श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ ४/१४८-१५२ सभीको करोड़ों नेत्र ना देकर केवलमात्र दो ही नेत्र दिये हैं और उनके ऊपर पलकें भी बना दी हैं। (पलकें बार-बार झपककर श्रीकृष्णके दर्शनमें बाधा देती हैं) हाय! ऐसी अवस्था में मैं श्रीकृष्णका दर्शन कैसे करूँ?'॥ १४८-१५१॥ अमृतकणिका-श्रीकृष्ण-माधुर्य दर्शन करनेपर उसके आस्वादनकी लालसा तो उत्पन्न होती ही है, उस माधुर्यकी कथा अन्योंके मुखसे सुनकर भी लोभ जाग्रत होता है। श्रीकृष्णके माधुर्यका ऐसा स्वभाव है, किसी भी रूपसे किसी भी इन्द्रियके गोचरीभूत होनेसे अपने आस्वादन करनेके निमित्त यह बलवती लालासाको जाग्रत कर देता है। अतृप्त होकर रसिक भक्त कहता है- "पलकहीन कोटि-कोटि नेत्र होनेपर श्रीकृष्णका असमोर्ध्व माधुर्य जो प्रतिक्षण नव-नवरूपमें वर्धित होता रहता है, उसका आस्वादनकर किञ्चित् तृप्ति लाभकी सम्भावना हो सकती है, किन्तु विधाताने मुझे कोटि नेत्र दिये नहीं, केवलमात्र दो ही नेत्र दिये हैं। यदि ये दो नेत्र पलकहीन होते, तो इनके द्वारा निर्बाधरूपमें जितना भी माधुर्यका पान सम्भव होता, उसके द्वारा स्वयंको कृतार्थ मान लेता, किन्तु इन दो नेत्रोंपर भी पलकें दे दीं। मैं किस प्रकार श्रीकृष्णका माधुर्य आस्वादन करूँ? यदि किसीका प्याससे कण्ठ सूख रहा हो और वह सुस्वादु, निर्मल, सुगन्धित जलके समुद्रके पास पहुँचकर एक चुल्लु-भर जल पान करे, तो उसकी प्यास कुछ शान्त होगी। किन्तु चुल्लुभर जलके स्थानपर कुछ-कुछ समयके अन्तरालपर एक कुशाग्रसे एक-एक बूँद जल उसके मुखमें दिया जाय, तो शमित होनेके स्थानपर अग्निमें घी देनेके समान प्यासकी जलन और वर्धित हो जायेगी। बार-बार झपकनेवाली पलकोंसे युक्त मात्र दो नेत्र लेकर असमोर्ध्व-माधुर्यमय श्रीकृष्णरूपके साक्षात् उपस्थित होनेपर भी मेरे जैसे हतभागा माधुर्य-पिपासुकी पिपासाकी तीव्रज्वाला उसी प्रकार वरं उसकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक रूपमें वर्द्धित हुई है। विधाताका यह कैसा निष्ठुर परिहास है! विधाता सृष्टिकार्य तो करता है, किन्तु वह रसज्ञान-शून्य है। यदि उसे रसज्ञान होता, तो जो अखिल-रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके मुखकमलका दर्शन करेंगे, उनको कोटि नेत्र देता और उनपर पलकें भी नहीं बनाता ॥"१४८-१५१॥ श्रीमद्भागवत (१०/८२/४०)- गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति। दृग्भिर्हृदिकृतमलं परिरभ्य सर्वा- स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम्॥१५२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कुरुक्षेत्रमें गोपियोंने चिरकालसे अभिलाषित श्रीकृष्णको प्राप्त करके उनके दर्शन किये। दर्शनके समय पलकोंके झपकनेसे बाधा आनेपर गोपियाँ नेत्रोंपर पलकोंकी सृष्टि करनेवाले विधाताकी भर्त्सना करने लगीं। उन सभी गोपियोंने अपने नेत्रोंके द्वारा श्रीकृष्णको अपने हृदयमें ले जाकर उनका यथेष्ट आलिङ्गनकर जिस प्रेमभावको प्राप्त किया, वह प्रेमभाव ब्रह्मका ध्यान करनेवाले योगियोंको भी अप्राप्य है॥ १५२॥ २१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१५२-१५४ ]
अनुभाष्य-कुरुक्षेत्रमें वृष्णियों (यादवों) के साथ गोपोंके मिलनके बाद शुकदेव गोस्वामीके द्वारा श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंके मनोभावका वर्णन— यत्प्रेक्षणे (यस्य श्रीकृष्णस्य दर्शने) दृशिषु (नेत्रेषु) पक्ष्मकृतं (व्यवधानकारक-नेत्रलोम-कृतं विधातारं) शपन्ति (भर्त्सयन्ति) सर्वाः गोप्यः [तं] अभीष्टं (कृष्णं) चिरात् (बहुकालानन्तरं) [कुरुक्षेत्रे] उपलभ्य दृग्भिः (नेत्रद्वारैः) हृदिकृतं (हृदये प्रवेशितं) परिरभ्य (आलिङ्ग्य) नित्ययुजां (आरूढयोगिनाम्) अपि दुरापं (दुर्लभं) तद्भावं (परमानन्दघनताम्) आपुः (प्रापुः)। श्लोक-भावानुवाद—उन गोपियोंने बहुत समयके बाद अपने अभीष्ट श्रीकृष्णको कुरुक्षेत्रमें प्राप्त करके अपने नेत्रके द्वारोंसे हृदयमें प्रवेश कराके प्रगाढ़ आलिङ्गन किया, परन्तु श्रीकृष्णके दर्शन करनेपर आँखोंपर दर्शनमें व्यवधान लानेवाली पलकोंके स्रष्टा विधाताकी भर्त्सना करने लगीं। इस प्रकार उन्होंने नित्य-निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगियोंके लिये भी दुर्लभ उस परमानन्दघन भावको प्राप्त किया॥ १५२॥ श्रीमद्भागवत (१०/३१/१५)— अटति यद्भवानह्नि काननं, त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्। कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते, जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ १५३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियाँ बोलीं—“हे कृष्ण ! दिनके समयमें जब तुम वनमें चले जाते हो, तब तुम्हारे घुँघराले केशोंसे सुशोभित श्रीमुखको ना देखकर हमारा एक-एक त्रुटिकाल भी युगके समान प्रतीत होता है। तुम्हारे मुखारविन्दका दर्शन करानेवाले हमारे नेत्रोंपर जो विधाताने पलकोंकी सृष्टि की है, उसे हम मूर्ख मानती हैं॥” १५३॥ अनुभाष्य—रासके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनके दर्शनके लिये गोपियोंका विलापगीत— यत् (यदा) अह्नि (दिवाभागे) भवान् काननं (वृन्दावनम्) अटति (गच्छति), तदा त्वाम् अपश्यतां [प्राणिनां] त्रुटिः (क्षणार्द्धमपि कालः) युगायते (युगमितकालप्रतीतिर्भवति)। ते (तव) कुटिलकुन्तलं (कुटिलाः वक्राः कुन्तलाः केशाः यस्मिन् तं) श्रीमुखम् उदीक्षताम् (उच्चैः ईक्षमाणानां) च दृशां पक्ष्मकृत् (निमेषस्रष्टा विधाता) जड़ः (मूर्खः) एव। श्लोक-भावानुवाद—जब दिनके समय आप वृन्दावनमें जाते हो, तब तुम्हारे अदर्शनसे हमें आधे क्षणका काल भी युगके समान प्रतीत होता है। वनसे लौटनेपर घुँघराले केशोंसे सुशोभित तुम्हारे परम सुन्दर मुखारविन्दका सिर उठाकर दर्शन करती तो हैं, परन्तु पलकें उसमें बड़ी बाधा देती हैं, इसलिये उन्हें बनानेवाला विधाता (ब्रह्मा) मूर्ख ही है॥ १५३॥ श्रीकृष्णरूप दर्शनमें ही नेत्रोंकी सार्थकता :— कृष्णावलोकन बिना नेत्रे फल नाहि आन। येइ जन कृष्ण देखे, सेइ भाग्यवान्॥ १५४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके दर्शनके अतिरिक्त नेत्रोंका और कोई फल (प्रयोजन) नहीं है। जो व्यक्ति श्रीकृष्णके दर्शन करता है, वही भाग्यवान् है॥ १५४॥
चौथा अध्याय | २९१
