भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/१०८-११३ सुप्रकाशित—गर्व, असूया, दैन्य, चापल्य, औत्सुक्यादि भावोंमें प्रचुर और अन्तमें तीव्र उत्कण्ठा-विशिष्ट आलापको चित्रजल्प कहते हैं।” श्रीगौरपादाश्रित भक्तोंके लिये यह सुदीर्घ विप्रलम्भ ही श्रीकृष्णभजन है। सुदीर्घ विप्रलम्भ ही सम्भोगका कारण है, इस बातको बहुत लोग नहीं समझते हैं। सम्भोगका स्वरूपज्ञान ना होनेके कारण वे नहीं जानते कि साधकावस्था और सिद्धावस्था, दोनोंमें ही विप्रलम्भ-रसोद्दीपन आवश्यक है॥१०८॥ महाप्रभुके हृदयभाव-प्रकाश और स्वरूपदामोदरका उन्हें सुख प्रदान :- रात्रे प्रलाप करे स्वरूपेर कण्ठ धरि'। आवेशे आपन भाव कहये उघाड़ि'॥१०९॥ यबे येइ भाव उठे प्रभुर अन्तर। सेइ गीत-श्लोके सुख देन दामोदर ॥११०॥ अनुवाद-महाप्रभु रात भर श्रीस्वरूप दामोदरके गलेमें हाथ डालकर प्रलाप करते हुए अपने भावोंको खोलकर कहते। जब जिस प्रकारका भाव महाप्रभुके हृदयमें उठता था, तब श्रीस्वरूप दामोदर उसी भावके अनुरूप गीत अथवा श्लोक सुनाकर उन्हें सुख प्रदान करते॥१०९-११०॥ एबे कार्य नाहि, किछु एसब विचारे। आगे इहा विवरिब करिया विस्तारे॥१११॥ अनुवाद-अभी यह सब विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है, बादमें इसे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥१११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे इहा' अर्थात् अन्त्यलीलामें॥१११॥ व्रजमें तीन प्रकारके वयस (अवस्था) धर्म :- पूर्वे व्रजे कृष्णेर त्रिविध वयोधर्म। कौमार, पौगण्ड, आर कैशोर अतिमर्म ॥ ११२॥ अनुवाद-पूर्वकालमें व्रजमें श्रीकृष्णकी कौमार, पौगण्ड और कैशोर-अवस्थाभेदसे तीन प्रकारकी लीलाएँ दिखायी देती हैं। इनमें कैशोर अवस्था अतिश्रेष्ठ और विशेषरूपसे सार्थक है॥११२॥ श्रीकृष्णकी अवस्था-भेदसे लीला-भेद :- वात्सल्य-आवेशे कैल कौमार सफल। पौगण्ड सफल कैल लञा सखाबल॥११३॥ अनुवाद-वात्सल्य रसका आस्वादनकर श्रीकृष्णने कौमार अवस्थाको सफल किया और सखाओंके साथ क्रीड़ा (खेलकूद) में पौगण्ड अवस्थाको सफल किया॥११३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पाँच वर्षकी आयु तक 'कौमार'; दस वर्षकी आयु तक 'पौगण्ड'; ग्यारहसे सोलह वर्षकी आयु तक 'कैशोर' और उसके बाद 'यौवन' काल होता है। श्रीकृष्णने कौमार अवस्थामें वात्सल्य, पौगण्ड अवस्थामें सख्य और कैशोर अवस्थामें शृङ्गार-रसका आस्वादन किया॥११२-११३॥ १९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत