श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 262, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४/१६२-१७० एक ग्रन्थ 'रामकृष्णकथामृत'में लिखा है—"जब केवल ईश्वरका ही दर्शन करना चाहते हो और धन, मान, देहसुख कुछ भी नहीं चाहते हो, तो इसका नाम शुद्धा भक्ति है।" किन्तु श्रीचैतन्यदेवने कहा—"धन, मान, देहसुख मात्र ना चाहना ही केवल शुद्ध भक्तिका मापदण्ड नहीं है, भगवान्के दर्शनकी इच्छा भी एक सम्भोगलालसा है। भगवान्के द्वारा दर्शन देनेपर मुझे सुख होगा, उससे भगवान्को सुख नहीं होता। भगवान्के सुखका अनुसन्धान ही 'शुद्धा भक्ति या प्रेम' है।" श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित 'शुद्धा भक्ति' या 'प्रेम' सम्भोगवादके ऊपर प्रतिष्ठित नहीं है, वह विप्रलम्भमय है। सभी इन्द्रियोंसे श्रीकृष्णकी इन्द्रिय-तृप्तिके लिये समस्त चेष्टाओंके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा, कृष्णसे इतर वस्तुकी पूजा, निर्भेदज्ञान, नित्य-नैमित्तिक कर्म, हठयोग, राजयोगादि, फल्गुवैराग्य-तपस्या आदि समस्तका परित्याग करके अनुकूल भावसे सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अनुशीलनका नाम ही शुद्धभक्ति है। यही पञ्चरात्र और श्रीमद्भागवत अनुमोदित 'शुद्धभक्ति' है। श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्यदेवके निकट शुद्धभक्ति और प्रेमकी शिक्षा छोड़कर अभक्तके निकट प्रेमकी शिक्षाके लिये नहीं जाना चाहिये; कुम्हारकी दुकानमें कोहीनूर हीरा नहीं मिलता॥ १६२-१६६॥ श्रीकृष्णप्रेमके लक्षण और परिचय :- लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म। लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख-मर्म॥ १६७॥ दुस्त्यज आर्यपथ, निज परिजन। स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन॥ १६८॥ सर्वत्याग करि' करे कृष्णेर भजन। कृष्णसुखहेतु करे प्रेम-सेवन॥ १६९॥ इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग। स्वच्छ धौतवस्त्रे यैछे नाहि कोन दाग॥ १७०॥ अनुवाद—गोपियोंने दुस्त्यज्य लोकधर्म अर्थात् समाजके नियम, वेदधर्म, देहधर्म अर्थात् देहकी रक्षा-पोषणादि, [सकाम] कर्म, लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख और वर्णाश्रमधर्मका त्याग कर दिया। उन्होंने श्रीकृष्णकी सेवाके लिये अपने परिवारवालोंकी डाँट-फटकार-दण्डकी भी परवाह नहीं की। उन्होंने केवल श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये उनकी प्रेममयी सेवा की। इसीको श्रीकृष्णमें दृढ़ अनुराग कहते हैं। स्वच्छ धुले हुए वस्त्रकी भाँति इसमें कोई भी स्वसुखवासनारूप दाग नहीं होता है॥ १६७-१७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने सुख-भोगके उद्देश्यवाली इच्छाओंका नाम 'काम' है। वेदोंमें स्वजनतृष्णा, पुत्रतृष्णा, धनतृष्णा आदि शब्दोंके द्वारा जो कामनाएँ वर्णित हैं, वे ही लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य, देहसुख, मुक्ति आदि रूप निजसुख, आर्यपथ, सम्बन्धियोंसे प्रीति और उनको ताड़न-भर्त्सन एवं भय—ये सब कामरूप अपनी इन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छाएँ हैं और इन सब कार्योंमें अपनी इन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा ही प्रवर्तक है। 'मैं श्रीकृष्णका दास हूँ'—ऐसी बुद्धिके अनुगत जितनी भी इच्छाएँ हैं, वे श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी प्रीतिवाञ्छा होती हैं। 'मैं २२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत