भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/१४८-१५२ सभीको करोड़ों नेत्र ना देकर केवलमात्र दो ही नेत्र दिये हैं और उनके ऊपर पलकें भी बना दी हैं। (पलकें बार-बार झपककर श्रीकृष्णके दर्शनमें बाधा देती हैं) हाय! ऐसी अवस्था में मैं श्रीकृष्णका दर्शन कैसे करूँ?'॥ १४८-१५१॥ अमृतकणिका-श्रीकृष्ण-माधुर्य दर्शन करनेपर उसके आस्वादनकी लालसा तो उत्पन्न होती ही है, उस माधुर्यकी कथा अन्योंके मुखसे सुनकर भी लोभ जाग्रत होता है। श्रीकृष्णके माधुर्यका ऐसा स्वभाव है, किसी भी रूपसे किसी भी इन्द्रियके गोचरीभूत होनेसे अपने आस्वादन करनेके निमित्त यह बलवती लालासाको जाग्रत कर देता है। अतृप्त होकर रसिक भक्त कहता है- "पलकहीन कोटि-कोटि नेत्र होनेपर श्रीकृष्णका असमोर्ध्व माधुर्य जो प्रतिक्षण नव-नवरूपमें वर्धित होता रहता है, उसका आस्वादनकर किञ्चित् तृप्ति लाभकी सम्भावना हो सकती है, किन्तु विधाताने मुझे कोटि नेत्र दिये नहीं, केवलमात्र दो ही नेत्र दिये हैं। यदि ये दो नेत्र पलकहीन होते, तो इनके द्वारा निर्बाधरूपमें जितना भी माधुर्यका पान सम्भव होता, उसके द्वारा स्वयंको कृतार्थ मान लेता, किन्तु इन दो नेत्रोंपर भी पलकें दे दीं। मैं किस प्रकार श्रीकृष्णका माधुर्य आस्वादन करूँ? यदि किसीका प्याससे कण्ठ सूख रहा हो और वह सुस्वादु, निर्मल, सुगन्धित जलके समुद्रके पास पहुँचकर एक चुल्लु-भर जल पान करे, तो उसकी प्यास कुछ शान्त होगी। किन्तु चुल्लुभर जलके स्थानपर कुछ-कुछ समयके अन्तरालपर एक कुशाग्रसे एक-एक बूँद जल उसके मुखमें दिया जाय, तो शमित होनेके स्थानपर अग्निमें घी देनेके समान प्यासकी जलन और वर्धित हो जायेगी। बार-बार झपकनेवाली पलकोंसे युक्त मात्र दो नेत्र लेकर असमोर्ध्व-माधुर्यमय श्रीकृष्णरूपके साक्षात् उपस्थित होनेपर भी मेरे जैसे हतभागा माधुर्य-पिपासुकी पिपासाकी तीव्रज्वाला उसी प्रकार वरं उसकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक रूपमें वर्द्धित हुई है। विधाताका यह कैसा निष्ठुर परिहास है! विधाता सृष्टिकार्य तो करता है, किन्तु वह रसज्ञान-शून्य है। यदि उसे रसज्ञान होता, तो जो अखिल-रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके मुखकमलका दर्शन करेंगे, उनको कोटि नेत्र देता और उनपर पलकें भी नहीं बनाता ॥"१४८-१५१॥ श्रीमद्भागवत (१०/८२/४०)- गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति। दृग्भिर्हृदिकृतमलं परिरभ्य सर्वा- स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम्॥१५२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कुरुक्षेत्रमें गोपियोंने चिरकालसे अभिलाषित श्रीकृष्णको प्राप्त करके उनके दर्शन किये। दर्शनके समय पलकोंके झपकनेसे बाधा आनेपर गोपियाँ नेत्रोंपर पलकोंकी सृष्टि करनेवाले विधाताकी भर्त्सना करने लगीं। उन सभी गोपियोंने अपने नेत्रोंके द्वारा श्रीकृष्णको अपने हृदयमें ले जाकर उनका यथेष्ट आलिङ्गनकर जिस प्रेमभावको प्राप्त किया, वह प्रेमभाव ब्रह्मका ध्यान करनेवाले योगियोंको भी अप्राप्य है॥ १५२॥ २१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत