भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/१३७-१४५ ] अपने ही माधुर्यसे स्वयं ही चमत्कृत और आकर्षित :- 'अद्भुत, अनन्त, पूर्ण मोर मधुरिमा। त्रिजगते इहार केह नाहि पाय सीमा॥१३८॥ एइ प्रेमद्वारे नित्य राधिका एकलि। आमार माधुर्यामृत आस्वादे सकलि॥१३९॥ अनुवाद-यह एक लोभ था, अब एक और लोभके विषयमें श्रवण करो। अपने माधुर्यको देखकर श्रीकृष्ण विचार करने लगे-'मेरी मधुरिमा अद्भुत, अनन्त और पूर्ण है, तीनों जगत्में कोई इसका पूर्ण आस्वादन नहीं कर सकता। केवल राधिका ही अपने प्रेमके द्वारा मेरे माधुर्यामृतका सम्पूर्ण रूपसे आस्वादन करती है॥१३७-१३९॥ अमृताणुकणिका-इस पयारमें श्रीकृष्ण-माधुर्यके अपूर्वत्वके साथ-साथ श्रीराधाप्रेमकी अद्भुत महिमा व्यक्त हुई है। जिसे कोई भी आस्वादन करनेमें समर्थ नहीं है, यहाँ तक कि सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण भी जिसका आस्वादन करनेमें असमर्थ हैं, श्रीराधाप्रेम उस (श्रीकृष्ण-माधुर्य) को भी सम्पूर्णरूपसे आस्वादन करनेमें समर्थ है॥१३७-१३९॥ यद्यपि निर्मल राधार सत्प्रेमदर्पण। तथापि स्वच्छता तार बाड़े क्षणे क्षण॥१४०॥ आमार माधुर्य नाहि बाड़िते अवकाशे। ए दर्पणेर आगे नव नव रूपे भासे॥१४१॥ अनुवाद-यद्यपि राधिकाका सत्प्रेमरूपी दर्पण निर्मल है अर्थात् स्वसुखवासनासे पूर्णता रहित है, तथापि उस प्रेमरूपी दर्पणकी स्वच्छता अर्थात् श्रीकृष्ण माधुर्यके आस्वादनकी लालसा प्रतिक्षण बढ़ती रहती है। मेरे माधुर्यका बढ़नेका और अवकाश अर्थात् स्थान नहीं है, किन्तु उस प्रेमरूपी दर्पणके सामने वह नये-नये रूपसे प्रकाशित होता है॥१४१॥ मन्माधुर्य, राधार प्रेम-दोंहे होड़ करि'। क्षणे क्षणे बाड़े दोंहे, केह नाहि हारि॥१४२॥ आमार माधुर्य नित्य नव नव हय। स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप भक्ते आस्वाद्य॥१४३॥ दर्पणाद्ये देखि' यदि आपन-माधुरी। आस्वादिते हय लोभ, आस्वादिते नारि॥१४४॥ अपने ही माधुर्यके आस्वादनके लिये उसके आस्वादनकारिणीके स्वरूपग्रहणका लोभ :- विचार करिये यदि आस्वाद-उपाय। राधिका-स्वरूप हइते तबे मन धाय॥'१४५॥ अनुवाद-मेरे माधुर्य और राधाके प्रेममें होड़ लगती है। दोनों प्रतिक्षण बढ़ते रहते हैं, किन्तु दोनोंमें कोई नहीं हारता। मेरा माधुर्य नित्य नये-नये रूपमें प्रकट होता है, जिसका भक्त अपने-अपने प्रेमके विकासके अनुरूप आस्वादन करते हैं। दर्पणादिमें यदि मैं अपनी रूपमाधुरी देखता हूँ, तो उसका आस्वादन करनेके लिये मेरे हृदयमें लोभ होता है, किन्तु उसका चौथा अध्याय | २०७