[ ४/१५५-१५६ श्रीमद्भागवत (१०/२१/७)— अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं ब्रजेशसुतयोरनुवेणुजुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ १५५॥ अनुवाद—गोपियाँ अपनी निजसखियोंके प्रति कहती हैं—“अरी सखियों ! देखो नेत्रधारी जन और उनके नेत्रोंके सौभाग्यका हम क्या वर्णन करें? अर्थात् अनिर्वचनीय होनेके कारण हम वर्णन नहीं कर सकतीं; मैं तो समझती हूँ कि अव्यय शोभावाले श्रीकृष्ण-बलदेव, गोचारणके लिये अपने ग्वाल-बाल और गायोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हों, उन्होंने अपने अधरोंपर वेणु धारण कर रखा हो तथा स्मित हास्य करते हुए प्रेमपूर्ण कटाक्षका हमपर वर्षण कर रहे हों, बस, उस समय हम उनकी मुख-माधुरीका पान करती रहें॥”१५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियाँ बोलीं—“हे सखियों ! गौओंके साथ सखाओंके द्वारा परिवेष्टित होकर कृष्ण और बलराम जब वनमें प्रवेश करते हैं, तब उनके वेणुगीतयुक्त और अनुरक्त-जनोंके प्रति कटाक्षकारी मुखमण्डलका जो लोग अपने नेत्रोंके द्वारा सेवन करते हैं, वे लोग ही धन्य हैं। नेत्रधारी व्यक्तियोंके लिये इसकी अपेक्षा उत्कृष्ट फल और दिखलायी नहीं देता॥”१५५॥ अनुभाष्य—शरत्ऋतु आनेपर श्रीकृष्णके उद्देश्यसे श्रीगोपियोंका गीत— हे सख्यः, वयस्यै (सखिभिः) पशून् अनुविवेशयतोः (वनात् वनान्तरं प्रवेशयतोः) ब्रजेशसूतयोः (रामकृष्णयोः) अनुवेणुजुष्टं (वेणुं वादयत्) अनुरक्त-कटाक्ष-मोक्षं (स्निग्धकटाक्षविसर्गं) वक्त्रं यैः निपीतं (तैरैत् जुष्टं सेवितं तत्) इदं वै अक्षण्वतां (चक्षुष्मतां) फलं, परम् (अन्यत्) न विदामः (विद्मः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५५॥ श्रीमद्भागवत (१०/४४/१४)— गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्। दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य॥ १५६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मथुरावासिनियाँ बोलीं—“आहा! गोपियोंने ऐसी कौनसी तपस्या की! वे समस्त श्री, ऐश्वर्य और यशके एकान्त आश्रय, दुर्लभ, स्वतःसिद्ध, असमोर्ध्व, लावण्यके साररूप इन श्रीकृष्णके मुखामृतका नेत्रोंके द्वारा निरन्तर पान करती रहती हैं॥”१५६॥ अनुभाष्य—मथुरामें कंसकी रङ्गभूमिमें उसके दो मल्लयोद्धा मुष्टिक और चाणूरके साथ मल्लयुद्धमें संलग्न श्रीबलराम-कृष्णको देखकर वहाँ एकत्रित मथुरा नारियोंकी उक्ति,— गोप्यः किं तपः अचरन्, यत् (यस्मात्) अमुष्य (श्रीकृष्णस्य) लावण्यसारं (लावण्येन सारं श्रेष्ठम्) असमोर्ध्वं (न विद्यते समं उर्ध्वम् अधिकञ्च यस्य तत्) अनन्यसिद्धं (न अन्येन अलङ्कारादिना सिद्धं किन्तु २१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१५६-१६१ ]
स्वतः एव) अनुसवाभिनवं (प्रतिक्षणम् अभिनवं) दुरापं (दुर्लभं) यशसः श्रियः ऐश्वरस्य एकान्तधाम रूपं दृग्भिः पिबन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५६॥ अपूर्व माधुरी कृष्णेर, अपूर्व तार बल। याहार श्रवणे मन हय टलमल॥१५७॥ कृष्णेर माधुर्ये कृष्णे उपजय लोभ। सम्यक् आस्वादिते नारे, मने रहे क्षोभ॥१५८॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी माधुरी अपूर्व है और उसका अपूर्व बल है। उस माधुरीका श्रवण करनेसे हृदय टलमल (अस्थिर) हो जाता है। श्रीकृष्णको भी अपने माधुर्यके आस्वादनका लोभ होता है। किन्तु [श्रीमती राधिकाके मादनाख्या महाभावके अभावमें] उसका पूर्ण रूपसे आस्वादन ना कर पानेके कारण उनके मनमें क्षोभ रह जाता है॥१५७-१५८॥ (३) तृतीय वाञ्छा :– एइ त' द्वितीय हेतुर कहिल विवरण। तृतीय हेतुर एबे शुनह लक्षण॥१५९॥ एकमात्र स्वरूपदामोदर ही भक्तिरसामृतके मूल महाजन :– अत्यन्त निगूढ़ एइ रसेर सिद्धान्त। स्वरूप गोसाञि मात्र जानेन एकान्त॥१६०॥ येबा केह अन्य जाने, सेह ताँहा हैते। चैतन्यगोसाञिर तँह अत्यन्त मर्म याते॥१६१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी दूसरी इच्छाका अभी वर्णन किया, अब तीसरी इच्छाका विवरण श्रवण करो। इस रसका सिद्धान्त अत्यन्त निगूढ़ है, जिसे केवल श्रीस्वरूप दामोदर ही जानते हैं। यदि अन्य कोई इस सिद्धान्तके विषयमें जानता है, तो वह श्रीस्वरूप दामोदरकी कृपासे ही जानता है। क्योंकि श्रीस्वरूप दामोदर श्रीचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय हैं और उनके गुप्त भावोंको जानते हैं॥१५९-१६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आश्रयजातीय प्रेमके द्वारा कृष्णमाधुरीका सम्पूर्ण रूपसे आस्वादन करनेका लोभ होनेपर भी उसका आस्वादन नहीं कर पानेके कारण श्रीकृष्ण क्षुब्ध हुए। राधिकाके भावग्रहण करनेका दूसरा गूढ़ कारण यह है॥१५९॥ अमृतानुकणिका—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी बहुत वर्षोंतक श्रीस्वरूप दामोदरके सङ्ग रहे और महाप्रभु-सम्बन्धी समस्त कथाएँ उनके मुखसे सुनी। ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामीने वृन्दावनमें दास गोस्वामीसे ये सब कथाएँ श्रवण की। (मध्य, २/८४)– 'श्रीचैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तँहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताहाँ किछु ये शुनिलुँ, ताँहा इहाँ विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे॥
चौथा अध्याय | २१३
[ ४/१५९-१६४ “श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ समस्त रत्नोंकी शिरोमणि हैं। इन लीलाओंमें उनके सङ्गी श्रीस्वरूप दामोदर इनके साक्षी और भण्डारी हैं। उन्होंने ये लीलाएँ श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कण्ठस्थ करायी थीं। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे जो कुछ मैंने सुनी, उन्हींका यहाँ विस्तारसे वर्णन किया है और यह भक्तोंके निमित्त भेंट है।” (मध्य, २/९३)— “स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत, ताइ लिखि’ नाहि मोर दोष॥” “मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा, उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई दोष नहीं है॥” १५९-१६१॥ गोपीप्रेमकी संज्ञा :- गोपीगणेर प्रेमेर ‘रूढ़भाव’ नाम। विशुद्ध निर्मल प्रेम, कभु नहे काम ॥ १६२ ॥ अनुवाद—गोपियोंके प्रेमका नाम ‘रूढ़भाव’ है। यह प्रेम विशुद्ध और निर्मल है; यह कभी भी (जड़ीय) ‘काम’ नहीं है॥ १६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘प्रेमेर रूढ़भाव नाम’—प्रेमका नाम रूढ़भाव है। वास्तवमें निर्मलप्रेमकी काम शब्दके द्वारा व्याख्या नहीं होती ॥ १६२ ॥ अनुभाष्य—गोपियोंके महाभावमें सभी सात्त्विकभाव उद्दीप्त अवस्थामें हैं, इसलिये गोपियोंका प्रेम ‘रूढ़भाव’ कहलाता है। “उद्दीप्ता सात्त्विका यत्र स रूढ़ इति भण्यते।” अर्थात् “स्तम्भादि अष्टसात्त्विक भाव विकार जहाँपर उद्दीप्त होते हैं, उसको रूढ़ भाव कहते हैं।” केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये होनेके कारण उनका प्रेम निर्मल है, इसलिये वह श्रीकृष्ण-इतर भोगमय घृणित ‘काम’ शब्दके द्वारा वाच्य नहीं है॥ १६२॥ गोपियोंका काम और प्रेम एक ही वस्तु :- भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२८३-२८४) गौतमीय तन्त्रवाक्य— प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥ १६३ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंके शुद्धप्रेमको ही ‘काम’ नामसे अभिहित करनेकी प्रथा हुई है। भगवद्भक्त उद्धवादि भी इस प्रेमके पिपासु हैं॥ १६३॥ अनुभाष्य—गोपरामाणां (व्रजललनानां) प्रेमा एव काम इति प्रथां (ख्यातिम्) अगमत्; इति [हेतोः] उद्धवादयः भगवत्प्रियाः (अपर-रस-रसिकभक्ताः) अपि एतं (प्रेमाणं) वाञ्छन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १६३ ॥ काम और प्रेमके स्वरूप-लक्षण भेद :- काम, प्रेम,—दोंहाकार विभिन्न लक्षण। लौह आर हेम यैछे स्वरूपे विलक्षण ॥ १६४ ॥ २१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१६२-१६६ ] अनुवाद-काम और प्रेम दोनोंके अलग-अलग लक्षण हैं, जैसे लोहे और स्वर्णका अपना-अपना स्वरूप है॥१६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-लोहे और स्वर्णका स्वरूप जिस प्रकार परस्पर भिन्न है, काम और प्रेम प्रायः एकजातीय होनेपर भी उनके लक्षण अलग-अलग हैं॥