विश्वास धारण करनेपर उक्त मान ही प्रणयका नाम धारण करता है। प्रणयोत्कर्षवशतः जहाँ चित्तमें अत्यन्त दुःख भी अत्यन्त सुखके रूपमें अनुभूत होता है, उसका नाम राग है। जो राग नित्य नवनवायमान होकर अनुभूत प्रियजनको सदा सर्वदा
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नित्य-नवीन ही बोध कराता है, पण्डितलोग उस रागको अनुराग कहते हैं। वह अननुभूत तत्त्व अर्थात् अनास्वादनीयत्व, कहीं-कहींपर आंशिक रूपमें और कहीं-कहींपर सर्वांश रूपमें-दो प्रकारका होता है। अनुराग अपनी अनुभवावस्थाको प्राप्त करता हुआ जब स्वजातीयाशय स्निग्ध साधक भक्तोंमें भी व्याप्ति करता है अर्थात् जिसके अनुभवसे साधक भक्तगण भी अनुरागसे विवश हो जाते है, तब उसे भाव कहते हैं अथवा यावदाश्रयवृत्ति रूपमें अनुराग जब स्वसंवेद्य दशाको प्राप्त होकर प्रकाशित होता है, तब उसे भाव कहते हैं। पण्डितोंके मतमें यह महाभाव रूढ़ और अधिरूढ़ दो प्रकारका होता है। स्तम्भादि अष्टसात्त्विक भाव विकार जहाँपर उद्दीप्त होते हैं, (अत्यन्त कष्टसे भी किसी प्रकार उन्हें छिपाया नहीं जा सके) उसको रूढ़भाव कहते हैं। जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं। यह अधिरूढ़भाव दो प्रकारका होता है-मोदन और मादन। जिस अधिरूढ़ महाभावमें नायिका और नायकके स्तम्भादि सात्त्विक भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे मोदन कहते हैं। यह मोदन ही दोनों प्रवासियोंमें उदित होकर विरहदशामें 'मोहन' नामसे कथित होता है। इस मोहन-महाभावमें भी विरह-विवशता हेतु सात्त्विकभावसमूह सूदीप्त रूपमें प्रकाशित हुआ करते हैं। रति आदि महाभावके भेद अधिरूढ़ मोदन तक भावोंका जो प्राकट्य होता है, उससे भी अधिक उत्कर्ष-विशिष्ट, अतः श्रेष्ठ मोदन महाभावसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट जो ह्लादिनी नामक महाशक्तिका स्थिरांश है, जो केवल श्रीमती राधिकामें ही सदाकाल विराजमान होता है, उसे मादन महाभाव कहते हैं। यह मादन ललिता इत्यादिमें भी उदित नहीं होता। इस पयारमें 'महाभाव स्वरूपा-श्रीराधा ठाकुरानी' कहनेसे महाभावकी सर्वोच्च अवस्था 'मादन'को ही समझना होगा। सर्वगुणखनि- (उःनीः राधा-प्रकरण) - श्रीकृष्णके समान श्रीमती राधिकाके भी असंख्य गुण हैं। उनमेंसे पच्चीस मुख्य गुण हैं- (१) मधुर अर्थात् वे देखनेमें परम सुन्दरी हैं, (२) नवयुवती अर्थात् किशोर वयसवाली हैं, (३) चञ्चल कटाक्षवाली हैं, (४) उज्ज्वल मृदुमधुर हास्यकारिणी हैं, (५) सुन्दर सौभाग्यको सूचित करनेवाली रेखाओंसे युक्त हैं, (६) अपनी अङ्गगन्धसे श्रीकृष्णको भी उन्मत्त करनेवाली हैं, (७) सङ्गीतविद्यामें पारदर्शी, (८) रम्यवाक्य अर्थात् मृदुभाषा बोलनेवाली, (९) नर्मपण्डिता अर्थात् परिहास करनेमें पटु, (१०) विनीता, (११) करुणापूर्ण अर्थात् दयालु, (१२) विदग्धा अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुर हैं, (१३) सब कार्योंमें चातुरीयुक्ता हैं, (१४) लज्जाशीला, (१५) सुमर्यादा अर्थात् साधुमार्गपर अटल रहनेवाली, (१६) धैर्यशालिनी, (१७) गम्भीर, (१८) सुविलासा अर्थात् सुविलासप्रिया हैं, (१९) महाभावके परमोत्कर्षको प्रकट करनेमें परम व्यग्र रहती हैं, (२०) गोकुलप्रेमवसति अर्थात् उनको देखते ही गोकुलवासियोंके हृदयमें प्रेम उमड़ पड़ता है, (२१) अखिल ब्रह्माण्डमें उनकी कीर्त्ति व्याप्त है, (२२) गुरुजनोंके स्नेहकी पात्री हैं, (२३) सखियोंके प्रणयके अधीन रहती हैं, (२४) श्रीकृष्णकी समस्त सखियोंमें प्रधाना हैं, और (२५) केशव सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं॥ ६८-६९॥ १८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/७०-७२ ] उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीराधा-प्रकरणसे (३)— तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका। महाभावस्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी॥७०॥ अनुवाद—श्रीराधा और श्रीचन्द्रावलीके मध्यमें भी श्रीराधा ही सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपिणी हैं अर्थात् उनका विग्रह महाभावमय हैं, क्योंकि वे ह्लादिनी शक्तिकी सारांश हैं और गुणोंमें भी अत्यन्त श्रेष्ठा हैं॥७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजविलासिनी गोपियोंमें चन्द्रावली और राधिका श्रेष्ठा हैं। उन दोनोंमें भी श्रीमती राधिका सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपा हैं, उनके तुल्य गुण किसी और गोपीमें भी नहीं हैं॥७०॥ अनुभाष्य—तयोः (श्रीराधाचन्द्रावल्योः) उभयोः अपि मध्ये राधिका सर्वथाधिका (सर्वप्रकारेण अधिका श्रेष्ठा)। इयं (श्रीराधिका) महाभावस्वरूपा (मादनाख्यमहाभावविशिष्टा अष्टभावसमन्वितविग्रहा) गुणैः (पञ्चविंशति संख्यकैः) अति वरीयसी (सर्वश्रेष्ठा)। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधा और श्रीचन्द्रावली, दोनोंके मध्यमें भी श्रीराधिका सब प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। श्रीराधिका मादनाख्या महाभावविशिष्ट अष्ट-सात्त्विक भाव-समन्वित विग्रह हैं, वे पच्चीस दिव्य गुणोंसे युक्त सर्वश्रेष्ठा हैं॥७०॥ कृष्णप्रेम-भावित याँर चित्तेन्द्रिय-काय। कृष्ण-निजशक्ति राधा, क्रीड़ार सहाय॥७१॥ अनुवाद—श्रीराधाके चित्त, इन्द्रियाँ और शरीर श्रीकृष्णप्रेमसे भावित (गठित) हैं। वे श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति हैं और वे श्रीकृष्णकी सभी प्रकारकी लीलाओंमें सहायता करती हैं॥७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमती राधिका पूर्ण चिन्मयी हैं, जड़-मायाबद्ध जीवकी भाँति उनकी जड़-इन्द्रियाँ, जड़-शरीर और लिङ्ग-शरीररूप चित्त नहीं है। उनके चिन्मय स्वरूपमें शुद्ध चिन्मय-चित्त, चिन्मय-इन्द्रियाँ और चिन्मय-शरीर है। उनका चित्त, इन्द्रियाँ और शरीर श्रीकृष्णप्रेमके द्वारा भावित हैं। वे श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति हैं, इसलिये वे एकमात्र श्रीकृष्णकी क्रीड़ा (लीला) में सहायिका हैं। शक्तिमान्-तत्त्व श्रीकृष्ण, शक्तिसे पृथक् होनेपर किसी प्रकारकी क्रीड़ा नहीं कर सकते। स्वरूपशक्तिकी सन्धिनीने श्रीकृष्णके चिन्मय कलेवर (शरीर) को प्रकट किया है। उसी कलेवरमें जब श्रीकृष्ण क्रीड़ा करते हैं, उस समय श्रीमतीकी सहायताके बिना वे क्या कर सकेंगे? इसलिये राधिका ही श्रीकृष्णकी क्रीड़ामें एकमात्र सहायिका हैं॥७१॥ गोलोकमें गोपियोंके साथ नित्य रासविलासी गोविन्द :— ब्रह्मसंहिता (५/३७)— आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः। गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥७२॥ चौथा अध्याय | १८५
[ ४/७२-७५ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आनन्दचिन्मयरसके द्वारा प्रतिभावित जितनी गोपियाँ हैं, उनके साथ अपने स्वरूपमें अखिलात्माओंके आत्मास्वरूप आदिपुरुष जो श्रीगोविन्द गोलोकमें नित्य निवास करते हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥७२॥ अनुभाष्य—अखिलात्मभूतः (गोकुलवासिनां प्रियवर्गाणाम् आत्मभूतः) यः एव आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभिः (आनन्दचिन्मयात्मकेन रसेन प्रतिक्षणं भाविताभिः) निजरूपतया (स्व-स्वरूपतया प्रसिद्धाभिः) कलाभिः (ह्लादिनीशक्तिरूपाभिः) ताभिः (व्रजसुन्दरीभिः सह) गोलोके एव निवसति, तमादिपुरुषं गोविन्दमहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—जो गोकुलवासी प्रियजनोंके आत्मस्वरूप, आनन्द चिन्मय रससे सर्वदा भावित निजस्वरूप ह्लादिनीशक्तिरूपा श्रीमती राधा और उनकी कायव्यूह गोपियोंके साथ गोलोक धाममें निवास करते हैं, उन आदि पुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥७२॥ कृष्णेरे कराय यैछे रस आस्वादन। क्रीड़ार सहाय यैछे, शुन विवरण॥७३॥ अनुवाद—श्रीमती राधिका श्रीकृष्णको जिस प्रकार रसास्वादन कराती हैं और जिस प्रकार क्रीड़ा अर्थात् लीलामें सहायता करती हैं, उसे श्रवण करो॥७३॥ ऐश्वर्य और माधुर्यगत मधुर रतिमें तीन प्रकारकी श्रीकृष्णकान्ताएँ :- कृष्णकान्तागण देखि त्रिविध प्रकार। एक लक्ष्मीगण, पुरे महिषीगण आर॥७४॥ व्रजाङ्गनारूप आर—कान्तागण-सार। श्रीराधिका हैते कान्तागणेर विस्तार॥७५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी प्रेयसियाँ तीन प्रकार की हैं—वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ, द्वारकापुरीमें महिषियाँ और व्रजमें गोपियाँ। व्रजाङ्गनाएँ इन तीनोंमें श्रेष्ठा हैं। ये सभी प्रेयसियाँ श्रीराधिकाका ही विस्तार हैं॥७४-७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आर'—अन्य प्रकार, तीसरी प्रकारकी अर्थात् व्रजाङ्गनाएँ, ये सभी प्रकारकी कान्ताओंकी सार अर्थात् श्रेष्ठा हैं॥७५॥ अमृतानुकणिका—प्रेमके तारतम्यके अनुसार ही कान्ताओंकी श्रेष्ठता कही गयी है। वैकुण्ठमें नारायणका ऐश्वर्य प्रधान होनेके कारण उनकी प्रेयसी लक्ष्मीका प्रेम ऐश्वर्यज्ञानके कारण शिथिल है। द्वारकामें माधुर्य ऐश्वर्यसे मिश्रित होनेके कारण महिषियोंके प्रेमका विकास पूर्णतम अवस्था तक नहीं है। व्रजमें श्रीकृष्णका ऐश्वर्य और माधुर्य पूर्णतम रूपमें अभिव्यक्त होनेपर भी ऐश्वर्य माधुर्यके द्वारा आच्छादित रहता है, इसलिये व्रजाङ्गनाओंके प्रेमकी अभिव्यक्ति भी वहाँ पूर्णतम रूपमें है। 'श्रीराधिका हैते कान्तागणेर विस्तार'—नारदपञ्चरात्र (२/३/६०-६५)में इसका प्रमाण देखा जाता है, नारदजीके प्रति श्रीमहादेवकी उक्ति— “राधावामांशसम्भूता महालक्ष्मीः प्रकीर्त्तिता। ऐश्वर्याधिष्ठात्री देवीश्वरस्यैव हि नारद॥ १८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/७४-७८ ] तदंशा सिन्धुकन्या च क्षीरोदमन्थानोद्भवा। मर्त्यलक्ष्मीश्च सा देवी पत्नी क्षीरोदशायिनः ॥ तदंशा स्वर्गलक्ष्मीश्च शक्रादीनां गृहे गृहे। स्वयं देवी महालक्ष्मीः पत्नी वैकुण्ठशायिनः ॥ सावित्री ब्रह्मणः पत्नी ब्रह्मलोके निरामये। सरस्वती द्विधा भूता पुरैव साज्ञया हरे॥ सरस्वती भारती च योगेन सिद्ध योगिनी। भारती ब्रह्मणः पत्नी विष्णोः पत्नी सरस्वती ॥ रामाधिष्ठात्री देवी च स्वयं रामेश्वरी परा। वृन्दावने च सा देवी परिपूर्णतमा सती ॥ अर्थात् “जो ईश्वरके ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं, वे श्रीराधाके बाएँ अङ्गसे आविर्भूत हुई हैं। क्षीरसमुद्रके मन्थनसे उद्भूता सिन्धुकन्या मर्त्यलक्ष्मी क्षीरोदशायीकी पत्नी हैं, वे महालक्ष्मीकी अंशा हैं। इन्द्रादि देवताओंके घर-घरमें जो स्वर्गलक्ष्मीके नामसे जानी जाती हैं, वे मर्त्यलक्ष्मीकी अंशा हैं। स्वयं महालक्ष्मी वैकुण्ठेश्वरकी पत्नी हैं। उन्होंने ही रोगादिरहित ब्रह्मलोकमें ब्रह्माकी पत्नीके रूपमें सावित्री नाम ग्रहण किया है। (श्रीराधा ही रसनाकी अधिष्ठात्रीरूपमें सरस्वती हैं; नाःपःराः २/३/५५)। पूर्वकालसे (अनादिकालसे) श्रीहरिके आदेशसे सरस्वती देवीने दो मूर्तियाँ धारणकी हैं—सरस्वती और भारती। भारती ब्रह्माकी पत्नी हुईं और सरस्वती विष्णुकी पत्नी हुईं। स्वयंरूपा परा देवी स्वयं रामेश्वरी रामाधिष्ठात्री श्रीराधा परिपूर्णतमा देवीरूपमें वृन्दावनमें विराजित हैं।” अथर्ववेदके अन्तर्गत पुरुषबोधिनी श्रुतिमें कहा गया हैं—लक्ष्मी-दुर्गा शक्तियाँ श्रीराधाकी अंशभूता हैं॥७४-७५॥ सभी श्रीकृष्णकान्ताएँ ही अंशिनी श्रीराधाकी अंश :— अवतारी कृष्ण यैछे करे अवतार। अंशिनी राधा हैते तिन गणेर विस्तार॥७६॥ वैभवगण येन ताँर अङ्ग-विभूति। बिम्ब-प्रतिबिम्ब-रूप महिषीर तति ॥७७॥ द्वारकामें महिषीगण और नारायण-वासुदेवादिंकी लक्ष्मीगण :— लक्ष्मीगण ताँर वैभव-विलासांशरूप। महिषीगण प्राभव-प्रकाशस्वरूप ॥७८॥ अनुवाद—अवतारी श्रीकृष्ण जिस प्रकार अनेक अवतार लेते हैं, उसी प्रकार अंशिनी श्रीराधासे पूर्वोक्त तीन प्रकारकी कान्ताओंका विस्तार होता है। वैभवगण अर्थात् वैकुण्ठमें लक्ष्मीयाँ जिस प्रकार श्रीमती राधिकाकी अङ्ग-विभूतियाँ हैं, उस प्रकार महिषियाँ उनकी बिम्ब-प्रतिबिम्बरूपा हैं। लक्ष्मीयाँ श्रीमती राधिकाकी वैभव-विलास अंशरूपा हैं और महिषियाँ उनकी प्राभव-प्रकाशस्वरूपा हैं॥७६-७८॥ अनुभाष्य—'वैभवगण येन ताँर अङ्ग-विभूति'—इसका पाठान्तर 'लक्ष्मीगण हन ताँर अंशविभूति' भी देखा जाता है॥७७॥ चौथा अध्याय | १८७
