भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

[ ४/१३७-१४६ आस्वादन नहीं कर पाता हूँ। जब मैं इसे आस्वादन करनेका उपाय विचार करता हूँ, तब राधिकाके स्वरूपको ग्रहण करनेके लिये मेरा मन ललायित होता है॥'१४२-१४५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी दूसरी वाञ्छा यह है—'मेरा माधुर्य अद्भुत, अनन्त और असीम है। इस माधुर्यका केवल राधिका अपने आश्रयगत प्रेमके द्वारा आस्वादन करती है। राधिकाका शुद्धप्रेमरूपी दर्पण अत्यन्त निर्मल होनेपर भी उसकी स्वच्छता प्रतिक्षण बढ़ती रहती है। मेरा माधुर्य असीम होनेके कारण बढ़ने योग्य ना होनेपर भी बढ़ता रहता है और राधिकाके स्वच्छतापूर्ण प्रेमदर्पणके सामने वह नये-नये रूपमें प्रकट होता है। इसलिये मेरा माधुर्य और राधाका प्रेम, दोनों ही परस्पर स्पर्धा करके एक-दूसरेसे अधिक बढ़ना चाहते हैं और कोई हारना नहीं चाहता। उसी अपनी माधुरीको राधिकाके प्रेमदर्पणादिमें देखकर आस्वादन करनेके लिये मेरा लोभ उत्पन्न हो रहा है। उसी लोभसे राधिकाके स्वरूपको अङ्गीकार करनेके लिये मेरा चित्त धावित हो रहा है॥१३७-१४५॥ अनुभाष्य—'होड़ करि'—स्पर्द्धा करना॥ १४२॥ अमृताणुकणिका—प्रेम ही श्रीकृष्ण-माधुर्यके आस्वादनका कारण है। “प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ (आदि ४/४९)।” प्रेम नहीं होनेपर केवल नेत्र-कर्णादि इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन सम्भव नहीं है। इसलिये श्रीकृष्णके साक्षात् प्रकट होनेपर भी जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम है, वे ही उनके माधुर्यका आस्वादन कर सकेंगे और जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम नहीं है, वे कुछ भी आस्वादन नहीं कर पायेंगे—जैसे बहरा व्यक्ति कोयलके स्वर-माधुर्यको अनुभव नहीं कर सकता। जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम है, वे भी समान भावसे श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन नहीं कर सकते। जिसका प्रेम जितना विकसित है, वह उतना ही माधुर्यका आस्वादन कर सकता है। जिसका प्रेम पूर्णतमरूपमें विकसित है, वही माधुर्यका पूर्णतम आस्वादन कर सकता है। सभी व्रजवासियोंका प्रेम समानभावसे विकसित नहीं है, विभिन्न व्रजवासियोंका प्रेम विभिन्न स्तरतक विकसित है। किन्तु श्रीमती राधिकाके अतिरिक्त अन्य किसीका प्रेम पूर्णतम विकसित नहीं है, इसलिये श्रीमती राधिकाके अतिरिक्त कोई भी पूर्णतमरूपमें श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन नहीं कर सकता। कारण, श्रीकृष्ण ही जिस प्रकार स्वयं-भगवान् हैं, अन्य कोई कभी भी स्वयं-भगवान् नहीं हो सकता, वैसे ही श्रीमती राधिका ही सभी शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठा स्वरूपशक्ति हैं, उन्हींमें ही प्रेमका पूर्णतम विकास है, अन्य कोई कभी भी सर्वश्रेष्ठा स्वरूपशक्ति नहीं हो सकता, अन्य किसीमें भी प्रेमका पूर्णतम विकास मादनाख्या-महाभाव नहीं हो सकता, इसलिये अन्य कोई भी श्रीकृष्णके माधुर्यका पूर्णतम आस्वादन नहीं कर सकता॥ १४३॥ ललितमाधव (८/३४)— अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव॥ १४६॥ २०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत