भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 244, कुल 2549 में से

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[ ४/११७-१२१ औद्धत्यं यया सा तया) वाचा सखीनां अग्रे राधिकां व्रीडाकुञ्चितलोचनां (व्रीडया लज्जया कुञ्चिते लोचने यस्याः सा तथाविधां) विरचयन् (कुर्वन्) तद्वक्षोरुहचित्रकेलि-मकरीपाण्डित्यपारङ्गतः (तस्याः श्रीराधायाः वक्षोरुहयोः कुचयोः चित्रकेलिमकरीनिर्माणे यत् पाण्डित्यं तस्य पारं गतः इति सोपहासोक्तिः, तन्निर्माणकाले कर-कम्पनेन चित्रस्य वक्रत्वात्; अत्र पुनः पुनः वक्राङ्कनं सुष्ठुं कर्तुं ऋजुरेखानिर्माणव्याजेन पुनः पुनः वक्षस्पर्शात् रहसि द्विविध-सम्भोग-भेदस्यान्यतमः सम्प्रयोगावसरः) असौ हरिः (ब्रजविलासी) कुञ्जे विहारं कलयन् (कुर्वन्) कैशोरं (वयः) सफलीकरोति। श्लोक-भावानुवाद-श्रीकृष्णने अन्य रात्रिमें श्रीराधाके साथ जो रतिकला की थी, उसके कौशलका सखियोंके सामने प्रगल्भ वाक्योंसे प्रकाश करने लगे। यह सुनकर लज्जावशतः श्रीराधाके नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके वक्षस्थलपर चित्रकेलि और मकरी आदि चित्रितकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगे, परन्तु उसे उनकी पारङ्गता कहना परिहासोक्ति ही है। चित्रकेलि बनानेके समय हाथ काँपनेके कारण चित्र टेढ़ा बनता और बार-बार उसे ठीक करके सीधी रेखा बनानेके बहानेसे श्रीकृष्णको पुनः-पुनः राधाजीके वक्षको स्पर्श करनेका अवसर मिलता (यह दो प्रकारके सम्भोगमें सम्प्रयोग नामक क्रीड़ा विशेष है)। इस प्रकार ब्रजविलासी श्रीकृष्णने कुञ्जोंमें विहार करते हुए कैशोर अवस्थाको सफल किया॥११७॥ विदग्धमाधव (७/३)- हरिरेष न चेदवातरिष्यन्मधुरायां मधुराक्षि राधिका च। अभविष्यदियं वृथा विसृष्टिर्मकराङ्कस्तु विशेषतस्तदात्र॥ ११८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि! यदि मथुरामें श्रीहरि और मधुरनयनी श्रीराधिका प्रकट ना होते, तो सम्पूर्ण सृष्टि, विशेषकर कन्दर्पकी सृष्टि अवश्य ही विफल हो जाती ॥ ११८॥ अनुभाष्य-श्रीवृन्दादेवीने पौर्णमासीको कहा- हे मधुराक्षि, मथुरायाम् एषः हरिः राधिका च चेत् (यदि) न अवातरिष्यत्, तदा अत्र विसृष्टिः (जगत्सृष्टिः) वृथा अभविष्यत्; विशेषतः मकराङ्कः (कन्दर्पसर्गः) तु [वृथा अभविष्यत्]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११८॥ श्रीकृष्णलीलामें तीन वाञ्छाएँ अपूर्ण :- एइ मत पूर्वे कृष्ण रसेर सदन। यद्यपि करिल रस-निर्यास-चर्वण॥ ११९॥ तथापि नहिल तिन वाञ्छित पूरण। ताहा आस्वादिते यदि करिल यतन ॥ १२० ॥ अनुवाद-इस प्रकार सभी रसोंके आश्रय श्रीकृष्णने पहले उन रसोंके सारका तो चर्वण किया, परन्तु उस आस्वादनमें उनके प्रयास करनेपर भी उनकी तीन वाञ्छाएँ अपूर्ण ही रहीं॥ ११९-१२०॥ उनकी (१) प्रथम वाञ्छा :- ताँहार प्रथम वाञ्छा करिये व्याख्यान। कृष्ण कहे, - 'आमि हइ रसेर निदान ॥ १२१ ॥ २०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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