श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/१४६-१५१ ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण बोले—“अहो! यह प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी इच्छा हो रही है॥”१४६॥ अनुभाष्य—द्वारका स्थित नववृन्दावनमें मणिभित्तिमें श्रीकृष्ण अपनी छविमें अपने ही सौन्दर्यका दर्शन करके कह रहे हैं— अपरिकलितपूर्वः (अननुभूत पूर्वः) चमत्कारकारी (विस्मयोत्पादकः) एषः गरीयान् मम कः [अनिर्वचनीयः] माधुर्यपूरः (सौन्दर्यपुञ्जः) स्फुरति (प्रकाशयति)। अयम् अहं (कृष्णः) अपि यं (प्रतिबिम्बरूपं) प्रेक्ष्य (दृष्ट्वा) राधिका इव लुब्धचेताः [सन्] सरभसं (सोत्सुक्यं) उपभोक्तु श्लोक-भावानुवाद—अहो! इसके पूर्व जिसका अनुभव नहीं किया, ऐसा विस्मयको उत्पन्न करनेवाला यह श्रेष्ठ पुरुष कौन है जो अनिर्वचनीय माधुर्यको प्रकाश कर रहा है? यह मेरा ही प्रतिबिम्बरूप है, तो भी इसे देखकर राधिकाकी भाँति लुब्धचित्त होकर परम उत्सुकतासे इसका आलिङ्गन करनेकी अभिलाषा कर रहा हूँ॥१४६॥ श्रीकृष्णमाधुर्यका बल और उसके आस्वादनके लिये श्रीकृष्णकी चेष्टा :— कृष्णमाधुर्येर एक स्वाभाविक बल। कृष्ण आदि नरनारी करये चञ्चल॥१४७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमाधुर्यका एक स्वाभाविक बल है, जो सभी नर-नारियोंके साथ-साथ स्वयं श्रीकृष्णको भी चञ्चल कर देता है॥१४७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका माधुर्य स्वयं श्रीकृष्णसे लेकर गोपियों, श्रीबलदेव, नारायण, लक्ष्मी और अन्य सभी प्राणियोंके चित्तको चञ्चल करनेमें स्वाभाविक रूपसे समर्थवान् है॥१४७॥ श्रवणे, दर्शने आकर्षये सर्वमन। आपना आस्वादिते कृष्ण करेन यतन॥१४८॥ श्रीकृष्णमाधुर्यपानमें तृप्तिका अभाव, केवल लोभमें वृद्धि :— ए माधुर्यामृत सदा येइ पान करे। तृष्णाशान्ति नहे, तृष्णा बाड़े निरन्तरे॥१४९॥ अतृप्त हइया करे विधिर निन्दन। ‘अविदग्ध विधि भाल ना जाने सृजन॥१५०॥ कोटि नेत्र नाहि दिल, सबे दिल दुइ। ताहाते निमेष,—कृष्ण कि देखिब मुञि॥’१५१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी मधुर वाणीके श्रवणसे, उनके सुन्दर रूपके दर्शनसे सभीका मन आकर्षित हो जाता है; यहाँ तक कि स्वयं श्रीकृष्ण भी इसका आस्वादन करनेकी चेष्टा करते हैं। इस माधुर्यामृतका जो पान करता है, उसकी तृष्णा कभी मिटती नहीं, अपितु तृष्णा निरन्तर बढ़ती ही रहती है। (ऐसा रसिक भक्त श्रीकृष्णके सौन्दर्यपानमें) अतृप्त होकर विधि (स्रष्टा ब्रह्मा) की निन्दा करते हुए कहता है—‘इस मूर्ख ब्रह्माको ठीकसे सृजन करना नहीं आता। चौथा अध्याय | २०९