[ ४/७९-८२ ललितादि ब्रजाङ्गनाएँ कायव्यूह :- आकार-स्वरूप-भेदे व्रजदेवीगण। कायव्यूहरूप ताँर रसेर कारण॥७९॥ रसके वर्धन और चमत्कारिताके लिये एक ही ह्लादिनीके अनेक प्रकाश :- बहु कान्ता बिना नहे रसेर उल्लास। लीलार सहाय लागि' बहुत' प्रकाश॥८०॥ उसमें व्रजविलास ही श्रीकृष्णप्रीतिकी श्रेष्ठ चमत्कारिता :- तार मध्ये व्रजे नाना भाव-रस-भेदे। कृष्णके कराय रासादिक-लीलास्वादे॥८१॥ अनुवाद-रूप और स्वरूपके भेदसे अलग-अलग व्रजदेवियाँ हैं। वे श्रीमती राधिकाकी कायव्यूहरूपा हैं और उनकी विविधता ही अनेक प्रकारके रसोंका कारण है। अनेक प्रेयसियोंके बिना रसका उल्लास नहीं होता, इसलिये श्रीकृष्णकी लीला सहायताके लिये श्रीमती राधिका अनेक कान्ताओंके रूपमें अपने प्रकाश प्रकट करती हैं। श्रीमती राधिका इन प्रकाशरूप व्रजाङ्गनाओंके साथ व्रजके शृङ्गाररसकी पुष्टिके लिये विभिन्न प्रकारके भावों और रसोंके द्वारा श्रीकृष्णको रासादि लीलाओंमें रसास्वादन कराती हैं॥७९-८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अवतारी-स्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार पुरुषादि अवतारोंके रूपमें अपना विस्तार करते हैं, उसी प्रकार श्रीमती राधिका सभी कान्ताओंकी अंशिनी हैं अर्थात् उनके अंशसे लक्ष्मियों, महिषियों और व्रजाङ्गनाओंका विस्तार होता है। इन सभी कान्ताओंकी गणना उनके अङ्ग-विभूतिरूपसे वैभवोंमें होती हैं। बिम्ब-प्रतिबिम्बरूपमें महिषियोंका विस्तार है। इसके मध्य यह विचार है कि लक्ष्मियाँ श्रीमती राधिकाकी वैभव-विलास-अंशरूपा और महिषियाँ उनके प्राभव-प्रकाशस्वरूपा हैं। व्रजदेवियाँ उनकी अपनी कायव्यूह-रूपा हैं और वे आकार तथा स्वरूपके प्रभेदसे रसका कारण होती हैं। अनेक कान्ताओंके बिना रसका उल्लास नहीं होता, इसलिये लीलाके सहायकरूप इस प्रकार उनके अनेक 'प्रकाश' दिखायी देते हैं; इन सब रसोंमें व्रजरस सर्वाधिक आस्वाद्यनीय है। विभिन्न प्रकारके भाव तथा रसभेदसे व्रजाङ्गनाएँ श्रीकृष्णको वहाँपर रासादि लीलाओंका आस्वादन कराती हैं॥७६-८१॥ अनुभाष्य-'स्वरूप' शब्दके स्थानपर अन्यान्य संस्करणोंमें 'स्वभाव' शब्द है॥७९॥ श्रीराधाके पाँच नाम :- गोविन्दानन्दिनी, राधा, गोविन्दमोहिनी। गोविन्दसर्वस्व, सर्वकान्ता-शिरोमणि॥८२॥ अनुवाद-गोविन्दानन्दिनी अर्थात् गोविन्दको आनन्द प्रदानकरनेवाली, राधा, गोविन्दमोहिनी अर्थात् गोविन्दको मोहित करनेवाली, गोविन्दसर्वस्व अर्थात् गोविन्दकी सर्वस्व और सर्वकान्ता-शिरोमणि अर्थात् सभी प्रियाओंमें श्रेष्ठा-ये श्रीराधाके पाँच नाम हैं॥८२॥ अनुभाष्य-ये श्रीराधाके पाँच नाम हैं॥८२॥ १८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/८३-८७ ] बृहद्गौतमीतन्त्र :- देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ॥८३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परदेवता राधिकादेवी 'साक्षात्कृष्णमयी', 'सर्वलक्ष्मीमयी', 'सर्वकान्ति', 'कृष्णसम्मोहिनी' और 'पराशक्ति' नामसे कही गयी हैं॥८३॥ अनुभाष्य-राधिका (आराधयति या सा), देवी (द्योतते इति) कृष्णमयी (कृष्णाभिन्ना कृष्णस्फूर्त्तिमती), परदेवता (परमपूज्या), सर्वलक्ष्मीमयी (लक्ष्मीगणनां मूलाधिष्ठात्री), सर्वकान्तिः (सर्वाःकान्तयः शोभाः यस्यां सा) सम्मोहिनी (श्रीकृष्णं सम्मोहयितुं शीलं यस्याः सा) परा प्रोक्ता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-जो श्रीकृष्णकी आराधना करती हैं, जो दीप्तिमान् हैं, जो श्रीकृष्णसे अभिन्न हैं और जिनको सर्वत्र श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है, जो परमपूज्या हैं, जो लक्ष्मियोंकी मूल अधिष्ठात्री हैं, जो श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंकी कान्ति अर्थात् शोभा हैं, जो अपने शील स्वभावसे श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली हैं, वे पराशक्ति कही गयी हैं॥८३॥ श्लोकार्थ-(१) सौन्दर्य अथवा विलासका आधार :- 'देवी' कहि द्योतमाना, परमा सुन्दरी। किम्बा, कृष्णपूजा-क्रीड़ार वसति नगरी ॥८४॥ (२) श्रीकृष्णमें एकान्त तन्मयता :- कृष्णमयी-कृष्ण यार भितरे बाहिरे। याँहा याँहा नेत्र पड़े, ताँहा कृष्ण स्फुरे ॥८५॥ श्रीकृष्णके साथ अभेदात्मता :- किम्बा, प्रेमरसमय कृष्णेर स्वरूप। ताँर शक्ति ताँर सह हय एकरूप ॥८६॥ (३) श्रीकृष्णवाञ्छापूरणरूप श्रीकृष्णाराधनके कारण 'राधा'-संज्ञा :- कृष्णवाञ्छा-पूर्त्तिरूप करे आराधने। अतएव 'राधिका'-नाम पुराणे बाखाने ॥८७॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकाको 'देवी' कहनेका तात्पर्य है कि वे दीप्तिमान् और परमा सुन्दरी हैं। अथवा अन्य अर्थ है जो श्रीकृष्णकी पूजारूप क्रीड़ाका वासस्थान हैं। 'कृष्णमयी' अर्थात् श्रीकृष्ण जिनके भीतर और बाहर भी हैं। जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, उन्हें वहाँ-वहाँ श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति होती है। अथवा 'कृष्णमयी' का अर्थ यह भी है कि वे श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और वे श्रीकृष्णकी ह्लादिनीशक्ति होनेके कारण उनके साथ एकरूप हैं। श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाओं और अभिलाषाओंको पूर्ण करना ही उनकी आराधना है। इसलिये पुराणोंमें उनका 'राधिका' नामसे बखान किया गया है ॥८४-८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दीप्तिमान् परमा सुन्दरी होनेके कारण, अथवा श्रीकृष्णपूजारूप जो क्रीड़ा है, उसका वासस्थान होनेके कारण वे 'देवी' हैं। 'कृष्णमयी' शब्दके दो अर्थ हैं। एक अर्थ चौथा अध्याय | १८९
[ ४/८४-८९
