श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१३२-१३७ विषय और आश्रयके परस्पर सुखका तारतम्य :- विषयजातीय सुख आमार आस्वाद। आमा हैते कोटिगुण आश्रयेर आह्लाद ॥१३३॥ आश्रयके सुखाधिक्य-दर्शनसे विषयकी आश्रय होनेकी इच्छा :- आश्रयजातीय सुख पाइते मन धाय। यत्ने आस्वादिते नारि, कि करि उपाय ॥१३४॥ कभु यदि एइ प्रेमार हइये आश्रय। तबे एइ प्रेमानन्देर अनुभव हय॥”१३५॥ अनुवाद-राधिका उस प्रेमकी परम ‘आश्रय’ हैं और मैं केवल उसका ‘विषय’ हूँ। प्रेमका विषय होनेके कारण मैं विषयजातीय सुखका ही आस्वादन कर सकता हूँ, किन्तु मुझसे कोटि गुणा अधिक आनन्द आश्रय राधिकाको होता है। आश्रयजातीय सुख पानेके लिये मेरा मन दौड़ता है, किन्तु अनेक चेष्टाएँ करनेपर भी उसका आस्वादन नहीं कर पा रहा हूँ। मैं क्या उपाय करूँ? यदि कभी इस प्रेमका मैं आश्रय बन जाऊँ, तब उस प्रेमानन्दका अनुभव होगा॥”१३२-१३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो प्रेम करते हैं, वे प्रेमके ‘आश्रय’ हैं; जिनसे प्रेम किया जाता है, वे प्रेमके ‘विषय’ हैं। रसतत्त्वमें ‘विभाव’, ‘अनुभाव’, ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’-ये चार प्रकारकी सामग्रियाँ हैं। विभावरूप सामग्री दो प्रकारकी है-‘आलम्बन’ और ‘उद्दीपन’। आलम्बन पुनः दो प्रकारके हैं-विषय और आश्रय। राधाके प्रेमकी आश्रय राधिका हैं और प्रेमके एकमात्र विषय श्रीकृष्ण हैं। ‘मैं कृष्ण हूँ, मुझे जिस सुखका आस्वादन होता है, वह विषयजातीय सुख है; किन्तु आश्रयमें जो आनन्द या सुख है, वह मेरे विषयजातीय सुखसे कोटि गुणा अधिक है। आश्रयजातीय सुख राधिका ही भोग करती हैं, मैं कृष्णरूपसे उसका भोग नहीं कर सकता। यदि कभी मैं उस प्रेमका ‘आश्रय’ हो जाऊँ, तभी आश्रयजातीय सुखरूप परमानन्द अनुभव कर पाऊँगा। इसी आश्रयगत प्रेमके आस्वादनका लोभ ही मेरी अभिलाषा है॥’१३२-१३५॥ एइ चिन्ति’ रहे कृष्ण परमकौतुकी। हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ धक्धकि॥१३६॥ अनुवाद-यह सब चिन्ता करते हुए कौतुकी रसिकशेखर श्रीकृष्ण उस प्रेमका आस्वादन करनेकी चिन्ता करते रहे। उस प्रेमके प्रति लोभ बढ़ते हुए उनके हृदयमें धधकने लगा॥१३६॥ अमृतानुकणिका-‘धक्धकि’-धक्धक् करना; क्रमशः वृद्धिशीलगतिसे। घी अथवा अन्य ईन्धन पाकर अग्नि जैसे क्रमशः वृद्धिशील गतिसे धक्धक् करके जलने लगती है, श्रीराधा प्रेमास्वादनका उपाय अवलम्बन नहीं कर पानेपर भी प्रेमास्वादनका लोभ श्रीकृष्णके चित्तमें क्रमशः वृद्धिशील गतिसे बलवान होने लगा॥१३६॥ (२) द्वितीय वाञ्छा :- एइ एक, शुन आर लोभेर प्रकार। स्वमाधुर्य देखि’ कृष्ण करेन विचार॥१३७॥ २०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत