श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/१२७-१३२ ]
सुनिर्मल होनेपर भी उसमें वाम्यता और कुटिलता दिखायी देती है। वाम्य और वक्र व्यवहारसे राधाप्रेमकी सुनिर्मलताकी हानि नहीं होती। किसी वस्तुमें यदि विजातीय वस्तु मिल जाय, तो उस वस्तुकी सुनिर्मलताकी हानि होती है। जैसे जलमें उससे भिन्न वस्तु कीचड़ मिल जाय, तो जल निर्मल नहीं रहता। वाम्यता और वक्रता प्रेमसे भिन्न जातीय वस्तुएँ नहीं हैं। समुद्रकी तरङ्गोंके समान वाम्यता और वक्रता प्रेमकी तरङ्ग-विशेष हैं; इनके मिश्रणसे प्रेम मलिन नहीं होता, अपितु उसकी उज्ज्वलता और आस्वादन-चमत्कारिता ही सम्पादित होती है॥१२७-१३०॥ दानकेलिकौमुदी (२)— विभुरपि कलयन् सदाभिवृद्धिं गुरुरपि गौरवचर्य्यया विहीनः। मुहुरुपचितवक्रिमापि शुद्धो जयति मुरद्विषि राधिकानुरागः॥१३१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१३१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राधिकाका अनुराग विभु अर्थात् असीम होनेपर भी सदा वर्धनशील है, अत्यन्त गुरु (महान्) होकर भी गौरवाचरण-विहीन है, शुद्ध और निर्मल होकर भी बार-बार वक्रगतिवाला है; इस प्रकार श्रीकृष्णके प्रति राधिकाका जो अनुराग है, वह जययुक्त हो॥१३१॥ अनुभाष्य—विभुः (व्यापकः) अपि सदा अभिवृद्धिम् (अभितोवृद्धिं) कलयन् (धारयन्) गुरुः अपि (श्रेष्ठोऽपि) गौरवचर्यया विहीनः (दाक्षिण्यसेवया हीनः) [मदीयतामय-मधुस्नेहोत्थत्वात्] मुहुः (पुनः पुनः) उपचितवक्रिमा (उपचितः वर्द्धितः वक्रिमा कौटिल्य-पर्यायः वाम्यलक्षणो यस्मिन् तथाभूतः) अपि शुद्धः (निरुपाधिकः) मुरद्विषि (मुरारौ श्रीकृष्णो) राधिकानुरागः (श्रीराधिकायाः अनुरागः) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद—व्यापक होकर भी जो सदा वर्धनशील है, श्रेष्ठ होकर भी जो गौरवरहित अर्थात् दाक्षिण्य सेवारहित है [मधुस्नेहके कारण श्रीकृष्ण मेरे हैं, यह भाव है], निरुपाधिक होनेपर भी जो बार-बार कुटिलता अर्थात् वाम्यभाव प्रदर्शित करता है, मुरारि श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका वह अनुराग सर्वोत्कृष्ट रूपसे विराजमान हो॥१३१॥ अमृताणुकणिका—'विभु'—सर्वोत्कृष्ट, सम्पूर्ण। यह इस श्लोकमें श्रीराधानुरागका विशेषण है। श्रीराधाका श्रीकृष्णमें अनुराग विभु है। अनुराग जब यावदाश्रयवृत्तित्व लाभ करता है अर्थात् जहाँ तक वर्द्धित होना सम्भव है, वहाँ तक जब वर्द्धित होता है, तब उसे विभु (सम्पूर्ण) कहते हैं। इसलिये यावदाश्रय-वृत्ति अनुराग ही विभु अनुराग है। किन्तु यावदाश्रय-वृत्ति अनुरागको ही भाव अथवा महाभाव कहते हैं और मादनाख्या-महाभाव ही महाभाव अथवा यावदाश्रय-वृत्ति अनुरागका चरम उत्कर्ष है। इसलिये 'विभु अनुराग' कहनेसे यहाँ मादनाख्या-महाभावको ही लक्ष्य किया गया है, यही श्रीराधाके प्रेमकी विशिष्टावस्था है॥१३१॥ उस प्रेमके 'विषय' श्रीकृष्ण, और 'आश्रय' राधिका :— सेइ प्रेमार राधिका परम 'आश्रय'। सेइ प्रेमार आमि हइ केवल 'विषय'॥१३२॥
चौथा अध्याय | २०५