श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/१२१-१२५ ] राधाप्रेमका सामर्थ्य और गाढ़त्व विचार :- पूर्णानन्दमय आमि चिन्मय पूर्णतत्त्व। राधिकार प्रेमे आमा कराय उन्मत्त ॥ १२२ ॥ ना जानि राधार प्रेमे आछे कत बल। ये बले आमारे करे सर्वदा विह्वल ॥ १२३ ॥ राधिकार प्रेम-गुरु, आमि-शिष्य नट। सदा आमा नाना नृत्य नाचाय उद्भट ॥ १२४ ॥ अनुवाद-अब मैं उनकी पहली अभिलाषाकी व्याख्या कर रहा हूँ। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही सभी रसोंका आदि कारण हूँ। मैं पूर्णानन्दमय और चिन्मय पूर्णतत्त्व हूँ, किन्तु राधिकाका प्रेम मुझे उन्मत्त कर देता है। राधाके प्रेममें ना जाने कितना बल है, जिस बलसे वह प्रेम मुझे सदा विह्वल कर देता है। राधिकाका प्रेम ही मेरा गुरु है और मैं उसका नट (नर्तक) शिष्य हूँ। वही प्रेम मुझे नाना प्रकारसे विचित्र नृत्य नचाता है ॥ १२१-१२४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'रसेर निदान'-रसका मूल कारण। किन्हीं अन्य संस्करणोंमें 'रसेर निधान' अर्थात् रसका भण्डार, ऐसा भी मिलता है॥ १२१ ॥ श्रीगोविन्दलीलामृत (८/७७)- कस्माद्वृन्दे प्रियसखि हरेः पादमूलात् कुतोऽसौ कुण्डारण्ये किमिह कुरुते नृत्यशिक्षां गुरुः कः। तं त्वन्मूर्तिः प्रतितरुलतां दिग्विदिक्षु स्फुरन्ती शैलूषीव भ्रमति परितो नर्त्तयन्ती स्व-पश्चात् ॥ १२५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १२५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाने पूछा-'हे प्रियसखि वृन्दे! तुम कहाँसे आ रही हो?' वृन्दा बोलीं-'राधे, मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंके समीपसे आ रही हूँ।' श्रीराधाने जिज्ञासा की-'श्रीकृष्ण कहाँ हैं?' वृन्दा बोलीं-'वे तुम्हारे कुण्डके तट स्थित वनमें हैं।' श्रीराधाने पुनः जिज्ञासा की-'वे क्या कर रहे हैं?' वृन्दा बोलीं-'नृत्यकी शिक्षा ले रहे हैं।' श्रीराधाने पूछा-'नृत्यशिक्षाके गुरु कौन हैं?' वृन्दा बोलीं-'तुम्हारी मूर्ति प्रत्येक दिशामें सभी वृक्ष-लताओंको स्फूर्ति कराकर शैलूषी अर्थात् बाजीकरकी भाँति अपने पीछे-पीछे नृत्य करा रही है, उनके साथ ही श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं।' यह प्रश्नोत्तरमय श्लोक है॥ १२५ ॥ अनुभाष्य-श्रीराधाकृष्णकी माध्याह्निक लीलाके अन्तर्गत श्रीराधा और वृन्दाका परस्परमें वार्त्तालाप- हे प्रियसखि वृन्दे! त्वं कस्मात् ? (आगता इति श्रीराधिकायाः प्रश्नस्योत्तरे वृन्दा वदति,) हरेः (भगवतो यशोदानन्दनस्य) पादमूलात्; असौ श्रीकृष्णः कुतः ? (कुत्र इति श्रीराधायाः पुनः प्रश्ने, वृन्दायाः उत्तरं) कुण्डारण्ये (राधाकुण्डसमीपस्थकानने)। [श्रीराधा पुनः पृच्छति,] इह [सः] किं कुरुते ? [वृन्दाह,] नृत्यशिक्षाम्; [राधाह,] गुरुः कः ? [वृन्दोवाच,] दिग्विदिक्षु (दशदिशि) प्रतितरुलतां (तरुलताः प्रति) शैलूषी (उत्कृष्टनटी) इव स्फुरन्ती तन्मूर्तिः तं (कृष्णं) स्वपश्चात् परितो नर्त्तयन्ती भ्रमति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १२५ ॥ चौथा अध्याय | २०३