भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 242

[ ४/११५-११६ जाते हैं। श्रीकृष्णके रूपकी कथा सुनकर नारायणकी वक्षस्थल-विलासिनी लक्ष्मीजीका चित्त भी चञ्चल हो जाता है। समस्त भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहकी जो समस्त प्रेयसियाँ हैं, उनके मध्य रूप-गुण-वैदग्धी आदि सब विषयोंमें ब्रजगोपियाँ ही श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णमें उनका अनुराग इतना अधिक है कि वे अपने सुख-दुःखका विचार नहीं करके केवल श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये ही सभी चेष्टाएँ करती हैं और श्रीकृष्णके लिये ही वे सभी कुछ परित्याग भी करती हैं। इसलिये गोपियोंमें नायिकोचित गुणसमूहोंका पूर्णतम विकास है और उसका चरम सीमा श्रीमती राधिकामें है। श्रीकृष्णका भी गोपियोंके प्रति इतना अनुराग है कि वे स्वयंको उनके प्रेमका ऋणी मानते हैं और श्रीकृष्णमें भी नायकोचित गुणोंका पूर्णतम विकास है। नायक-नायिकाका अवलम्बन करके ही कैशोरवयसोचित रसकी स्फूर्ति होती है। इसलिये नायकश्रेष्ठ व्रजेन्द्रनन्दनके साथ नायिकाश्रेष्ठा श्रीराधाके मिलनमें कैशोरवयसोचित रसका पूर्णतम विकास सम्भव है। इसलिये समस्त भगवत्-स्वरूपों और उनकी प्रेयसिगणोंकी लीलाओंमेंसे व्रजाङ्गनाओंके साथ श्रीकृष्णकी रासलीला सर्वश्रेष्ठ है। इसे स्वयं श्रीकृष्णने अपने मुखसे व्यक्त किया है-लघुभागवतामृत कृष्ण-विभाग (श्लोक ५३१)में- “सन्ति यद्यपि मे प्राज्या लीलास्तास्ता मनोहराः। न हि जाने स्मृते रासे मनो मे कीदृशं भवेत्॥” अर्थात् “यद्यपि मेरी अनेक प्रकारकी मनोहारी प्रचुर लीलाएँ विद्यमान हैं, तो भी रासलीलाका स्मरण करते ही मेरा मन जिस प्रकार भावापन्न होता है, उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता।” इस रासलीलामें लक्ष्मीका अधिकार भी नहीं है, द्वारकाकी महिषियोंके अधिकारके विषयमें भी नहीं सुना जाता है। एकमात्र श्रीराधिका और उनकी कायव्यूहा व्रजदेवियोंका इस रासलीलामें अधिकार है। सौन्दर्य-माधुर्य-विलास-वैदग्धी आदिमें निखिल रमणियोंकी शिरोमणि नित्यकिशोरी व्रजाङ्गनाओंके साथ निखिल पुरुषकुल-शिरोमणि नित्यकिशोर व्रजेन्द्रनन्दनकी रासलीलामें ही निखिल विलास वैचित्री और निखिल रस-वैचित्रीकी निर्बाधरूपसे पूर्णतम अभिव्यक्ति सम्भव है। इसलिये कैशोर अवस्था श्रीकृष्णका आश्रय करके इस रासलीलामें ही अपनी सार्थकताकी पराकाष्ठा लाभ करती है॥११५॥ विष्णुपुराण (५/१३/६०)- सोऽपि कैशोरक-वयो मानयन्मधुसूदनः। रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थः क्षपासु क्षपिताहितः॥११६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अमङ्गलशून्य श्रीकृष्णने कैशोर-अवस्थामें रात्रिमें स्त्रियोंके सङ्ग विहार करते हुए कैशोर-अवस्थाको विशेष सम्मान प्रदान किया। महाभावमयी श्रीराधा और भावमयी गोपियोंके मध्य स्थित परमचैतन्य श्रीकृष्ण ही कूटस्थ तत्त्व हैं॥११६॥ अनुभाष्य-क्षपिताहितः (क्षपितं विनाशितं अहितं अकल्याणं येन सः) सोऽपि मधुसूदनः (श्रीकृष्णः अपि) २०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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