श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो लोग भाव (चिन्मय भाव) और अभाव (जड़ीय भाव) का भेद नहीं समझते हैं, वे 'अधिरूढ़' महाभावको भी जड़ीय भावके समान मान बैठते हैं। इस कारण उन लोगोंको अपने स्वरूप अर्थात् जीव आश्रित-तत्त्व है, इस बातकी उपलब्धि नहीं होती है। स्वरूपका उदय ना होनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त जीव श्रीगौरसुन्दरको व्रजनागरी श्रीमती राधिकाके भावोंमें उन्मत्त ना जानकर अपने जड़ीय भोगके विषय-ज्ञानसे उन्हें 'नागर' कह कर रसाभासके दोषी होते हैं॥१०६॥ शेषलीलाय प्रभुर कृष्णविरह-उन्माद। भ्रममय चेष्टा, आर प्रलापमय वाद॥१०७॥ अनुवाद—शेषलीलामें गम्भीरामें अवस्थान कालमें महाप्रभु सब समय श्रीकृष्णविरहमें उन्माद दशामें रहते थे। [प्राकृत विद्वानोंको] उनकी चेष्टाएँ भ्रममय और उनके वचन प्रलाप जैसे लगते थे॥१०७॥ अनुभाष्य—श्रीगौरहरिने सिद्ध भक्तकी चेष्टाके द्वारा विप्रलम्भ रसके चरमोत्कर्षका प्रदर्शन किया है। परन्तु प्राकृत विद्वान उनकी उस साक्षात् अनुभूतिको प्रलाप वाक्य और भ्रममय चेष्टाएँ ही मानते थे। सदा इन्द्रिय भोगोंमें लिप्त, भौतिक त्रितापमें जलते हुए मूढ़ व्यक्तियोंका सेव्य-वस्तु चिन्मयी मूर्तिमें आकर्षण नहीं होता। वे जैसे प्रत्यक्ष जगत्को अपने भोगका केन्द्र मानते हैं, वैसे ही वे श्रीगौरसुन्दरकी अप्राकृत लीलाको भी जड़भोगके समान ही समझते हैं। विकृत 'नदिया-नागरी'-वाद नामक असत् मतका आनुगत्यकर इन्द्रियभोगकी चेष्टा श्रीगौरसुन्दर और उनके अनुगत भक्तोंके द्वारा प्रदर्शित पथ नहीं है। ये मतवादी लोग जड़भोगवादी हैं, इसलिये विष्णुविद्वेषी हैं॥१०७॥ राधिकार भाव यैछे उद्धवदर्शने। सेइ भावे मत्त प्रभु रहे रात्रिदिने॥१०८॥ अनुवाद—उद्धवजीको देखकर माथुर विरहणी श्रीमती राधिका जैसे दिव्योन्मादकी दशाको प्राप्त हुई थीं, महाप्रभु भी रात-दिन उसी भावमें मत्त रहते थे॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने अपना कुशल-संवाद देनेके लिये मथुरासे उद्धवजीको गोपियोंके पास भेजा था। उद्धवजीको देखकर श्रीमती राधिकाने कई विचित्र भावोंको प्रकाश किया था॥१०८॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने गोपियों और पिता-माताकी उत्कण्ठाको कुछ कम करनेकी इच्छासे अपने सुहृद् उद्धवको गोकुलमें भेजा था। श्रीकृष्ण-सुहृद उद्धवजीको देखकर श्रीमती राधिकाने अपने सुतीव्र सर्वोच्च उत्कण्ठामय प्रचुर भावमय गूढ़ रोषको विविध शब्दोंमें प्रकाशित किया था, उन्हीं माथुर-विरहकातर भावोंमें श्रीगौरसुन्दर श्रीराधात्मयता लाभकर सर्वदा मत्त रहते थे—यही 'चित्रजल्प' भाव है। उज्ज्वलनीलमणीमें चित्रजल्पकी परिभाषा— “प्रेष्ठस्य सुहृदालोके गूढ़रोषाभिजृम्भितः। भूरिभावमयो जल्पो यस्तीव्रोत्कण्ठितान्तिमः॥” अर्थात् “प्रियजनके सुहृदके साथ भेंट होनेपर अवहित्था अवलम्बनसे गूढ़ रोषके कारण
चौथा अध्याय | १९७