यह है कि जिनके भीतरमें और बाहरमें श्रीकृष्ण हैं एवं जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ-वहाँ उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है। तथा दूसरा अर्थ है, श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और उनकी शक्ति उनके साथ एक ही तत्त्व है। श्रीकृष्णकी वाञ्छापूर्तिरूप आराधन-कार्यसे उनका नाम ‘राधिका’ कहा गया है॥८४-८७॥ भागवतमें राधानामका सङ्केत :- श्रीमद्भागवत (१०/३०/२८)— अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥८८॥ अनुवाद—इस भाग्यवती रमणीने निश्चय ही भगवान् ईश्वर श्रीहरिकी यथार्थ रूपमें आराधनाकर उन्हें विशेष रूपसे सन्तुष्ट किया है, अन्यथा हम सबको त्यागकर हमारे प्राण-प्रियतम श्रीगोविन्द केवल अकेली उसे निर्जन स्थानपर क्यों ले जाते?॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि! हमें परित्याग करके श्रीकृष्ण जिसको निभृत स्थानमें लेकर गये हैं, उसने ईश्वर श्रीहरिकी अवश्य ही अधिक आराधना की होगी। श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि होनेके कारण उनका नाम ‘राधिका’ हुआ है, यही इसका गूढ़ार्थ है॥८८॥ अनुभाष्य—रासलीलास्थलीसे श्रीराधा और श्रीगोविन्द, दोनोंके चले जानेके बाद गोपियोंकी उक्ति,— अनया (राधया) नूनं (निश्चितं) ईश्वरः (भक्ताभीष्टप्रदाता) भगवान् हरिः आराधितः (आराध्य वशीकृतः, न तु अस्माभिः व्रजवधूभिः); यत् (यस्मात्) गोविन्दः प्रीतः (प्रीतियुक्तः सन्) नः (अस्मान्) विहाय (विशेषेण त्यक्त्वा) यां (राधां) रहः (निर्जने प्रदेशे) अनयत्। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधाने निश्चित ही भक्तोंको उनके अभीष्टको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीहरिको अपनी आराधनासे वशीभूत किया है। श्रीगोविन्द हम गोपियोंके द्वारा वशीभूत नहीं हुए हैं, इसलिये वे हमारा परित्यागकर श्रीराधासे प्रीतियुक्त होकर उन्हें निर्जन स्थानमें ले गये हैं॥८८॥ (४) श्रीकृष्ण आकर्षिणी होनेसे सर्वश्रेष्ठा, समस्त भक्तों और भक्तिकी पोषिका और मूल आधार :- अतएव सर्वपूज्या, परम-देवता। सर्वपालिका, सर्व-जगतेर माता॥८९॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमती राधिका सभीकी पूज्या और परम-देवता हैं। वे सभीका पालन करनेवाली और समस्त जगत्की माता हैं॥८९॥ अमृतानुकणिका—‘सर्वपूज्या’—श्रीकृष्णकी प्रियतमा और श्रीकृष्णके प्रति सर्वापेक्षा अधिकरूपमें प्रेमवती कहनेसे श्रीराधा सभीकी पूजनीया हैं। क्योंकि जीवका कर्त्तव्य श्रीकृष्णसेवा है, उसे प्राप्त करनेके लिये श्रीकृष्णकी सेवाकी सर्वश्रेष्ठ अधिकारिणी श्रीराधाकी कृपा अति आवश्यक है, उनकी सेवा-पूजाके द्वारा ही उनकी कृपा स्फुरित होगी, इसलिये श्रीराधाको सर्वपूज्या कहा गया हैं। ‘परम-देवता’—श्रेष्ठ देवता। जो क्रीड़ाका विस्तार करे, उसे देवता कहते हैं। श्रीकृष्णकी क्रीड़ा-विस्तारकी सर्वश्रेष्ठा सहायकारिणी होनेके कारण श्रीराधाको परम-देवता कहा है।
१९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/८९-९१ ] 'सर्वपालिका'- श्रीकृष्ण समस्त जगत्के पालनकर्त्ता हैं और उनसे अभिन्न कृष्णमयी श्रीराधा भी सभीकी पालनकर्त्री हैं। पद्मपुराण-पातालखण्डमें लिखा है- “बहिरङ्गैःप्रपञ्चस्य स्वांशैर्मायादिशक्तिभिः। अन्तरङ्गैरस्तथा नित्यं विभुतौस्तैश्चिदादिभिः। गोपनादुच्यते गोपी राधिका कृष्णवल्लभा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णवल्लभा श्रीराधिका अपनी बहिरङ्ग अंशरूपा मायादिशक्तिके द्वारा और अन्तरङ्ग विभूतिरूपा चिदादिशक्तिके द्वारा भी प्रपञ्चको गोपन (रक्षा) करती हैं, इसलिये उन्हें गोपी (रक्षाकर्त्री, पालनकर्त्री) कहा गया है। 'सर्व-जगतेर माता'-नारद पञ्चरात्रमें कहा है- “श्रीकृष्णो जगतां तातो जगन्माता च राधिका। पितुः शतगुणा माता वन्द्या पूज्या गरीयसी॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण जगत्के पिता हैं और श्रीराधा जगत्की माता हैं। पिताकी अपेक्षा माता सौ गुणा अधिक वन्दनीया, पूजनीया और श्रेष्ठा हैं॥८९॥ (५) सभी श्रीकृष्णकान्ताओंकी अंशिनी :- 'सर्वलक्ष्मी'-शब्द पूर्वे करियाछि व्याख्यान। सर्वलक्ष्मीगणेर तिँहो हन अधिष्ठान॥९०॥ श्रीकृष्णकी सभी ऐश्वरी शक्तिकी मूल आश्रयस्वरूपा :- किम्वा, 'सर्वलक्ष्मी'-कृष्णेर षड्विध ऐश्वर्य। ताँर अधिष्ठात्री शक्ति-सर्वशक्तिवर्य॥९१॥ अनुवाद- 'सर्वलक्ष्मी' अर्थात् सभी लक्ष्मियाँ उनकी अंशरूपा हैं, इस शब्दकी व्याख्या मैं पहले कर चुका हूँ, श्रीमती राधिका ही सब लक्ष्मियोंकी अधिष्ठान अर्थात् मूल हैं। अथवा 'सर्वलक्ष्मी' कहनेका तात्पर्य है कि वे श्रीकृष्णके षड्-ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं, इसलिये वे श्रीकृष्णकी सर्वोच्च शक्ति हैं॥९०-९१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिका सब लक्ष्मियोंकी आश्रयस्वरूपा हैं; अथवा 'सर्वलक्ष्मी' शब्दका अर्थ श्रीकृष्णका षड्विध ऐश्वर्य है; वे ही श्रीकृष्णकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं॥९०-९१॥ अमृताणुकणिका-'सर्वशक्तिवर्य'–पद्मपुराण पातलखण्डमें श्रीनारद श्रीराधासे बोले- “तत्त्वं विशुद्धसत्त्वासु शक्तिर्विद्यात्मिका परा। परमानन्दसन्दोहं दधती वैष्णवं परम्॥ कल्याश्चर्यविभवे ब्रह्मरुद्रादिदुर्गमे। योगीन्द्रानां ध्यानपथं न त्वं स्पृशसि कर्हिचित्॥ इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिस्तवेशितुः। तवांशमात्रमित्येवं मनीषा मे प्रवर्त्तते ॥ मायाविभूतयोऽचिन्त्यास्तन्मायार्भकमायिनः। परेशस्य महाविष्णोस्ताः सर्वास्ते कलाः कलाः॥” अर्थात् “विशुद्धसत्त्वसमूहमें आप ही तत्त्व अर्थात् ह्लादिनी-सन्धिनी-सम्वित्-रूप विशुद्ध सत्त्वकी चौथा अध्याय | १९१
[ ४/९०-९७ मूल अथवा स्वरूपशक्तिकी अधिष्ठात्री, आप ही प्रधान शक्तिरूपा, परा-विद्यात्मिका हैं। आपने ही विष्णुसम्बन्धी परम आनन्दराशिको धारण किया है। हे ब्रह्मा-रुद्रादिदेवगण-दुर्गमे ! आपके वैभवका प्रत्येक अंश आश्चर्यजनक है। आप कभी भी योगिन्द्रगणोंके ध्यानपथको स्पर्श नहीं करतीं। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति आपकी ही अंशमात्र हैं। आप ही समस्त शक्तियोंकी ईश्वरी हैं। योगमायाके प्रभावसे जो यशोदाके बालकके रूपमें लीला करते हैं, वे ही भगवान् महाविष्णु (स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण)की जितनी माया-विभूतियाँ हैं, वे सभी आपकी अंशस्वरूपा हैं॥९०-९१॥ (६) समस्त शोभाकी मूल आश्रयस्वरूपा :- सर्व-सौन्दर्य-कान्ति वैसये याँहाते। सर्वलक्ष्मीगणेर शोभा हय याँहा हैते ॥९२॥ श्रीकृष्णेच्छापूर्तिमयी :- किम्वा, 'कान्ति'-शब्दे कृष्णेर सब इच्छा कहे। कृष्णेर सकल वाञ्छा राधातेइ रहे ॥९३॥ राधिका करेन कृष्णेर वाञ्छित पूरण। 'सर्वकान्ति'-शब्देर एइ अर्थ विवरण ॥९४॥ (७) भुवनमोहन-मनोमोहिनी :- जगतमोहन कृष्ण, ताँहार मोहिनी। अतएव समस्तेर परा ठकुराणी ॥