श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१२५-१३० श्रीकृष्ण और श्रीराधाके परस्पर प्रेमकी तुलना और वैशिष्ट्य :— “निज-प्रेमास्वादे मोर हय ये आह्लाद। ताहा हइते कोटिगुण राधा-प्रेमास्वाद ॥ १२६ ॥ आमि यैछे परस्पर विरुद्धधर्माश्रय । राधाप्रेम तैछे सदा विरुद्धधर्ममय ॥ १२७ ॥ राधा-प्रेमा विभु-यार बाड़िते नाहि ठाञि। तथापि से क्षणे क्षणे बाड़ये सदाइ ॥ १२८ ॥ याहा वइ गुरुवस्तु नाहि सुनिश्चित। तथापि गुरुर धर्म गौरव-वर्जित ॥ १२९ ॥ याहा वइ सुनिर्मल द्वितीय नाहि आर। तथापि सर्वदा वाम्य-वक्र-व्यवहार ॥ १३० ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं—“अपने प्रेम आस्वादनमें मुझे जो आनन्द होता है, उससे कोटि गुणा आनन्द राधाको अपने प्रेमके आस्वादनमें होता है। जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध धर्म मुझमें एक साथ वास करते हैं, उसी प्रकार राधाका प्रेम भी सदा विरुद्धधर्ममय है। यद्यपि राधाका प्रेम विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, जिसका और अधिक बढ़नेका कोई स्थान नहीं है, तथापि वह क्षण-क्षणमें सब समय बढ़ता रहता है। यद्यपि यह सुनिश्चित है कि राधिकाके प्रेमसे बड़ी और कोई वस्तु नहीं है, तथापि वह प्रेम गौरवपूर्ण आचरणसे विहीन है; यही महानताका लक्षण है। यद्यपि राधिकाके प्रेमसे सुनिर्मल अन्य कोई वस्तु नहीं है, तथापि वह प्रेम सदा वामता और कुटिलतापूर्ण व्यवहारयुक्त रहता है ॥ १२७-१३० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कृष्ण जिस प्रकार सभी विरुद्ध धर्मोंका आश्रय हूँ, जैसे निर्विकार होनेपर भी स्वेच्छामय, सर्वव्यापी होनेपर भी सुन्दर मूर्तिमान, निरपेक्ष होनेपर भी भक्तपक्षपाती, आत्माराम होनेपर भी भक्तप्रेमका आकाङ्क्षी आदि हूँ, वैसे ही राधाप्रेम भी विरुद्धधर्मसे परिपूर्ण है। जैसे चरम महाभावमय होनेपर भी सदा वृद्धिशील, प्रेम-गौरवसे परिपूर्ण होनेपर भी गौरवविहीन और निर्मल होनेपर भी वाम्यादिसे पूर्ण है ॥ १२७-१३० ॥ अमृतानुकणिका—वाम्य—वामा नायिकाका भाव। उःनीः सखीप्रकरण (८/३२)— “मानग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना। अभेद्या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्त्यते ॥” अर्थात् “जो नायिका मानग्रहण करनेमें सदा आन्तरिक रूपमें चेष्टाशील होती है, मानमें शैथिल्य होनेसे अत्यन्त कोप करती है, नायक जिसको सहज ही वशीभूत करनेमें समर्थ नहीं होता तथा जो नायकके प्रति प्रायः कठोर होती है, उसको रसशास्त्रमें वामा कहा गया है।” श्रीराधाका प्रेम अत्यन्त सुनिर्मल-विशुद्ध, सरल और श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमय है। अपना सर्वस्व देकर सभी प्रकारसे श्रीकृष्णका प्रीति विधान ही इस प्रेमकी चेष्टा है। इसलिये इस प्रेममें वामता और कुटिलताका कोई स्थान नहीं है। मिलनके लिये श्रीकृष्णकी बलवती उत्कण्ठाके समय मिलनेकी अनिच्छा अथवा अनादरका प्रकाश ही वाम्य है, स्वभावतः ही यह (वाम्य) श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमय प्रेमका विरोधी है। किन्तु आश्चर्यका विषय यह है कि श्रीराधाप्रेम २०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत