श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/११६-११७ ] कैशोरकवयः मानयन् (सफलीकुर्वन्) स्त्रीरत्नकूटस्थः (स्त्रीरत्नानां गोपीनां कूटेषु समूहेषु स्थितः सन्) क्षपासु (शारदीय-निशासु) रेमे। श्लोक-भावानुवाद-अमङ्गलका विनाश करनेवाले श्रीकृष्णने कैशोर अवस्थाको सफल करते हुए गोपियोंके समूहमें स्थित होकर शरद-पूर्णिमाकी रात्रिमें उनके साथ रमण किया ॥११६॥ अमृतानुकणिका-'क्षपिताहितः' - यह मधुसूदनका विशेषण है। व्रजसुन्दिरियोंके साथ रासलीला सम्पादन करके श्रीकृष्ण 'क्षपिताहित' हुए - जगत्के समस्त अमङ्गलको दूर किया। रासलीलाके द्वारा जगत्का अमङ्गल कैसे दूर होगा? इसका उत्तर-जगत्के अमङ्गलका कारण श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता है। श्रीकृष्णसे विमुख होकर जीव अपने स्वरूपको भूल जाता है और देहमें आत्माभिमान करता है। परन्तु साधुके मुखसे श्रीकृष्णकी महिमा श्रवणकर सौभाग्यवान् व्यक्तिकी श्रीकृष्णमें क्रमशः श्रद्धा, रति और भक्ति (प्रेम) उत्पन्न होती है। विशेषतः रासलीलाके श्रवण-कीर्तनके विषयमें भागवत (१०/३३/३९) में कहा है- “विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥” अर्थात् “जो धीरपुरुष व्रजदेवियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रासविलासका श्रद्धाके साथ बारम्बार श्रवण या वर्णन करता है, उसे प्रथमतः भगवान्के चरणोंमें पराभक्तिकी प्राप्ति होती है और फिर वह बहुत शीघ्र ही जितेन्द्रिय होकर अपने हृदयके रोग अर्थात् लौकिक कामभावसे सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है।” इसलिये रासादिलीलाके द्वारा जो जगत्के अमङ्गल विनाशका प्रकृष्ट पथ निर्दिष्ट हुआ है, उसमें और सन्देह नहीं है॥११६॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (२/१/२३१)- वाचा सूचितशर्वरी-रतिकला-प्रागल्भ्यया राधिकां व्रीड़ाकुञ्चितलोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ। तद्वक्षोरुह-चित्रकेलिमकरी-पाण्डित्यपारं गतः कैशोरं सफलीकरोति कलयन् कुञ्जे विहारं हरिः॥११७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्ण प्रगल्भ (वाक्चातुर्य) वाक्योंके साथ पूर्वरात्रिमें श्रीमती राधिकाके सङ्ग घटित रतिकलाका वृत्तान्त वर्णन करने लगे। उससे लज्जावशतः श्रीमती राधिकाके दोनों नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके स्तनयुगलपर चित्रकेलि-भ्रमरादि चित्रित करते हुए सखियोंके मध्य विशेष पाण्डित्यका प्रकाश करने लगे। इस प्रकारकी रसक्रीड़ाके द्वारा कुञ्जमें विहार करते हुए श्रीहरिने कैशोर-अवस्थाको सफल किया॥११७॥ अनुभाष्य-धीरललित नायकके लक्षण वर्णन करते हुए श्रीकृष्णचन्द्रका धीरललित-नायकत्व दिखा रहे हैं- सूचितशर्वरीरतिकलाप्रागल्भ्यया (सूचितं प्रकाशीकृतं शर्वर्याः यामिन्याः रतेः कलायाः कौशलस्य प्रागल्भ्यं चौथा अध्याय | २०१