१६४॥ काम और प्रेमकी संज्ञा :- आत्मेन्द्रियप्रीति-वाञ्छा-तारे बलि 'काम'। कृष्णेन्द्रियप्रीति-इच्छा धरे 'प्रेम' नाम ॥१६५॥ अनुवाद-अपनी इन्द्रियोंकी प्रीतिकी इच्छाको 'काम' कहा जाता है, किन्तु श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंको सुखी करनेकी इच्छाको 'प्रेम' कहा जाता है॥१६५॥ अनुभाष्य-“सर्वथा ध्वंससहितं सत्यपि ध्वंसकारणे। यद्भावबन्धनं यूनोः स प्रेमा परिकीर्त्तितः ॥” अर्थात् “ध्वंसका कारण उत्पन्न होनेपर भी दम्पत्तिका जो सुदृढ़ भाव-बन्धन किसी प्रकारसे भी ध्वंस नहीं होता है, उसे 'प्रेम' कहा जाता है।” एकान्तभावसे सर्वात्मा द्वारा आश्रयजातीय गोपियाँ श्रीकृष्णके भावबन्धनमें सुदृढ़रूपसे आबद्ध हैं। वे कामरूप आत्मसुखके त्यागका सर्वोच्च आदर्श हैं और वे श्रीकृष्णके आनन्दका विधान करनेके लिये उनकी सेवामें ही सदा तत्पर रहती हैं, इसलिये श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये आत्मसुख-ध्वंसमें उनका प्रचुर आनन्द और उनके भावबन्धनकी सुदृढ़ता ही लक्षित होती है॥१६५॥ कामेर तात्पर्य-निजसम्भोग केवल। कृष्णसुखतात्पर्य मात्र प्रेम त' प्रबल ॥१६६॥ अनुवाद-'काम' का अर्थ केवल अपने इन्द्रियसुखका भोग है। किन्तु 'प्रेम' का तात्पर्य केवल श्रीकृष्णको सुखी करना है, इसलिये यह अति प्रबल है॥१६६॥ अमृतानुकणिका-प्रेम और काम, दोनोंका अर्थ है-प्रीतिकी इच्छा। तो क्या प्रेम और काम एक ही हैं? इसके उत्तरमें ही १६२ पयार संख्यामें कहा गया है-'विशुद्ध निर्मल' आदि। काम और प्रेम, दोनोंका अर्थ ही 'प्रीतिकी इच्छा' होनेपर भी भक्तके सम्बन्धमें यह प्रीतिकी इच्छा दो प्रकारकी होती है-निज-प्रीतिकी इच्छा और श्रीकृष्ण-प्रीतिकी इच्छा। रूढ़ि-अर्थसे 'निज-प्रीतिके निमित्त जो इच्छा है', उसे काम कहते हैं, वह सङ्कीर्ण और स्वार्थमय है, इसलिये वह निन्दनीय है। और 'श्रीकृष्ण-प्रीतिके निमित्त जो इच्छा है', उसे प्रेम कहते हैं, वह अत्यन्त व्यापक, अत्यन्त उदार, अत्यन्त प्रशंसनीय है, यह सहज ही समझा जा सकता है। इसलिये प्रेमसे प्रीति-इच्छाकी उज्ज्वलतम परिणति होती है और कामसे प्रीति-इच्छाकी मलिनता होती है। प्रेममें यह मलिनता नहीं है, इसलिये प्रेमको निर्मल कहा गया है। प्राकृत काम षड्रिपुओंमें अन्यतम है। रिपु अर्थात् शत्रु, विरोधी आदि। इस कामकी उत्पत्तिके विषयमें गीतामें भगवान् कहते है- “ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥ (२/६२) चौथा अध्याय | २१५
[ ४/१६२-१६६
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥” (३/३७) अर्थात् “शब्दादि विषयोंका निरन्तर चिन्तन करनेसे उन-उन विषयोंमें चिन्तनकारी पुरुषकी आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्तिसे काम एवं कामसे क्रोधकी उत्पत्ति होती है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न होता है और काममें बाधा आनेपर तमोगुणसे क्रोध उत्पन्न होता है। कामके समान मनुष्यका कोई और दुर्जेय वैरी नहीं है।” इसके द्वारा चालित होकर ऐसा कोई भी अन्याय-कर्म नहीं है, जो मनुष्य नहीं कर सकता। मोह अथवा भगवत्-सम्बन्धज्ञानके अभावसे ही हमारी सब प्रकारकी वासना उदित होती है। कामके द्वारा आक्रान्त होकर जीवकी संसार गति उपस्थित होती है और अविद्याके द्वारा आवृत्त होकर जीव बहुत भोगके विषयोंकी कल्पना करता है। भोगके विषय सत्य ना होने पर भी वर्तमानमें हमारी अवस्थाके अनुसार अर्थात् भगवान्के साथ सम्बन्धज्ञानके अभावमें वे सत्य प्रतीत होते हैं। साधारणतः प्रेम कहनेसे हमारे मनमें विचार आता है कि जो हमें अच्छा या प्यारा लगता है। अधिकांशतः युवक-युवतीके प्यार अथवा आकर्षणको ही प्रेम शब्दसे सम्बोधित किया जाता है। किन्तु प्रेमका यह वास्तविक अर्थ नहीं है। प्रेम नित्य वस्तु है। इसलिये अनित्य वस्तुमें यह किस प्रकारसे सम्भव है? आज मुझे यदि कोई अच्छा लगता है, कल वही मेरा शत्रु होकर खड़ा हो सकता है। इसलिये इस स्थानपर उसकी नित्यता नहीं है और उसे काम शब्दसे ही अभिहित करना उचित है। हमारा प्यार करनेका कारण है—काम। जहाँ कामके पूर्ण होनेमें बाधा आती है, वहीं प्यार दूर हो जाता है। पति-पत्नीके प्यारको प्रेम नहीं कह सकते, क्योंकि उसका भी कारण काम है। पति-पत्नीका परस्पर स्वार्थ उस सम्बन्धमें विजड़ित है। एक व्यक्ति स्वार्थसे परिचालित होकर दूसरेको प्यार करता है। उपनिषदमें एक बड़ा सुन्दर उपदेश है। श्रुति (बृः उः दूसरा अध्याय चौथा ब्राह्मण पाँचवाँ मन्त्र)— “स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति। न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति। न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति। न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवत्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।” अर्थात् महर्षि याज्ञवल्क्य मैत्रेयीको कह रहे हैं—“हे मैत्रेयी! पतिकी कामना तृप्तिके लिये पत्नीको पति प्रिय नहीं होता। किन्तु पत्नी अपनी निज कामना सिद्धिके लिये ही पतिको प्रिय मानती है। इसी प्रकार पत्नीके सुखसाधनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये पत्नी कभी भी पतिकी प्रिया नहीं होती, किन्तु अपनी कामना सिद्धिके लिये पत्नी पतिकी प्रिया होती है। पुत्रकी कामना तृप्तिके लिये पिताके लिये पुत्र प्रिय नहीं होता, परन्तु पुत्रके द्वारा अपनी कामना परिपूर्ण
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४/१६२-१६६ ] करवानेके लिये ही पुत्र पिताका प्रिय होता है। इसी प्रकार धनके सुख विधान करनेके लिये धन लोगोंको प्रिय नहीं होता, किन्तु धनके द्वारा अपने इन्द्रियतर्पण करानेके लिये धन लोगोंका इतना प्रिय होता है। ब्राह्मणकी प्रीतिके लिये ब्राह्मण अन्योंके प्रिय नहीं होते, किन्तु ब्राह्मणके द्वारा अपनी कामनाएँ परिपूर्ण करानेके लिये ही ब्राह्मण लोगोंके प्रिय होते हैं। राजाके सुखविधानके लिये राजा प्रजाका प्रिय नहीं होता, किन्तु राजाके द्वारा स्वार्थसिद्धि करवा लेनेके लिये राजा प्रजाका प्रिय होता है। स्वर्गादि स्थानके सुखोत्पादनके लिये स्वर्गादि स्थान जीवोंको प्रिय नहीं होते, किन्तु स्वर्गसे इन्द्रियतृप्ति दोहन करनेके लिये स्वर्ग लोगोंका प्रिय है। देवताओंकी प्रीति उत्पादनके लिये देवतागण लोगोंके प्रिय नहीं हैं, किन्तु देवताओंसे कामनासिद्धिका सुखभोग दोहन करनेके लिये देवतागण लोगोंके प्रिय होते हैं। प्राणी-जगत्के सुख उत्पादनके लिये प्राणीगण लोगोंके प्रिय नहीं होते, किन्तु इन सब प्राणियोंके द्वारा इन्द्रियतर्पण करवा लेनेके लिये ही प्राणीगण लोगोंके प्रिय होते हैं। मैत्रेयी ! अधिक क्या कहूँ, दूसरोंके सुखके लिये कोई कभी भी प्रिय नहीं होता, केवल अपनी-अपनी कामनातृप्तिका दोहन करनेके लिये ही सभी लोग प्रिय होते हैं।” शास्त्रोंमें कहा गया है कि पतिकी सेवा करना ही पतिव्रता स्त्रीका धर्म है। किन्तु पतिव्रता स्त्रीके हृदयके अन्तरतम प्रदेशमें यदि निजस्वार्थ छिपा ना हो, तो पति-सेवनिष्ठता भी सम्भव नहीं होगी। यदि स्त्रीके भीतर कहीं भी निज स्वार्थकी कोई भावना ना हो, तब पति यदि कोढ़ग्रस्त हो जाय, तो स्त्रीकी वह सेवनिष्ठा क्यों नहीं रहती ? और किसी-किसी उदाहरणमें कोढ़ग्रस्त पतिकी सेवा दिखलायी देनेपर भी वह स्वर्गादिकी कामनाके द्वारा ही परिचालित होती है। इसलिये वहाँपर भी शुद्ध निःस्वार्थ पतिव्रता धर्म परिलक्षित नहीं होता। स्वार्थपर प्यारका परिणाम अति भयावह है, मायाबद्ध जीव यह समझ नहीं पाते हैं। भागवत (११/१७/५७-५८)में कहा गया है- “अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजात्मजा। अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः ॥५७॥ एवं गृहाश्याक्षिप्तः कृपणो मूढधीरयम्। अतृप्तस्ताननुध्यायन्मृतोऽन्धं विशते तमः॥५८॥ अर्थात् “जो भगवत् बहिर्मुख जीव हैं, उनकी स्त्री-पुत्रादिमें आसक्ति इतनी प्रबल है कि उन्हें भगवत्-भजन करनेकी बात कहते ही वे तुरन्त उत्तरमें कहते हैं- मेरे वृद्ध माता-पिता, पत्नी, अनाथ सन्तानकी यदि मैं नहीं देखभाल नहीं करूँ, तो वे किस प्रकार जीवन धारण करेंगे ? इस प्रकारसे गृहासक्त वे मूर्ख लोग संसारासक्तिके फलस्वरूप मृत्युके पश्चात् अन्धतम नरकमें प्रवेश करते हैं।” आजकल अनेक लोग दरिद्रोंकी सेवा करते हुए उन्हें 'दरिद्र नारायण' की संज्ञा देते हैं। इस प्रकार वे लक्ष्मीपति नारायणको दरिद्र कहनेसे भी सङ्कोच नहीं करते- यह बड़ा हास्यास्पद विषय है। अधिकांश समाजसेवियोंका कहना है- 'प्रत्येक प्राणीके शारीरिक और मानसिक अभाव-असुविधा दूर करना ही 'प्राणीमात्रसे प्रेम' है और ये सभी प्राणी ही बहुरूपमें ईश्वर हैं। उनकी सेवा ही ईश्वरकी सेवा है।' किन्तु शास्त्रके विचारसे यह प्रेम शब्दका अति विकृत चौथा अध्याय | २१७
[ ४/१६२-१६६ अर्थ है। जीवको कभी भी ईश्वर नहीं कहा जा सकता। जीव विभु चैतन्य श्रीभगवान्का विभिन्नांश अणुचित् है। ईश्वर मायाधीश हैं और जीव मायाके वशीभूत होने योग्य है। 'काम' शब्दका पारिभाषिक अर्थ जाननेपर उसके भ्रमसे मुक्त होनेकी आशा हो सकती है। 'आत्मेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छा ..' का तटस्थ होकर विचार करनेसे यह समझ सकते हैं कि 'काम' वाञ्छाके अन्तर्भुक्त होनेपर भी वाञ्छामात्र ही 'काम' नहीं है। भुक्तिकामी—जो भोगके द्वारा ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियकी तुष्टिकी ही कामना करते हैं, मुक्तिकामी—जो त्रितापसे मुक्त होकर 'अहं ब्रह्मास्मि', इस भावको हृदयमें धारणकर मनकी तुष्टिके लिये व्यस्त हैं, और सिद्धिकामी—जो अष्टाङ्ग-योगके द्वारा अणिमा-लघिमादि अष्टसिद्धियोंके द्वारा लोगोंके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित करनेके लिये मनकी तुष्टिको लक्ष्य करते हैं, उन्हें ही समझना चाहिये। ये सभी अपनी इन्द्रियोंकी तुष्टिके लिये कार्य करते हैं, इसलिये ये सभी कामी हैं। काम अनेक रूपोंमें आकर लोगोंकी वञ्चना करता है। कभी वह अत्यन्त निकृष्ट स्थूल भावसे देहसे देहमें आकर्षण या स्त्री-पुरुषके कामके रूपमें, कभी त्याग, परार्थ-परता, आत्मदान, मातृस्नेह, भ्रातृभाव, देश-प्रीतिके रूपमें सजकर प्रच्छन्न भावसे उपस्थित होता है। निःस्वार्थपरता या त्याग आकाश-कुसुमके जैसे निरर्थक वाक्यविशेष हैं। एक जड़ मन-बुद्धि-अहङ्कारयुक्त मानव एक मानवके जड़देहके दुःखोंसे दुःखित होकर उसके दुःखको दूर करनेमें व्यस्त है, उसे कामके अतिरिक्त क्या कह सकते हैं? एक भगवतोन्मुख जीवात्मा जब एक जीवात्माकी कृष्णसेवा-विमुखता देखकर दुःखी होकर हरिकथा-कीर्तनके द्वारा साधु-शास्त्रके उपदेशके द्वारा उसको श्रीकृष्णसेवामें उन्मुख करनेके लिये व्यग्र होता है, तब इस वृत्तिको प्रेमकी पूर्व अवस्था कहा जा सकता है। इसलिये विभुचित् परमात्माके प्रति अणुचित् आत्माका जो स्वाभाविक निरन्तर अहैतुक आकर्षण है, वही सेवा है। उस सेवाकी परिपक्व अवस्था ही प्रेम है। प्रेम अप्राकृत वस्तु है। शुद्ध चेतन और शुद्ध चेतनमें प्रेम होता है। अचेतनसे अचेतन अथवा चेतनसे अचेतनका प्रेम नहीं हो सकता, वह काम ही है। आत्मा ही केवल स्वरूपसे भगवत्-सेवा प्रवृत्तिविशिष्ट है, सेवाके अतिरिक्त निर्मल जीवात्माकी और कोई वृत्ति नहीं है, इसलिये देह और मनकी अधीनतासे मुक्त आत्मा केवल श्रीकृष्णसेवा ही चाहती है, यही उसका स्वभाव है और यह इन्द्रियोंकी तुष्टि नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णभक्त निष्काम हैं। प्रेम कहनेसे भगवत्तोषणमें जो एकाग्रता, अव्यभिचारिणी रति होती है, उसीको समझना चाहिये। तत्त्वज्ञानके अभावके कारण फल्गु या शुष्क वैरागी लोग यह मानते हैं कि जो राग नश्वर पदार्थ और उसके केवल कामरूप आकारका ही है, उसके अभावमें वह समूल ध्वंसको प्राप्त होता है। रागके कामरूप विलयसे उसका प्रेमरूप आकार जो स्वतः ही प्रकट होता है, उसे शुष्क-वैरागी लोग नहीं जानते हैं। क्योंकि उन्हें प्रेमका परिचय ज्ञात नहीं है, इसलिये वे हरिसेवोपयोगी सामग्री अथवा क्रियाको प्रापञ्चिक पदार्थकी भाँति कार्यविशेष मानते हैं और उसमें हेयज्ञान करके उसमें श्रद्धा नहीं रखते हैं। सर्वप्रकार काम, मूल कामदेव श्रीकृष्णमें नियोजित ना होने तक काम दूर नहीं होता। काम अन्धतम एक अवस्था है और आत्मेन्द्रिय २१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१६२-१६६ ] प्रीति ही इसकी प्रवर्त्तक है। कृष्णेन्द्रिय प्रीतिरूप प्रेम भास्करके उदय होनेसे ही काम दूर होता है। जैसे (भःरःसिः १/२/२५६)— “प्रापञ्चकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि वस्तुनः। मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते॥” अर्थात् “जो भगवत्सेवाको जीवनका चरम प्रयोजनीय तत्त्व जानकर क्रमशः भक्तिपथपर अग्रसर होते हैं, वे धीरे-धीरे रागके हेय आकार अथवा कामरूप मलराशिका परित्याग कर देते हैं।” भक्ति अथवा भगवान्में स्वाभाविक आत्मवृत्तिके द्वारा ही भगवान् सेवित होते हैं। अच्युत भगवान्की भक्तिके द्वारा सब जीवोंकी सेवा स्वतः ही हो जाती है। भागवत (४/३१/१४)— “यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥” अर्थात् “जिस प्रकार वृक्षकी जड़को भलीभाँति सींचनेसे उसका तना, शाखा, उपशाखा, पत्र-पुष्पादि सभी सञ्जीवित हो जाते हैं तथा भोजनके द्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे समस्त इन्द्रियोंकी तृप्ति हो जाती है, उसी प्रकार एकमात्र श्रीभगवान्की सेवाके द्वारा सभी जीवोंकी, सभी देवताओंकी, चराचर जो कुछ भी है, प्रत्येककी सेवा होती है। (परन्तु जो ऐसा ना करके आँखमें, कानमें, नाकमें भोजन अर्पण करे, तो बहुत स्थानोंमें भोजन अर्पण करनेके क्लेशसे और निराहार होनेसे मृत्यु हो जायेगी)।” क्योंकि प्रत्येक प्राणीके अन्तर्यामीरूपमें वे भगवान् ही अधिष्ठित हैं। भगवान्की सेवा होनेसे, उनकी सन्तुष्टि होनेसे उनके नित्यदासगण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं— “तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्।” भक्तिरसामृतसिन्धु (१/४/१) में 'प्रेम'की संज्ञा इस प्रकार निर्दिष्ट हुई है— “सम्यङ् मसृणित-स्वान्तो ममत्वाश्याङ्कतः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते॥” अर्थात् “अन्तःकरण सम्यक् मसृणित होकर अतिशय ममतायुक्त भाव-गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसको 'प्रेम' कहते है।” महावदान्यावतार श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे पूर्व प्रेम और कामका यह पार्थक्य लोग नहीं जानते थे, वे कामको ही प्रेम कहकर भ्रमित होते थे। महाप्रभुने ही हमें प्रेमका सन्धान दिया है। इस विषयमें श्रीलप्रबोधानन्द सरस्वतीपादने कहा है— “प्रेमा नामाद्भुतार्थः श्रवणपथगतः कस्य नाम्नां महिम्नः को वेत्ता कस्य वृन्दावनविपिन-महामाधुरीषु प्रवेशः। को वा जानाति राधां परमरसचमत्कारमाधुर्यसीमा- मेकश्चैतन्यचन्द्रः परमकरुणया सर्वमाविश्चकार॥” अर्थात् “प्रेम नामक परम पुरुषार्थ किसके श्रवणगोचर हुआ था? कौन श्रीनामकी महिमा जानता था? किसका वृन्दावनके गहन-महामाधुरी-कदम्बमें प्रवेश था? कौन परम-चमत्कार अधिरूढ़-महाभाव-माधुर्यकी पराकाष्ठा श्रीवार्षभानवीको (उपास्यवस्तु रूपमें) जानता था? एक श्रीचैतन्यचन्द्रने ही परम औदार्यलीला प्रकट करके इन सबका आविष्कार किया है।” चौथा अध्याय | २१९