९५॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकामें समस्त सौन्दर्य और कान्ति वास करते हैं और सभी लक्ष्मियोंकी शोभा भी उनसे सिद्ध होती है। अथवा [कम्-धातुसे कान्ति-शब्द निष्पन्न हुआ है, कम्-धातुका अर्थ कामना अथवा वासना है, इसलिये] 'कान्ति' शब्दका अर्थ 'श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाएँ' भी होता है और श्रीकृष्णकी सभी अभिलाषाएँ श्रीमती राधिकामें ही रहती हैं। श्रीमती राधिका श्रीकृष्णकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करती हैं—इसलिये उन्हें 'सर्वकान्ति' कहा गया है। श्रीकृष्ण जगतमोहन हैं, परन्तु उनको भी मोहित करनेवाली श्रीमती राधिका हैं। इसलिये श्रीमती राधिका सबकी परम ठकुराणी (स्वामिनी) हैं॥९२-९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अतएव समस्तेर परा ठकुराणी', यहाँ तक 'देवी कृष्णमयी' श्लोकके प्रत्येक पदके अर्थपर विचार हुआ है॥९५॥ पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णकी पूर्णिमास्वरूपिणी :- राधा-पूर्णशक्ति, कृष्ण-पूर्णशक्तिमान्। दुई वस्तु भेद नाहि, शास्त्र-परमाण ॥ ९६॥ श्रीराधा-कृष्णका परस्पर अविच्छेद्य सम्बन्ध :- मृगमद, तार गन्ध-यैछे अविच्छेद। अग्नि, ज्वालाते-यैछे कभु नाहि भेद ॥ ९७॥ १९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/९६-१०५ ] एकस्वरूप होनेपर भी आस्वादक और आस्वादितरूपमें दो देह :— राधाकृष्ण ऐछे सदा एकइ स्वरूप। लीलारस आस्वादिते धरे दुइ रूप॥९८॥ अनुवाद—श्रीमती राधिका पूर्णशक्ति हैं और श्रीकृष्ण पूर्ण शक्तिमान् हैं। शास्त्रोंके प्रमाणके अनुसार दोनों वस्तुओं—शक्ति और शक्तिमान्में कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार कस्तूरी और उसकी गन्ध अभिन्न हैं अथवा अग्नि और उसकी दाहिका शक्तिमें कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण सदा एक ही स्वरूप हैं, किन्तु लीलारसके आस्वादनके लिये दो रूप धारण करते हैं॥९६-९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कस्तूरी और उसकी गन्ध पृथक् दो वस्तुएँ होनेपर भी वे जिस प्रकार अविच्छेद्य हैं अर्थात् जिन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता, अग्नि और अग्निकी दाहिका शक्ति पृथक् वस्तुएँ होनेपर भी जिस प्रकार अविच्छेद्य हैं, उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण लीलारसास्वादनमें नित्य पृथक् होकर भी एक ही स्वरूप हैं॥९७॥ श्रीराधाके कृष्णप्रेमको वितरित करनेके लिये श्रीराधाके भाव और कान्ति लेकर श्रीकृष्णका गौरावतार :— प्रेमभक्ति शिखाइते आपने अवतरि। राधा-भाव-कान्ति दुइ अङ्गीकार करि'॥९९॥ श्रीकृष्णचैतन्यरूपे कैल अवतार। एइ त' पञ्चम श्लोकेर अर्थ परचार॥१००॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने जगत्को प्रेमभक्तिकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं श्रीराधाके भाव और कान्ति लेकर श्रीकृष्णचैतन्यरूपसे अवतार ग्रहण किया। यह पाँचवें श्लोकका अर्थ है॥९९-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमती राधिकाके भाव और कान्ति अर्थात् वर्ण और सौन्दर्यको स्वयं ग्रहण करके॥९९॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमें छठे श्लोककी व्याख्या आरम्भ :— षष्ठ श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश। प्रथमे कहिये सेइ श्लोकेर आभास॥१०१॥ पूर्वाभास; नामसङ्कीर्तन-प्रवर्तन गौरावातारका बाह्य कारण :— अवतरि' प्रभु प्रचारिल सङ्कीर्त्तन। एहो बाह्य हेतु, पूर्वे करियाछि सूचन॥१०२॥ मुख्य और गूढ़ कारण—वह स्वयं श्रीकृष्णका निजकार्य और एकमात्र श्रीस्वरूपदामोदरको विज्ञात :— अवतारेर आर एक आछे मुख्य बीज। रसिकशेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज॥१०३॥ अति गूढ़ हेतु सेइ त्रिविध प्रकार। दामोदरस्वरूप हैते याहार प्रचार॥१०४॥ स्वरूप-गोसाञि—प्रभुर अति अन्तरङ्ग। ताहाते जानेन प्रभुर एसब प्रसङ्ग॥१०५॥ चौथा अध्याय १९३
[ ४/१०१-१०५ अनुवाद-छठे श्लोकके अर्थको प्रकाश करनेके लिये पहले उसकी भूमिकाका वर्णन कर रहा हूँ। महाप्रभुने अवतरित होकर सङ्कीर्तन धर्मका प्रचार किया, यह बाह्य कारण है जिसे मैंने पहले भी कहा है। इस अवतार लेनेका एक अन्य मुख्य कारण है, जो रसिकशेखर श्रीकृष्णका अपना निजी कार्य है। श्रीगौरसुन्दरके अवतारका अति गूढ़ कारण तीन प्रकारका है, जिसे जगत्में श्रीस्वरूप दामोदरने ही प्रकाशित किया है। श्रीस्वरूप गोसाईं महाप्रभुके अत्यन्त अन्तरङ्ग पार्षद हैं, इसलिये वे महाप्रभुके ये सब रहस्य भली-भाँति जानते हैं॥१०१-१०५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गौर-अवतारका मुख्य कारण अत्यन्त गूढ़ है और वह कारण तीन प्रकारका है। यह बादमें 'श्रीराधायाः प्रणय महिमा' श्लोकमें कहा गया है॥१०४॥ अनुभाष्य-श्रीस्वरूप दामोदरका पूर्व नाम श्रीपुरुषोत्तम भट्टाचार्य था और वे नवद्वीपमें वास करते थे। महाप्रभुके संन्यास लेनेसे पूर्व ही वे स्वयं संन्यास ग्रहण करनेकी अभिलाषासे वाराणसीमें जाकर दशनामी दण्डियोंके दलमें ब्रह्मचारी हुए। इस कारण उनका नाम 'श्रीदामोदरस्वरूप' हुआ। बादमें संन्यासकी प्रक्रियाकी पूर्णताकी अपेक्षा ना करके श्रीमन्महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रयकर आजीवन नीलाचल (जगन्नाथपुरी) में वास किया। वे सब समय श्रीगौरसुन्दरके साथ रहते थे और उनके द्वारा उपदेश किये गये भजनादिका गान करके उनको हर पल प्रसन्नता प्रदान करते थे। श्रीमन्महाप्रभुके हृदयके गूढ़भावोंको उनकी कृपासे ही भक्तोंको जाननेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। व्रजलीलामें ये महात्मा ललितादेवी हैं, जो श्रीमती राधिकाका दूसरा स्वरूप हैं। कविकर्णपूर रचित 'गौरगणोद्देशदीपिका' के अनुसार ये विशाखादेवी हैं- “कलामर्शिक्षयद् राधां या विशाखा व्रजे पुरा। साद्य स्वरूपगोस्वामी तत्तद्भावविलासवान्॥” अर्थात् “पहले व्रजमें जो विशाखा नामक सखी श्रीराधिकाको कला सिखाती थीं, वे ही अब श्रीगौरलीलामें राधाभावमूर्ति श्रीगौरहरिके भावोंमें विलास करनेवाले (उनके द्वितीय स्वरूप) श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी हैं।"॥१०५॥ अमृताणुकणिका-वैष्णव साहित्यमें 'अन्तरङ्ग'-शब्दका विशेष प्रचलन है। अन्तरङ्ग-शब्दका विपरीतार्थक शब्द 'बहिरङ्ग' है। अन्तः+अङ्ग=अन्तरङ्ग अर्थात् निजजन, परमात्मीय। बहिः+रङ्ग=बहिरङ्ग अर्थात् अनात्मीय या बाहरी व्यक्ति। वैष्णवकोषमें 'अन्तरङ्ग' शब्दका तात्पर्य है-स्वयूथाश्रित समचित्तवृत्ति-विशिष्ट, सजातीयाशयस्निग्ध; और उसके विपरीत चित्तवृत्तियुक्त व्यक्ति बहिरङ्ग है। वैष्णव-साहित्यमें विषय और आश्रयके सम्बन्धको लेकर ही 'अन्तरङ्ग' और 'बहिरङ्ग'-शब्दका इस प्रकार प्रयोग होता है। विषयके साथ एकान्त समचित्तवृत्तिविशिष्ट होकर विषयके मनोभीष्ट-परिपूर्णके लिये सर्वक्षण सर्वेन्द्रियोंको नियुक्त करके जीवन-धारण ही 'अन्तरङ्ग'का एकमात्र स्वभाव है। विषयके सुखतात्पर्यताके अतिरिक्त पृथक् भावसे उनकी किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं है। कनक, कामिनी और प्रतिष्ठा-ये सभी 'विषय'-सेवाके उपकरण हैं, यह भावना जिन 'आश्रय'की स्वाभाविक वृत्तिरूपमें अनुक्षण प्रकाशित होती है, वे ही अन्तरङ्ग कहलानेके योग्य हैं। यह अन्तरङ्गता किसी कृत्रिम उपायसे अर्जित नहीं की जा सकती; यह नित्यसिद्ध स्वरूप-वृत्ति है। १९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
स्वरूप दामोदरको महाप्रभुका अन्तरङ्ग कहा है, क्योंकि वे महाप्रभुके साथ समचित्तवृत्ति-विशिष्ट हैं। अप्राकृत विप्रलम्भ-विग्रह महाप्रभुकी चित्तवृत्तिके साथ सम्भोग-चित्तवृत्तिविशिष्ट व्यक्तिका मिलन नहीं हो सकता। जो सर्वतोभावेन सर्वाङ्गसे सर्वक्षण महाप्रभुके उस विप्रलम्भरसकी पुष्टि करते हैं, वे ही उनके अन्तरङ्ग हैं। उसमें किसी बाह्य विचारका अवकाश नहीं है। स्त्री या पुरुष, गृहस्थ या संन्यासी, ब्राह्मण या शूद्र-इन सब बाह्य पोशाकका किसी प्रकारका विचार अन्तरङ्गके विचारमें नहीं है। श्रीस्वरूप दामोदर बाह्य-दर्शनसे त्यागी वेश धारण करके रहते थे और उनकी गणना महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंके मध्य होती है; और श्रीराय रामानन्द विषयी गृहस्थ या ब्राह्मणेतर (कायस्थ) कुलमें आविर्भूत होनेकी लीला प्रदर्शन करके भी महाप्रभुके नित्यसिद्ध अन्तरङ्ग भक्त हैं। माधवी माताकी बाह्य दर्शनसे स्त्री होनेपर भी उनकी गणना महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंमें होती है। और अन्यत्र श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने कहा है (अन्त्य ६/६, ८-११)- “रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर गान। विरह-वेदनाय प्रभुर राखये पराण ॥६॥ ताँर सुखहेतु सङ्गे रहे दुइजना। कृष्णरस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥८॥ सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय। गौरसुखदान-हेतु तैछे राम-राय ॥९॥ पूर्वे यैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान। तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे प्रभुर प्राण ॥१०॥ दुइ जनार सौभाग्य कहन ना याय। प्रभुर ‘अन्तरङ्ग’ बलि’ याँरे लोके गाय ॥ ११ ॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण विरह-वेदनासे पीड़ित महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा श्रीराय रामानन्दकी श्रीकृष्णकथा और श्रीस्वरूप दामोदरके गानके द्वारा ही होती थी। उनके सुखके लिये ही ये दोनों जन सदा उनके साथ रहते थे और श्रीकृष्णरस, श्लोक और गीतोंके द्वारा उन्हें सान्त्वना प्रदान करते थे। श्रीकृष्णलीलामें जैसे सुबल श्रीकृष्णके सुखके सहायक थे, वैसे ही श्रीगौरको सुख प्रदान करनेके लिये श्रीराय रामानन्द हैं। पूर्वकालमें जैसे ललिताजी श्रीराधाकी परम सहायिका थीं, वैसे ही श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा करते हैं। इन दोनोंके सौभाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता, इन दोनोंको महाप्रभुका अन्तरङ्ग कहकर लोग इनकी महिमाका गान करते हैं।” उपरोक्त पदसमूहसे स्पष्ट होता है कि विषयकी सुखानुसन्धान-परता और समचित्तवृत्तिविशिष्टता ही अन्तरङ्गताका लक्षण है। जहाँ विषयके साथ आन्तरिक समचित्तवृत्ति नहीं है, अपितु विषयके सुखानुसन्धान-चेष्टाका छल या अभिनय है, वह अन्तरङ्गताका लक्षण नहीं है। सजातीयाशयस्निग्धता और स्वयूथाश्रित समचित्तवृत्ति ही अन्तरङ्गताका लक्षण है। कोई-कोई मानते हैं-जो गुरु-वैष्णवकी इच्छानुरूप बाह्यतत्परता प्रदर्शन करते हैं, किंवा उनकी दैहिक परिचर्या करते हैं, या अनुक्षण उनके साथ रहते हैं, वे ही अन्तरङ्ग हैं।
चौथा अध्याय | १९५
[ ४/१०५-१०६ समचित्तवृत्तिविशिष्ट ना होनेसे आचार्यकी इच्छानुरूप चेष्टाका बाह्य अभिनय करनेपर भी उनकी अन्तरङ्गकी श्रेणीमें गणना नहीं हो सकती। भुवन-पूजिता दुर्गा सृष्टि-स्थिति-प्रलयके लिये श्रीकृष्णकी इच्छानुरूप निरन्तर चेष्टा करनेपर भी 'बहिरङ्गा' शक्ति या छायाशक्ति कहलाती हैं। दुर्गादेवी कितनी कर्मतत्परता और विक्रम प्रदर्शित करके भगवान्के बाह्य वपुस्वरूप इस जगत्की सेवामें नियुक्त हैं; सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि कार्यके द्वारा कितने कोटि ब्रह्माण्डोंके अन्तर्गत जीवोंकी चमत्कारिता विधान करती हैं, कितनी अघटन-घटन-पटीयसी शक्ति प्रकाश करती हैं, किन्तु वे सात्वतजनोंके द्वारा बहिरङ्गा या आवरिका शक्ति ही कही जाती हैं। जो शरीरका अधिक आदर करते हैं—वे इस बहिरङ्गा शक्तिको ही 'अन्तरङ्गा शक्ति' कहकर प्रचार करते हैं और स्वयंको उनका 'अन्तरङ्ग भक्त' कहनेमें झिझकते नहीं हैं। किन्तु श्रीगोविन्द-सेवात्पर ब्रह्माजीकी वाणीमें यह सुनते हैं (ब्रह्मसंहिता ४४)— “सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा। इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥” अर्थात् “स्वरूपशक्ति या चित्-शक्तिकी छायारूपा प्रापञ्चिक जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकारिणी मायाशक्ति ही भुवन पूजिता 'दुर्गा' जी हैं। वे जिनकी इच्छाके अनुसार सारी चेष्टाएँ करती हैं, उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ।” अतः इच्छानुरूप चेष्टाका अभिनयमात्र ही अन्तरङ्ग सेवा नहीं है, और विराट् कर्मतत्परता या जाड्य किसी सेवाका लक्षण नहीं है। समचित्तवृत्तिविशिष्ट होकर हरि-गुरु-वैष्णवका मनोऽभीष्ट आचार और प्रचार ही अन्तरङ्ग भक्तका स्वभाव है॥१०५॥ श्रीराधाके महाभावमें मग्न श्रीगौरसुन्दर :- राधिकार भावमूर्त्ति प्रभुर अन्तर। सेइभावे सुख-दुःख उठे निरन्तर ॥ १०६ ॥ अनुवाद—श्रीमन्महाप्रभुका हृदय श्रीमती राधिकाके भावोंकी मूर्ति है। उन्हीं भावोंके अनुरूप उनके हृदयमें निरन्तर सुख-दुःख प्रकट होते थे॥१०६॥ अनुभाष्य—श्रीगौरसुन्दरका हृदय श्रीमती राधिकाके भावोंका मूर्त्तरूप है। 'भावमूर्ति'—शब्दसे स्थूलबुद्धि जड़ेन्द्रिय भोगोंमें रत लोग भावमय मूर्तिके स्वरूपकी उपलब्धि करनेमें असमर्थ हैं। अनर्थमुक्त जातरति भक्त आश्रिततत्त्व-विचारसे शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्य-मधुर, इन पाँच प्रकारके दिखायी देते हैं। श्रीमती राधिकाके भाव मधुररसकी परमोन्नत और सम्पूर्ण अवस्था हैं। वे भाव 'रूढ़' और 'अधिरूढ़' भेदसे दो प्रकारके हैं। भागवतमें महिषीगीत और गोपीगीतमें 'रूढ़' और 'अधिरूढ़', इन दो भावोंकी अभिव्यक्ति हुई है। श्रीगौरसुन्दरमें अधिरूढ़ महाभावका ही प्रकाश देखा जाता है। विधिके दूर होनेसे, लोभके विचारसे द्वारकाका अधिरूढ़ भाव गोकुलके भावमें पर्यवसित हुआ है। श्रीगौरसुन्दरके हृदयमें श्रीकृष्णविरहरूप विप्रलम्भ-दुःखाभास और श्रीकृष्ण-प्राप्तिरूप सम्भोगसुख प्रतिक्षण उदित होकर भावनाओंके पथका अतिक्रमणकर मधुररसका आस्वादन होता था। १९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
जो लोग भाव (चिन्मय भाव) और अभाव (जड़ीय भाव) का भेद नहीं समझते हैं, वे 'अधिरूढ़' महाभावको भी जड़ीय भावके समान मान बैठते हैं। इस कारण उन लोगोंको अपने स्वरूप अर्थात् जीव आश्रित-तत्त्व है, इस बातकी उपलब्धि नहीं होती है। स्वरूपका उदय ना होनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त जीव श्रीगौरसुन्दरको व्रजनागरी श्रीमती राधिकाके भावोंमें उन्मत्त ना जानकर अपने जड़ीय भोगके विषय-ज्ञानसे उन्हें 'नागर' कह कर रसाभासके दोषी होते हैं॥१०६॥ शेषलीलाय प्रभुर कृष्णविरह-उन्माद। भ्रममय चेष्टा, आर प्रलापमय वाद॥१०७॥ अनुवाद—शेषलीलामें गम्भीरामें अवस्थान कालमें महाप्रभु सब समय श्रीकृष्णविरहमें उन्माद दशामें रहते थे। [प्राकृत विद्वानोंको] उनकी चेष्टाएँ भ्रममय और उनके वचन प्रलाप जैसे लगते थे॥१०७॥ अनुभाष्य—श्रीगौरहरिने सिद्ध भक्तकी चेष्टाके द्वारा विप्रलम्भ रसके चरमोत्कर्षका प्रदर्शन किया है। परन्तु प्राकृत विद्वान उनकी उस साक्षात् अनुभूतिको प्रलाप वाक्य और भ्रममय चेष्टाएँ ही मानते थे। सदा इन्द्रिय भोगोंमें लिप्त, भौतिक त्रितापमें जलते हुए मूढ़ व्यक्तियोंका सेव्य-वस्तु चिन्मयी मूर्तिमें आकर्षण नहीं होता। वे जैसे प्रत्यक्ष जगत्को अपने भोगका केन्द्र मानते हैं, वैसे ही वे श्रीगौरसुन्दरकी अप्राकृत लीलाको भी जड़भोगके समान ही समझते हैं। विकृत 'नदिया-नागरी'-वाद नामक असत् मतका आनुगत्यकर इन्द्रियभोगकी चेष्टा श्रीगौरसुन्दर और उनके अनुगत भक्तोंके द्वारा प्रदर्शित पथ नहीं है। ये मतवादी लोग जड़भोगवादी हैं, इसलिये विष्णुविद्वेषी हैं॥१०७॥ राधिकार भाव यैछे उद्धवदर्शने। सेइ भावे मत्त प्रभु रहे रात्रिदिने॥१०८॥ अनुवाद—उद्धवजीको देखकर माथुर विरहणी श्रीमती राधिका जैसे दिव्योन्मादकी दशाको प्राप्त हुई थीं, महाप्रभु भी रात-दिन उसी भावमें मत्त रहते थे॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने अपना कुशल-संवाद देनेके लिये मथुरासे उद्धवजीको गोपियोंके पास भेजा था। उद्धवजीको देखकर श्रीमती राधिकाने कई विचित्र भावोंको प्रकाश किया था॥१०८॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने गोपियों और पिता-माताकी उत्कण्ठाको कुछ कम करनेकी इच्छासे अपने सुहृद् उद्धवको गोकुलमें भेजा था। श्रीकृष्ण-सुहृद उद्धवजीको देखकर श्रीमती राधिकाने अपने सुतीव्र सर्वोच्च उत्कण्ठामय प्रचुर भावमय गूढ़ रोषको विविध शब्दोंमें प्रकाशित किया था, उन्हीं माथुर-विरहकातर भावोंमें श्रीगौरसुन्दर श्रीराधात्मयता लाभकर सर्वदा मत्त रहते थे—यही 'चित्रजल्प' भाव है। उज्ज्वलनीलमणीमें चित्रजल्पकी परिभाषा— “प्रेष्ठस्य सुहृदालोके गूढ़रोषाभिजृम्भितः। भूरिभावमयो जल्पो यस्तीव्रोत्कण्ठितान्तिमः॥” अर्थात् “प्रियजनके सुहृदके साथ भेंट होनेपर अवहित्था अवलम्बनसे गूढ़ रोषके कारण
चौथा अध्याय | १९७
[ ४/१०८-११३ सुप्रकाशित—गर्व, असूया, दैन्य, चापल्य, औत्सुक्यादि भावोंमें प्रचुर और अन्तमें तीव्र उत्कण्ठा-विशिष्ट आलापको चित्रजल्प कहते हैं।” श्रीगौरपादाश्रित भक्तोंके लिये यह सुदीर्घ विप्रलम्भ ही श्रीकृष्णभजन है। सुदीर्घ विप्रलम्भ ही सम्भोगका कारण है, इस बातको बहुत लोग नहीं समझते हैं। सम्भोगका स्वरूपज्ञान ना होनेके कारण वे नहीं जानते कि साधकावस्था और सिद्धावस्था, दोनोंमें ही विप्रलम्भ-रसोद्दीपन आवश्यक है॥१०८॥ महाप्रभुके हृदयभाव-प्रकाश और स्वरूपदामोदरका उन्हें सुख प्रदान :- रात्रे प्रलाप करे स्वरूपेर कण्ठ धरि'। आवेशे आपन भाव कहये उघाड़ि'॥१०९॥ यबे येइ भाव उठे प्रभुर अन्तर। सेइ गीत-श्लोके सुख देन दामोदर ॥११०॥ अनुवाद-महाप्रभु रात भर श्रीस्वरूप दामोदरके गलेमें हाथ डालकर प्रलाप करते हुए अपने भावोंको खोलकर कहते। जब जिस प्रकारका भाव महाप्रभुके हृदयमें उठता था, तब श्रीस्वरूप दामोदर उसी भावके अनुरूप गीत अथवा श्लोक सुनाकर उन्हें सुख प्रदान करते॥१०९-११०॥ एबे कार्य नाहि, किछु एसब विचारे। आगे इहा विवरिब करिया विस्तारे॥१११॥ अनुवाद-अभी यह सब विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है, बादमें इसे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥१११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे इहा' अर्थात् अन्त्यलीलामें॥१११॥ व्रजमें तीन प्रकारके वयस (अवस्था) धर्म :- पूर्वे व्रजे कृष्णेर त्रिविध वयोधर्म। कौमार, पौगण्ड, आर कैशोर अतिमर्म ॥ ११२॥ अनुवाद-पूर्वकालमें व्रजमें श्रीकृष्णकी कौमार, पौगण्ड और कैशोर-अवस्थाभेदसे तीन प्रकारकी लीलाएँ दिखायी देती हैं। इनमें कैशोर अवस्था अतिश्रेष्ठ और विशेषरूपसे सार्थक है॥११२॥ श्रीकृष्णकी अवस्था-भेदसे लीला-भेद :- वात्सल्य-आवेशे कैल कौमार सफल। पौगण्ड सफल कैल लञा सखाबल॥११३॥ अनुवाद-वात्सल्य रसका आस्वादनकर श्रीकृष्णने कौमार अवस्थाको सफल किया और सखाओंके साथ क्रीड़ा (खेलकूद) में पौगण्ड अवस्थाको सफल किया॥११३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पाँच वर्षकी आयु तक 'कौमार'; दस वर्षकी आयु तक 'पौगण्ड'; ग्यारहसे सोलह वर्षकी आयु तक 'कैशोर' और उसके बाद 'यौवन' काल होता है। श्रीकृष्णने कौमार अवस्थामें वात्सल्य, पौगण्ड अवस्थामें सख्य और कैशोर अवस्थामें शृङ्गार-रसका आस्वादन किया॥११२-११३॥ १९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/११४-११५ ] किशोरलीलामें सभीकी सार्थकता-सम्पादन :- राधिकादि लञा कैल रासादि-विलास। वाञ्छा भरि' आस्वादिल रसेर निर्यास॥ ११४॥ अनुवाद—राधिका आदि सखिओंके साथ रास-विलास करते हुए श्रीकृष्णने अपनी इच्छानुसार पूर्णरूपसे रसके निर्यासका आस्वादन किया॥ ११४॥ कैशोर-वयसे काम, जगत्सकल। रासादि-लीलाय तिन करिल सफल॥ ११५॥* अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'काम' अर्थात् साक्षात् मन्मथ (कामदेव) स्वरूप स्वेच्छामय श्रीकृष्णने कैशोर अवस्थामें रासादि लीला करके सम्पूर्ण जगत्को और बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—इन तीन अवस्थाओंको सफल किया॥ ११५॥ *अन्यान्य संस्करणोंमें ऐसा भी मिलता है— “कैशोर वयस, काम, जगत्सकल। रासादि-लीलाय तिन करिल सफल॥” अमृताणुकणिका—'कैशोर-वयसे'—कैशोर अवस्था आनेपर युवतीको अपने प्रति अनुरागवान, रूप-गुण-सम्पन्न किसी विदग्ध युवकके सङ्गकी इच्छा होती है और युवकको भी ऐसी रूप-गुण-सम्पन्ना युवतीके सङ्गकी अभिलाषा होती है। यही कैशोर अवस्थाका कार्य है। मिलन सुखकी असमोर्ध्व वैचित्री और उसके पूर्णतम आस्वादनके निमित्त नायक-नायिकामें नायकोचित और नायिकोचित रूप-गुणादिकी भी पूर्णतम अभिव्यक्ति आवश्यक है। किन्तु प्राकृत नायक-नायिकामें यह असम्भव है, क्योंकि प्राकृत नायक-नायिकाके रूप-गुणादि क्षुद्र, असम्पूर्ण और अचिरस्थायी हैं; उनकी देहमें कैशोर अवस्था भी अस्थायी है; उनका परस्परके प्रति जो अनुराग है, यह भी स्वसुख-वासनामूलक और मोहजनित है, स्वाभाविक नहीं। उनके मिलनमें कैशोर अवस्था सफलता लाभ नहीं करती, क्योंकि उसमें अविच्छिन्न सुख नहीं है ('नाल्पे सुखमस्ति'—अल्पमें सुख नहीं है)। इसलिये प्राकृत नायक-नायिकाके मिलनमें कैशोर अवस्थाकी सफलता असम्भव है। अप्राकृत भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहोंके और उनकी प्रेयसिगणोंके रूप-गुणादि नित्य हैं, उनके विग्रहोंमें किशोर अवस्था भी नित्य अवस्थान करती है। उनके रूप-गुणादि भी अन्योंके रूप-गुणादिकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। भगवत्-प्रेयसियाँ श्रीभगवान्की स्वरूपशक्ति ह्लादिनीकी अभिव्यक्ति हैं, इसलिये उनका परस्परके प्रति अनुराग भी स्वाभाविक है। इसलिये अप्राकृत भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहों और भगवत्-प्रेयसियोंके आश्रयमें ही कैशोर अवस्थाकी सफलता सम्भव है। किन्तु जिस स्वरूपमें रूप-गुणादिकी असमोर्ध्व अभिव्यक्ति है, उसी स्वरूपके आश्रयमें ही कैशोर अवस्थाकी पूर्णतम सफलता है। अनन्त भगवत्-स्वरूपोंमें स्वयंरूप श्रीकृष्णमें ही रूप-गुणादिकी असमोर्ध्व अभिव्यक्ति है; उनके रूप-गुणसे नारायणादि अन्यान्य भगवत्-स्वरूप तो आकृष्ट होते ही हैं, स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने रूपसे आकृष्ट हो चौथा अध्याय | १९९
[ ४/११५-११६ जाते हैं। श्रीकृष्णके रूपकी कथा सुनकर नारायणकी वक्षस्थल-विलासिनी लक्ष्मीजीका चित्त भी चञ्चल हो जाता है। समस्त भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहकी जो समस्त प्रेयसियाँ हैं, उनके मध्य रूप-गुण-वैदग्धी आदि सब विषयोंमें ब्रजगोपियाँ ही श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णमें उनका अनुराग इतना अधिक है कि वे अपने सुख-दुःखका विचार नहीं करके केवल श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये ही सभी चेष्टाएँ करती हैं और श्रीकृष्णके लिये ही वे सभी कुछ परित्याग भी करती हैं। इसलिये गोपियोंमें नायिकोचित गुणसमूहोंका पूर्णतम विकास है और उसका चरम सीमा श्रीमती राधिकामें है। श्रीकृष्णका भी गोपियोंके प्रति इतना अनुराग है कि वे स्वयंको उनके प्रेमका ऋणी मानते हैं और श्रीकृष्णमें भी नायकोचित गुणोंका पूर्णतम विकास है। नायक-नायिकाका अवलम्बन करके ही कैशोरवयसोचित रसकी स्फूर्ति होती है। इसलिये नायकश्रेष्ठ व्रजेन्द्रनन्दनके साथ नायिकाश्रेष्ठा श्रीराधाके मिलनमें कैशोरवयसोचित रसका पूर्णतम विकास सम्भव है। इसलिये समस्त भगवत्-स्वरूपों और उनकी प्रेयसिगणोंकी लीलाओंमेंसे व्रजाङ्गनाओंके साथ श्रीकृष्णकी रासलीला सर्वश्रेष्ठ है। इसे स्वयं श्रीकृष्णने अपने मुखसे व्यक्त किया है-लघुभागवतामृत कृष्ण-विभाग (श्लोक ५३१)में- “सन्ति यद्यपि मे प्राज्या लीलास्तास्ता मनोहराः। न हि जाने स्मृते रासे मनो मे कीदृशं भवेत्॥” अर्थात् “यद्यपि मेरी अनेक प्रकारकी मनोहारी प्रचुर लीलाएँ विद्यमान हैं, तो भी रासलीलाका स्मरण करते ही मेरा मन जिस प्रकार भावापन्न होता है, उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता।” इस रासलीलामें लक्ष्मीका अधिकार भी नहीं है, द्वारकाकी महिषियोंके अधिकारके विषयमें भी नहीं सुना जाता है। एकमात्र श्रीराधिका और उनकी कायव्यूहा व्रजदेवियोंका इस रासलीलामें अधिकार है। सौन्दर्य-माधुर्य-विलास-वैदग्धी आदिमें निखिल रमणियोंकी शिरोमणि नित्यकिशोरी व्रजाङ्गनाओंके साथ निखिल पुरुषकुल-शिरोमणि नित्यकिशोर व्रजेन्द्रनन्दनकी रासलीलामें ही निखिल विलास वैचित्री और निखिल रस-वैचित्रीकी निर्बाधरूपसे पूर्णतम अभिव्यक्ति सम्भव है। इसलिये कैशोर अवस्था श्रीकृष्णका आश्रय करके इस रासलीलामें ही अपनी सार्थकताकी पराकाष्ठा लाभ करती है॥११५॥ विष्णुपुराण (५/१३/६०)- सोऽपि कैशोरक-वयो मानयन्मधुसूदनः। रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थः क्षपासु क्षपिताहितः॥११६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अमङ्गलशून्य श्रीकृष्णने कैशोर-अवस्थामें रात्रिमें स्त्रियोंके सङ्ग विहार करते हुए कैशोर-अवस्थाको विशेष सम्मान प्रदान किया। महाभावमयी श्रीराधा और भावमयी गोपियोंके मध्य स्थित परमचैतन्य श्रीकृष्ण ही कूटस्थ तत्त्व हैं॥११६॥ अनुभाष्य-क्षपिताहितः (क्षपितं विनाशितं अहितं अकल्याणं येन सः) सोऽपि मधुसूदनः (श्रीकृष्णः अपि) २०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत