श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/११४-११५ ] किशोरलीलामें सभीकी सार्थकता-सम्पादन :- राधिकादि लञा कैल रासादि-विलास। वाञ्छा भरि' आस्वादिल रसेर निर्यास॥ ११४॥ अनुवाद—राधिका आदि सखिओंके साथ रास-विलास करते हुए श्रीकृष्णने अपनी इच्छानुसार पूर्णरूपसे रसके निर्यासका आस्वादन किया॥ ११४॥ कैशोर-वयसे काम, जगत्सकल। रासादि-लीलाय तिन करिल सफल॥ ११५॥* अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'काम' अर्थात् साक्षात् मन्मथ (कामदेव) स्वरूप स्वेच्छामय श्रीकृष्णने कैशोर अवस्थामें रासादि लीला करके सम्पूर्ण जगत्को और बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—इन तीन अवस्थाओंको सफल किया॥ ११५॥ *अन्यान्य संस्करणोंमें ऐसा भी मिलता है— “कैशोर वयस, काम, जगत्सकल। रासादि-लीलाय तिन करिल सफल॥” अमृताणुकणिका—'कैशोर-वयसे'—कैशोर अवस्था आनेपर युवतीको अपने प्रति अनुरागवान, रूप-गुण-सम्पन्न किसी विदग्ध युवकके सङ्गकी इच्छा होती है और युवकको भी ऐसी रूप-गुण-सम्पन्ना युवतीके सङ्गकी अभिलाषा होती है। यही कैशोर अवस्थाका कार्य है। मिलन सुखकी असमोर्ध्व वैचित्री और उसके पूर्णतम आस्वादनके निमित्त नायक-नायिकामें नायकोचित और नायिकोचित रूप-गुणादिकी भी पूर्णतम अभिव्यक्ति आवश्यक है। किन्तु प्राकृत नायक-नायिकामें यह असम्भव है, क्योंकि प्राकृत नायक-नायिकाके रूप-गुणादि क्षुद्र, असम्पूर्ण और अचिरस्थायी हैं; उनकी देहमें कैशोर अवस्था भी अस्थायी है; उनका परस्परके प्रति जो अनुराग है, यह भी स्वसुख-वासनामूलक और मोहजनित है, स्वाभाविक नहीं। उनके मिलनमें कैशोर अवस्था सफलता लाभ नहीं करती, क्योंकि उसमें अविच्छिन्न सुख नहीं है ('नाल्पे सुखमस्ति'—अल्पमें सुख नहीं है)। इसलिये प्राकृत नायक-नायिकाके मिलनमें कैशोर अवस्थाकी सफलता असम्भव है। अप्राकृत भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहोंके और उनकी प्रेयसिगणोंके रूप-गुणादि नित्य हैं, उनके विग्रहोंमें किशोर अवस्था भी नित्य अवस्थान करती है। उनके रूप-गुणादि भी अन्योंके रूप-गुणादिकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। भगवत्-प्रेयसियाँ श्रीभगवान्की स्वरूपशक्ति ह्लादिनीकी अभिव्यक्ति हैं, इसलिये उनका परस्परके प्रति अनुराग भी स्वाभाविक है। इसलिये अप्राकृत भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहों और भगवत्-प्रेयसियोंके आश्रयमें ही कैशोर अवस्थाकी सफलता सम्भव है। किन्तु जिस स्वरूपमें रूप-गुणादिकी असमोर्ध्व अभिव्यक्ति है, उसी स्वरूपके आश्रयमें ही कैशोर अवस्थाकी पूर्णतम सफलता है। अनन्त भगवत्-स्वरूपोंमें स्वयंरूप श्रीकृष्णमें ही रूप-गुणादिकी असमोर्ध्व अभिव्यक्ति है; उनके रूप-गुणसे नारायणादि अन्यान्य भगवत्-स्वरूप तो आकृष्ट होते ही हैं, स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने रूपसे आकृष्ट हो चौथा अध्याय | १९९