[ ४/१६२-१७० एक ग्रन्थ 'रामकृष्णकथामृत'में लिखा है—"जब केवल ईश्वरका ही दर्शन करना चाहते हो और धन, मान, देहसुख कुछ भी नहीं चाहते हो, तो इसका नाम शुद्धा भक्ति है।" किन्तु श्रीचैतन्यदेवने कहा—"धन, मान, देहसुख मात्र ना चाहना ही केवल शुद्ध भक्तिका मापदण्ड नहीं है, भगवान्के दर्शनकी इच्छा भी एक सम्भोगलालसा है। भगवान्के द्वारा दर्शन देनेपर मुझे सुख होगा, उससे भगवान्को सुख नहीं होता। भगवान्के सुखका अनुसन्धान ही 'शुद्धा भक्ति या प्रेम' है।" श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित 'शुद्धा भक्ति' या 'प्रेम' सम्भोगवादके ऊपर प्रतिष्ठित नहीं है, वह विप्रलम्भमय है। सभी इन्द्रियोंसे श्रीकृष्णकी इन्द्रिय-तृप्तिके लिये समस्त चेष्टाओंके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा, कृष्णसे इतर वस्तुकी पूजा, निर्भेदज्ञान, नित्य-नैमित्तिक कर्म, हठयोग, राजयोगादि, फल्गुवैराग्य-तपस्या आदि समस्तका परित्याग करके अनुकूल भावसे सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अनुशीलनका नाम ही शुद्धभक्ति है। यही पञ्चरात्र और श्रीमद्भागवत अनुमोदित 'शुद्धभक्ति' है। श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्यदेवके निकट शुद्धभक्ति और प्रेमकी शिक्षा छोड़कर अभक्तके निकट प्रेमकी शिक्षाके लिये नहीं जाना चाहिये; कुम्हारकी दुकानमें कोहीनूर हीरा नहीं मिलता॥ १६२-१६६॥ श्रीकृष्णप्रेमके लक्षण और परिचय :- लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म। लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख-मर्म॥ १६७॥ दुस्त्यज आर्यपथ, निज परिजन। स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन॥ १६८॥ सर्वत्याग करि' करे कृष्णेर भजन। कृष्णसुखहेतु करे प्रेम-सेवन॥ १६९॥ इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग। स्वच्छ धौतवस्त्रे यैछे नाहि कोन दाग॥ १७०॥ अनुवाद—गोपियोंने दुस्त्यज्य लोकधर्म अर्थात् समाजके नियम, वेदधर्म, देहधर्म अर्थात् देहकी रक्षा-पोषणादि, [सकाम] कर्म, लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख और वर्णाश्रमधर्मका त्याग कर दिया। उन्होंने श्रीकृष्णकी सेवाके लिये अपने परिवारवालोंकी डाँट-फटकार-दण्डकी भी परवाह नहीं की। उन्होंने केवल श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये उनकी प्रेममयी सेवा की। इसीको श्रीकृष्णमें दृढ़ अनुराग कहते हैं। स्वच्छ धुले हुए वस्त्रकी भाँति इसमें कोई भी स्वसुखवासनारूप दाग नहीं होता है॥ १६७-१७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने सुख-भोगके उद्देश्यवाली इच्छाओंका नाम 'काम' है। वेदोंमें स्वजनतृष्णा, पुत्रतृष्णा, धनतृष्णा आदि शब्दोंके द्वारा जो कामनाएँ वर्णित हैं, वे ही लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य, देहसुख, मुक्ति आदि रूप निजसुख, आर्यपथ, सम्बन्धियोंसे प्रीति और उनको ताड़न-भर्त्सन एवं भय—ये सब कामरूप अपनी इन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छाएँ हैं और इन सब कार्योंमें अपनी इन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा ही प्रवर्तक है। 'मैं श्रीकृष्णका दास हूँ'—ऐसी बुद्धिके अनुगत जितनी भी इच्छाएँ हैं, वे श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी प्रीतिवाञ्छा होती हैं। 'मैं २२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
फलका भोक्ता हूँ'—ऐसी बुद्धिसे जो समस्त इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, वे समस्त कामवाञ्छाएँ ही हैं। इन सबके त्यागके द्वारा देहकार्य-मनःकार्यादिके परित्यागका परामर्श नहीं है। देहकार्य-मनःकार्य सभीमें यदि 'मैं कृष्णदास हूँ', ऐसी बुद्धिके द्वारा प्रवर्तन करनेवाली प्रवृत्ति रहती है, तो वह 'काम' नहीं है॥१६५-१७०॥ अमृतानुकणिका—'लोकधर्म'—लोक समाजमें परस्पर सौहार्द, मर्यादा रक्षाके निमित्त जो सब आचरण पालन करते हैं, वे सभी लोकधर्म हैं। यदि कोई मेरी विपत्तिमें सहायता करता है, तो मेरा भी कर्त्तव्य होता है, उस व्यक्तिकी विपत्तिमें सहायतादि करना। सभी लोकाचार सम्बन्ध इसी प्रकार हैं; लोकधर्मके पालनमें निजी सुविधा है और पालन ना करनेमें असुविधा, इसलिये लोकधर्म पालन कामके ही अन्तर्गत है। 'वेदधर्म'—वेद-विहित कर्मादि; यज्ञानुष्ठानादि; वेद विहित कर्मादि करनेसे परकालमें स्वर्गादि-सुखभोग और इहकालमें धन-सम्पत्ति आदि प्राप्तिकी सम्भावना होती है। इस प्रकार आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे वेदधर्म भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहधर्म'—भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदिकी निवृत्तिके जो कुछ किया जाता है, वह देहधर्म कहलाता है; ये सब कर्म अपने सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये देहधर्म भी कामके अन्तर्गत है। 'कर्म'—सकाम कर्म अर्थात् जो भी वेद विहित कर्म अपने सुखके निमित्त किये जाते हैं, वे भी कामके अन्तर्गत हैं। 'लज्जा' एवं 'धैर्य'—लज्जा एवं धैर्यकी रक्षा नहीं करनेसे समाजमें कलङ्कित होनेपर दुःख होगा, इसलिये लज्जा-धैर्य-रक्षाके द्वारा आत्मसुखका पोषण होनेके कारण ये भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहसुख'—देहके सुखजनक कार्य; जैसे पाद-सम्वाहन, ग्रीष्मकालमें पंखेके द्वारा हवा, शीतकालमें अग्नि-तापादि, ये सभी आत्मेन्द्रिय-तृप्तिमूलक होनेके कारण कामके अन्तर्गत ही हैं। 'आत्मसुख-मर्म'—उपरोक्त लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य और देहसुख-ये सभी ही आत्मसुख-मर्म अर्थात् इन सभीका मर्म अथवा तात्पर्य आत्मेन्द्रिय-तृप्ति है, इसलिये ये सभी ही काम हैं। 'आर्यपथ'—आर्य किसे कहते हैं? “कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः॥” अर्थात् “कर्त्तव्य कर्मका आचरण और अकर्त्तव्य कर्मका अनाचरण करते हुए जो व्यक्ति वास्तविक आचार पालन करता है, उसे आर्य कहा जाता है।” इस प्रकार सदाचार-परायण आर्योंने जिसे सदाचार कहकर निर्दिष्ट किया है, वही आर्य पथ है। जैसे कुलरमणीके लिये पातिव्रत्यादि आर्यपथ है और इसका लोकसमाजमें रहते हुए त्याग करना दुष्कर है, क्योंकि इसके त्यागसे उनपर कलङ्क लगेगा और उनकी निन्दा होगी। परन्तु जो आर्यपथमें अवस्थित हैं, वे लोकसमाजमें सुख, ख्याति, सम्मानादि भोग करते हैं, इसलिये यह भी आत्मसुख पोषक होनेके कारण कामके ही अन्तर्गत है। 'निज परिजन'—कुलरमणी यदि पिता-माता, सास-ससुरादिका त्याग करके स्वतन्त्र आचरण करे, तो वह समाजमें कलङ्कित होती है तथा दुःख भोग करती है। परन्तु निज परिजनके बन्धनमें रहनेसे सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है। 'स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन'—परिवारजनोंकी डाँट-फटकार और अपमानके भयसे आर्यपथमें अवस्थान करना भी आत्मसुखका ही पोषण करता है, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है।
[ ४/१६७-१७३ अपने लिये परम-दुःखकर स्वजनोंकी डाँट-फटकार स्वीकार करके तथा मृत्युकी अपेक्षा भी दुःखजनक स्वजन-आर्यपथ-लज्जा-धैर्य आदिका पत्यागकर ब्रजसुन्दरियाँ श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा करती हैं। वे स्वजनोंकी डाँट-फटकारसे तनिक भी दुःखी नहीं होतीं अपितु सेवाके द्वारा श्रीकृष्णको सुखी देखकर स्वयंको कृतार्थ और सौभाग्यवती मानती हैं। लोकसमाजमें देखा जाता है कि कोई-कोई कुलटा स्त्री अपने सुखके लिये लोकधर्म-वेदधर्मादिका त्याग करती है, परन्तु वह निज सुखके निमित्त होनेके कारण काम ही है, प्रेम नहीं। ब्रजगोपियोंका आचरण श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीति-इच्छा-मूलक प्रेम है, आत्मेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा-मूलक काम नहीं है॥ १६७-१७०॥ काम और प्रेमका पार्थक्य :- अतएव काम-प्रेमे बहुत अन्तर। काम-अन्धतमः, प्रेम-निर्मल भास्कर॥ १७१॥ काम और गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम :- अतएव गोपीगणेर नाहि कामगन्ध। कृष्णसुख लागि मात्र, कृष्ण से सम्बन्ध॥ १७२॥ अनुवाद-इसलिये काम और प्रेममें बहुत अन्तर है। काम गहनतम अन्धकारके समान है और प्रेम चमकते हुए सूर्यकी भाँति है। इसलिये गोपियोंके प्रेममें कामकी गन्ध भी नहीं है, केवलमात्र श्रीकृष्ण-सुखके लिये उनका श्रीकृष्णसे सम्बन्ध है॥ १७१-१७२॥ अमृतानुकणिका-सूर्य और अन्धकार जिस प्रकार विरोधी वस्तुएँ हैं, प्रेम और काम भी उसी प्रकार परस्पर विरोधी हैं। अन्धकार और सूर्यके दृष्टान्तके द्वारा यह व्यञ्जित हो रहा है-जिस स्थानपर अन्धकार है, वहाँ सूर्यका अभाव है, इसी प्रकार जिस हृदयमें काम है, उस हृदयमें प्रेम नहीं रह सकता। और जहाँ सूर्य है, वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता; सूर्यके आगमनसे जैसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार जिस हृदयमें विशुद्ध प्रेम है, उसमें काम दूर हो जाता है। गोपियोंके हृदयमें विशुद्ध प्रेम है, इसलिये वहाँ कामका अत्यन्त अभाव है-गोपीप्रेममें कामकी गन्धमात्र भी नहीं है॥ १७१-१७२॥ गोपियोंके गाढ़ श्रीकृष्णप्रेमका परिचय :- श्रीमद्भागवत (१०/३१/१९)- यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ १७३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियाँ बोलीं- “हे प्रिय! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ १७३॥ २२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१७३-१७६ ]
अनुभाष्य-रासलीलासे श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनके लिये गोपियोंका विलापगीत- हे प्रिय, ते (तव) यत् सुजातचरणााम्बुरुहं (सुजातं सुकुमारं चरणाम्बुरुहं पदकमलं) कर्कशेषु (कठिनेषु) स्तनेषु भीताः (स्पर्शनदुःखाशङ्किताः सत्यः वयं) शनैः (सावधानाः) दधीमहि (धारयामः) तेन (चरणेन) अटवीं (वनस्थलीम्) अटसि (विचरसि), तदा [त्वत्चरणकमलं] कूर्पादिभिः (सूक्ष्मपाषाणखण्डैः) किं स्वित् न व्यथते इति भवदायुषां (भवान् एव आयुः जीवनं यासां तासां) नः (अस्माकं) धीः भ्रमति (चञ्चलतां गच्छति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७३॥ गोपियोंका शुद्धकृष्णप्रेम :- आत्म-सुख-दुःखे गोपीर नाहिक विचार। कृष्णसुखहेतु करे सब व्यवहार॥१७४॥ कृष्ण लागि' आर सब करि' परित्याग। कृष्णसुखहेतु करे शुद्ध अनुराग॥१७५॥ अनुवाद-गोपियोंमें अपने सुख या दुखका कोई विचार नहीं है, उनके सभी चेष्टाएँ और भावनाएँ केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये हैं। गोपियाँने श्रीकृष्णके लिये सब कुछ परित्याग कर दिया। श्रीकृष्णसुखके लिये ही उनका श्रीकृष्णसे शुद्ध अनुराग है॥१७४-१७५॥ गोपियोंके प्रेममें आबद्ध श्रीकृष्णकी अन्तर्धान होनेके लिये क्षमा-याचना :- श्रीमद्भागवत (१०/३२/२१)- एवं मदर्थोज्झितलोकवेद- स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबलाः। मया परोक्षं भजता तिरोहितं मासूतियितुं मार्हथ तत् प्रियं प्रियाः॥१७६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे गोपियों! मेरे लिये तुम लोगोंने लोकधर्म, वेदधर्म और सभी बन्धु-बान्धवोंका परित्याग किया है, तथापि मुझमें तुम्हारे प्रेमकी वृद्धि होगी, यह सोचकर मैं अन्तर्धान हो गया था। हे प्रियाओं! मैं तुम्हारे प्रियसाधनमें प्रवृत्त हूँ, इसलिये मेरे प्रति दोषारोपण मत करो॥१७६॥ अनुभाष्य-रासस्थलीमें पुनः प्रकट होकर श्रीकृष्णने गोपियोंके वाक्य सुनकर कहा- हे प्रियाः अबलाः, एवं (अनेन प्रकारेण) मदर्थोज्झितलोकवेदस्वानां (मदर्थं मत्प्राप्तिनिमित्तं उज्झिताः त्यक्ताः लोकाः संसार-धर्मादयः, वेदाः पारलौकिक-धर्माः स्वाः च निजसम्बन्धिपरिजनाश्च याभिः कृष्णैकप्राणाभिः तासां) वः (युष्माकं) मयि अनुवृत्तये (उक्तलक्षणानामन्येषां भक्तानामिवानुवृत्तिवृद्धयै) परोक्षम् (अदर्शनं यथा भवति तथा) भजता (उपकुर्वता) मया तिरोहितम् (अन्तर्धानेन स्थितं) हि तत् (तस्मात्) प्रियं मा (माम्) असूयितुं (दोषदृष्ट्या द्रष्टुं) मा (न) अर्हथ। श्लोक-भावानुवाद-हे प्रियाओं! हे अबलाओं! तुमलोग मेरी प्राप्तिके लिये संसारधर्म (लौकिकधर्म), वेदधर्म (पारलौकिकधर्म) और अपने सगे-सम्बन्धियों, सबका परित्यागकर मेरे पास आयी हो। मैं भी उसी प्रकारसे 'अनुवृत्तये' अर्थात् प्रेमकी वृद्धिके लिये उक्त लक्षणके अनुसार अन्यान्य भक्तोंकी भाँति परोक्ष रूपसे तुम्हारा भजन कर रहा था, अर्थात् तुम्हारा
चौथा अध्याय | २२३
[ ४/१७६-१८० प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये अन्तर्हित हो गया था। इसलिये मेरे प्रति दोषारोप करना तुम लोगोंके लिये उचित नहीं है॥१७६॥ शुद्धभक्तिके प्रकार-भेदसे श्रीकृष्णप्राप्तिका तारतम्य :- कृष्णेर प्रतिज्ञा एक आछे पूर्व हैते। ये यैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे॥१७७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने पहले एक प्रतिज्ञा की है कि जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसका उसी प्रकारसे भजन करता हूँ॥१७७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (४/११)— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥१७८॥ अनुवाद—हे पार्थ! जो जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी रूपसे फल देकर उनका भजन किया करता हूँ। क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे पथका अनुसरण करते हैं॥१७८॥ गोपियोंके प्रेमके ऋण-शोधनमें श्रीकृष्णकी असमर्थता :- से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल गोपीर भजने। ताहाते प्रमाण कृष्ण-श्रीमुखवचने॥१७९॥ अनुवाद—परन्तु गोपियोंके भजन अर्थात् प्रेमसे वह प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसका प्रमाण स्वयं श्रीकृष्णके मुखसे निकले वचन हैं॥१७९॥ श्रीमद्भागवत (१०/३२/२२)— न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माऽभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥१८०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन निर्मल है। अनेक जन्मोंमें भी मैं अपने सत्कार्योंके द्वारा तुम्हारे प्रति कर्त्तव्यानुष्ठान नहीं कर सकता, क्योंकि तुम लोगोंने मेरी प्राप्तिके लिये अति कठिन संसार-शृङ्खलाको सम्पूर्णरूपसे तोड़कर मेरा अन्वेषण किया है। मैं तुम लोगोंके इस ऋणका परिशोधन करनेमें सक्षम नहीं हूँ। इसलिये तुम लोग अपने साधु कार्योंके द्वारा ही परितुष्ट होओ॥१८०॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण जब राससे अन्तर्धान हो गये और गोपियाँ उनके अदर्शनसे विलाप करने लगीं। उनके विलाप-गीतको श्रवणकर श्रीकृष्ण पुनः प्रकट होकर गोपियोंको इस प्रकार कहकर सान्त्वना प्रदान करने लगे— निरवद्यसंयुजां (निरवद्या निष्कपटा संयुक् सम्यक् मिलनं यासां तासां) वः (युष्माकं) स्वसाधुकृत्यं (स्वीयम् असाधारणं यत् साधुकृत्यं साधुकर्म तत्) अहं विबुधायुषापि (विबुधानां देवानां आयुस्तत्कालमितेनापि) न पारये २२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४।१८०-१८५ ] (शक्नोमि प्रतिदातुमित्यर्थः)। याः (भवत्यः) दुर्जरगेहशृङ्खलाः (दुर्जराः अनभिभव्याः याः गेहरूपाः शृङ्खलास्ताः) संवृश्च्य (निःशेषं छित्वा) मा (माम्) अभजन्, तासां वः (युष्माकम्) एव साधुना (साधुकृत्येन) तत् (युष्मत्साधुकृतं) प्रतियातु (प्रतिकृतं भवतु)। श्लोक-भावानुवाद—मेरे साथ तुम लोगोंका जो मिलन है, वह सर्वथा निष्कपट है। इसलिये देवताओंकी आयुकालतक भी मैं तुम लोगोंके साधुकर्मोंका प्रतिदान करनेमें समर्थ नहीं हूँ। [वे साधुकर्म किस प्रकारके हैं?]—तुम लोगोंने दुर्जर अर्थात् कठिन और ना टूटनेवाली घर-गृहस्थीकी शृङ्खलाओंको सम्पूर्ण रूपसे तोड़कर मेरा जो भजन किया है। मैं तुम लोगोंका इस प्रकार एकनिष्ठ भजन नहीं कर सकता, इसलिये तुम लोगोंके साधुकर्मोंके द्वारा ही तुम लोगोंका साधुकृत्य प्रत्युपकृत हो॥१८०॥ गोपियोंकी अपनी देहके शृङ्गारके मूलमें भी श्रीकृष्ण-सुखतात्पर्य :- तबे ये देखिये गोपीर निजदेहे प्रीत। सेहो त' कृष्णेर लागि, जानिह निश्चित॥१८१॥ 'एइ देह कैलुँ आमि कृष्णे समर्पण। ताँर धन, ताँर एइ सम्भोग-कारण॥१८२॥ ए देह-दर्शन-स्पर्शे कृष्ण-सन्तोषन।' एइ लागि' करे अङ्गेर मार्जन-भूषण॥१८३॥ अनुवाद—तब गोपियोंकी जो अपनी देहके प्रति प्रीति दिखायी देती है, तो यह निश्चित जानो कि वह श्रीकृष्णके सुखके लिये ही है। गोपियाँ सोचती हैं—'इस शरीरको मैंने कृष्णको समर्पण कर दिया है, अब यह उनका धन और उनके भोगका साधन है।' इस देहके दर्शन और स्पर्शसे श्रीकृष्णकी सन्तुष्टि हो, इसलिये वे अपने अङ्गोंका मार्जनकर उनको अलङ्कारों आदिसे सजाती हैं॥१८१-१८३॥ लघुभागवतामृत उत्तरखण्डमें (४०) आदिपुराणवचन— निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते। ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढप्रेमभाजनम्॥१८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—“गोपियाँ अपने शरीरको मेरा भोग्य माननेके कारण उसके लिये यत्न (मार्जन-शृङ्गारादि) करती हैं। हे पार्थ! उन गोपियोंसे अधिक मेरे प्रेमका पात्र और कोई नहीं है॥”१८४॥ अनुभाष्य—हे पार्थ, या गोप्यः निजाङ्ग अपि मम इति (कान्तार्पितमिदं शरीरं भगवतः इति) समुपासते (भूषणादिभिरलङ्करोति) ताभ्यः (गोपीभ्यः) परम अन्यत् मे (मम) निगूढप्रेमभाजनं (निगूढप्रेमपात्रं) नास्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८४॥ गोपियोंका सेवासुख श्रीकृष्णसुखकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक :- आर एक अद्भुत गोपीभावेर स्वभाव। बुद्धिर गोचर नहे याहार प्रभाव॥१८५॥ चौथा अध्याय | २२५
[ ४/१८५-१९३ गोपीगण करेन यबे कृष्ण दरशन। सुखवाञ्छा नाहि, सुख हय कोटिगुण ॥ १८६ ॥ गोपिका-दर्शने कृष्णेर ये आनन्द हय। ताहा हैते कोटिगुण गोपी आस्वादय ॥ १८७ ॥ अनुवाद—गोपीभावका और एक अद्भुत स्वभाव है, जिसका प्रभाव बुद्धिसे अतीत है। गोपियाँ जब श्रीकृष्णका दर्शन करती हैं, उनको अपने सुखकी अभिलाषा नहीं रहनेपर भी उनको श्रीकृष्णसे कोटि गुणा सुख होता है। गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उससे कोटि गुणा आनन्द गोपियाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे आस्वादन करती हैं॥ १८४-१८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंमें निजसुखकी अभिलाषा नहीं है, तो भी गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णको जो सुख होता है, उसकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक सुखका आस्वादन गोपियोंको श्रीकृष्णका दर्शन करके होता है॥ १८६-१८७॥ ताँ सबार नाहि निजसुख-अनुरोध। तथापि बाड़ये सुख, पड़िल विरोध ॥ १८८ ॥ ए विरोधेर एकमात्र देखि समाधान। गोपिकार सुखे कृष्णसुख पर्यवसान ॥ १८९ ॥ पाठान्तर—गोपिकार सुख कृष्णसुखे पर्यवसान। अनुवाद—यद्यपि गोपियोंमें निजसुखकी लालसा नहीं रहती है, तो भी उनका सुख बढ़ता है। यह तो निःसन्देह विरोधाभास है, [क्योंकि सुखकी लालसा नहीं होनेसे सुखका आस्वादन कैसे हो सकता है?] इस विरोधाभासका एकमात्र जो समाधान दिखायी देता है—वह यह है कि गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखमें ही निहित है॥ १८८-१८९॥ गोपिका-दर्शने कृष्णेर बाड़े प्रफुल्लता। से माधुर्य बाड़े यार नाहिक समता ॥ १९० ॥ आमार दर्शने कृष्ण पाइल एत सुख। एइ सुखे गोपीर प्रफुल्ल अङ्गमुख ॥ १९१ ॥ अनुवाद—गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णके हृदयमें जो प्रफुल्लता होती है, उससे उनका अद्वितीय माधुर्य और बढ़ता है। 'अहो! हमारे दर्शनसे हमारे प्रिय कृष्णको इतना सुख मिला'—इसी सुखसे गोपियोंका मुखमण्डल और शरीर प्रफुल्लित हो जाता है अर्थात् उसकी शोभा और बढ़ जाती है॥ १९०-१९१॥ गोपी-शोभा देखि' कृष्णेर शोभा बाड़े यत। कृष्ण-शोभा देखि' गोपीर शोभा बाड़े तत ॥ १९२ ॥ एइमत परस्पर पड़े हुड़ाहूड़ी। परस्पर बाड़े, केह मुख नाहि मुड़ि ॥ १९३ ॥ अनुवाद—गोपियोंकी शोभाको देखकर, श्रीकृष्णकी शोभा जितनी बढ़ती है; श्रीकृष्णकी (उस २२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१९२-१९६ ] वर्द्धित) शोभाको देखकर गोपियोंकी शोभा उतनी ही और बढ़ जाती है। इस प्रकार दोनोंकी शोभाकी आपसमें होड़ लग जाती है और दोनों बढ़ती जाती हैं। इस प्रतिस्पर्धा में कोई हार नहीं मानती॥१९२-१९३॥ श्रीकृष्णके सुखमें गोपियोंका सुख :- किन्तु कृष्णेर सुख हय गोपी-रूप-गुणे। ताँर सुखे सुखवृद्धि हये गोपीगणे॥१९४॥ श्रीकृष्णके सुखकी वृद्धिके कारण गोपीप्रेम 'काम' नहीं :- अतएव सेइ सुख कृष्ण-सुख पोषे। एइ हेतु गोपी-प्रेमे नाहि काम-दोष॥१९५॥ अनुवाद-किन्तु गोपियोंके रूप और गुणोंका आस्वादनकर श्रीकृष्णको सुख होता है और श्रीकृष्णके सुखको देखकर गोपियोंके सुखमें वृद्धि होती है। वही गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखका पोषण करता है, इसलिये गोपी-प्रेममें 'काम' का दोष नहीं है॥१९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि श्रीकृष्णके दर्शनसे गोपियोंको जो सुख होता है, उसे कोई-कोई 'काम' कहकर दोषारोपण कर सकते हैं, तो भी जब गोपियोंके मनका भाव इस प्रकार है कि 'कृष्ण-दर्शनसे हम लोग सुखी हुई हैं-इस भावको ग्रहण करनेपर कृष्णका सुख अधिक पुष्ट होगा' तब श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छा ही गोपियोंके सुखप्राप्तिका परम कारण है। इसलिये उसमें निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छारूप काम-दोष नहीं है॥१९४-१९५॥ स्तवमालामें केशवाष्टक (८)- उपेत्य पथि सुन्दरीततिभिरभिरभ्यर्थितं स्मिताङ्कुरकरम्बितैर्नटदपाङ्गभङ्गीशतैः। स्तन-स्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं व्रजे विजयिनं भजे विपिनदेशतः केशवम्॥१९६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो केशव वनसे व्रजमें आ रहे हैं, मैं उनका भजन करता हूँ। वे मृदुहास्ययुक्त व्रजसुन्दरियोंकी सैकड़ों प्रकारसे नृत्यशील भङ्गीके द्वारा मार्गमें अर्चित हो रहे हैं। भ्रमरके समान उनके नेत्र-कटाक्ष उन गोपियोंके स्तनस्तबकके (स्तनोंको पुष्पोंका गुच्छा मानकर उनके) चारों ओर मँडरा रहे हैं॥१९६॥ अनुभाष्य-आभिः सुन्दरीततिभिः (व्रजविलासिनीश्रेणीभिः) उपेत्य (अट्टालिकामारुह्य) पथि (मार्गे) स्मिताङ्कुरकरम्बितैः (मन्दहास्याङ्कुरं तेन करम्बिताः युक्तास्तैः) नटदपाङ्गभङ्गीशतैः (नटत् अपाङ्गं नयनकटाक्षं यस्य तस्य भङ्गीशतानि तैः) अभ्यर्थितं (सर्वतोभावेन पूजितं) स्तनस्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं (स्तनस्तबकाः गुच्छाः इव तेषु सञ्चरत् नयनयोः चञ्चरीकयोः भृङ्गयोः इव अञ्चलं प्रान्तभागः यस्य सः तं) विपिनदेशतः (अपराह्ने गोचारणात्) व्रजे (नन्दीश्वरे) विजयिनं केशवं (कृष्णं) भजे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ चौथा अध्याय | २२७
[ ४/१९७-२०२ गोपीप्रेमके स्वाभाविक लक्षण :- आर एक गोपीप्रेमेर स्वाभाविक चिह्न। ये-प्रकारे हय प्रेम काम-गन्ध-हीन॥१९७॥ गोपीप्रेमे करे कृष्णमाधुर्य्येर पुष्टि। माधुर्य बाड़ाय प्रेम हञा महातुष्टि॥१९८॥ सेव्य 'विषय'की प्रीतिमें ही सेवक 'आश्रय'की शुद्धप्रीति :- प्रीतिविषयानन्दे तदाश्रयानन्द। ताँहा नाहि निजसुखवाञ्छार सम्बन्ध॥१९९॥ निरुपाधि प्रेम याँहा, ताँहा एइ रीति। प्रीतिविषयसुखे आश्रयेर प्रीति॥२००॥ अनुवाद-गोपीप्रेमका एक और प्रकारका स्वाभाविक लक्षण है जो दिखलाता है कि उसमें कामकी गन्ध भी नहीं है। गोपियोंका प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्यकी पुष्टि करता है और वही वर्धित माधुर्य उनके प्रेमको बढ़ाता है; इस प्रकार वे परम सन्तुष्ट होती हैं। जो प्रेमके विषय हैं, उनके आनन्दमें ही प्रेमके आश्रयका आनन्द निहित होता है। इसलिये इसमें निजसुख लालसाका कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँ निरुपाधिक प्रेम है, वहाँ यही रीति है। प्रेमके विषयके सुखसे ही आश्रयको सुख मिलता है॥१९७-२००॥ श्रीकृष्णसेवाकालमें निजेन्द्रियप्रीतिके प्रति घृणा और दूरसे ही परित्यज्य :- निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे। से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महाक्रोधे॥२०१॥ अनुवाद-जब प्रेममें अपने आनन्दसे श्रीकृष्णके सेवानन्दमें बाधा उत्पन्न होती है, तो उस निज आनन्दके प्रति भक्तको अत्यधिक क्रोध होता है॥२०१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रीतिके विषय श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उसीसे ही प्रीतिकी आश्रय गोपियोंको आनन्द होता है। इस प्रकार आनन्दसमृद्धिसे गोपियोंका अपनी सुख-अभिलाषासे कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँपर निरुपाधिक प्रेम होता है, वहाँपर यही रीति दिखलायी देती है अर्थात् प्रीतिके विषयके सुखमें ही प्रीतिके आश्रयका सुख निहित होता है। तो भी एक बात कही जा सकती है, जहाँ अपना प्रेमानन्द होता है, वहाँ श्रीकृष्णसेवानन्दमें बाधा अवश्य ही होगी। इसलिये जब सेवानन्दके बाधकरूप आनन्दका उदय होता है, तब भक्तके अन्दर महाक्रोध उपस्थित होता है॥१९९-२०१॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (३/२/६२)- अङ्गस्तम्भारम्भमुत्तुङ्गयन्तं प्रेमानन्दं दारुको नाभ्यनन्दत्। कंसारातेर्बीजने येन साक्षादक्षोदीयानन्तरायो व्यधायि॥२०२॥ अनुवाद-अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥२०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णको चामर ढुलानेके समय प्रेमानन्दसे उत्पन्न शरीरकी जड़ताको सेवामें बाधा जानकर दारुकने उसका अभिनन्दन नहीं किया॥२०२॥ २२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२०२-२०६ ]
अनुभाष्य-येन (प्रेमानन्देन) कंसारातेः (कृष्णस्य) बीजने (चामरसेवने) साक्षात् अक्षोदीयान् (महान्) अन्तरायः (बाधकः) व्यधायि, दारुकः (श्रीकृष्णस्य सारथिः) अङ्गस्तम्भारम्भम् (अङ्गानां स्तम्भारम्भं जड़ीभावम्) उत्तुङ्गयन्तं (प्रापयन्तं) तं प्रेमानन्दं (निजानुभवार्हानन्दं) नाभ्यनन्दत् (आनुकूल्यकरत्वे नैव अभिलषितवान्)। श्लोक-भावानुवाद-जब श्रीकृष्णके सारथी दारुक श्रीकृष्णको चामर झुला रहे थे, उस समय प्रेमानन्दसे उनके सारे अङ्गोंमें जड़ता उपस्थित हुई, किन्तु दारुकने इस प्रेमानन्दको साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें अवरोध मानकर उसका अभिनन्दन नहीं किया अर्थात् उसकी अभिलाषा नहीं की॥२०२॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (२/३/५४)- गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणम्। उच्चैरनिन्ददानन्दमरविन्दविलोचना॥२०३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कमलनयना श्रीकृष्णभामिनीने श्रीकृष्णदर्शनके बाधास्वरूप नेत्रोंसे जलका वर्षण करनेवाले आनन्दकी अतिशय निन्दा की॥२०३॥ अनुभाष्य-अरविन्दविलोचना (कमलनेत्रा राधिका) गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणं (गोविन्दस्य प्रेक्षणं तस्य आक्षेपी बाधको यो वाष्पपूराश्रुवृन्दं तम् अभिवर्षितुं स्वभावो यस्य तम्) आनन्दम् उच्चैः (अतिशयेन) अनिन्दत् (निनिन्द)। श्लोक-भावानुवाद-कमलनयना श्रीमती राधिकाने गोविन्दके दर्शनमें बाधक आनन्द जिसका स्वभाव नेत्रोंसे अश्रुवर्षण कराना है, उसकी अत्यधिक निन्दा की॥२०३॥ शुद्धभक्तकी श्रीकृष्णभक्ति बिना मुक्तिसे भी घृणा :- आर शुद्धभक्त कृष्ण-प्रेम-सेवा-बिने। स्वसुखार्थ सालोक्यादि ना करे ग्रहणे॥२०४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-और भी देखो, श्रीकृष्ण-प्रेमसेवाके बिना अपने सुखके लिये शुद्धभक्त सालोक्यादि मुक्तिको भी कभी ग्रहण नहीं करते॥२०४॥ श्रीकृष्णमें अहैतुकी और अप्रतिहता भक्ति ही निर्गुणा :- श्रीमद्भागवत (३/२९/११-१२)- मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥२०५॥ लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥२०६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०५-२०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी
चौथा अध्याय | २२९