भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 2549 में से

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फलका भोक्ता हूँ'—ऐसी बुद्धिसे जो समस्त इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, वे समस्त कामवाञ्छाएँ ही हैं। इन सबके त्यागके द्वारा देहकार्य-मनःकार्यादिके परित्यागका परामर्श नहीं है। देहकार्य-मनःकार्य सभीमें यदि 'मैं कृष्णदास हूँ', ऐसी बुद्धिके द्वारा प्रवर्तन करनेवाली प्रवृत्ति रहती है, तो वह 'काम' नहीं है॥१६५-१७०॥ अमृतानुकणिका—'लोकधर्म'—लोक समाजमें परस्पर सौहार्द, मर्यादा रक्षाके निमित्त जो सब आचरण पालन करते हैं, वे सभी लोकधर्म हैं। यदि कोई मेरी विपत्तिमें सहायता करता है, तो मेरा भी कर्त्तव्य होता है, उस व्यक्तिकी विपत्तिमें सहायतादि करना। सभी लोकाचार सम्बन्ध इसी प्रकार हैं; लोकधर्मके पालनमें निजी सुविधा है और पालन ना करनेमें असुविधा, इसलिये लोकधर्म पालन कामके ही अन्तर्गत है। 'वेदधर्म'—वेद-विहित कर्मादि; यज्ञानुष्ठानादि; वेद विहित कर्मादि करनेसे परकालमें स्वर्गादि-सुखभोग और इहकालमें धन-सम्पत्ति आदि प्राप्तिकी सम्भावना होती है। इस प्रकार आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे वेदधर्म भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहधर्म'—भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदिकी निवृत्तिके जो कुछ किया जाता है, वह देहधर्म कहलाता है; ये सब कर्म अपने सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये देहधर्म भी कामके अन्तर्गत है। 'कर्म'—सकाम कर्म अर्थात् जो भी वेद विहित कर्म अपने सुखके निमित्त किये जाते हैं, वे भी कामके अन्तर्गत हैं। 'लज्जा' एवं 'धैर्य'—लज्जा एवं धैर्यकी रक्षा नहीं करनेसे समाजमें कलङ्कित होनेपर दुःख होगा, इसलिये लज्जा-धैर्य-रक्षाके द्वारा आत्मसुखका पोषण होनेके कारण ये भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहसुख'—देहके सुखजनक कार्य; जैसे पाद-सम्वाहन, ग्रीष्मकालमें पंखेके द्वारा हवा, शीतकालमें अग्नि-तापादि, ये सभी आत्मेन्द्रिय-तृप्तिमूलक होनेके कारण कामके अन्तर्गत ही हैं। 'आत्मसुख-मर्म'—उपरोक्त लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य और देहसुख-ये सभी ही आत्मसुख-मर्म अर्थात् इन सभीका मर्म अथवा तात्पर्य आत्मेन्द्रिय-तृप्ति है, इसलिये ये सभी ही काम हैं। 'आर्यपथ'—आर्य किसे कहते हैं? “कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः॥” अर्थात् “कर्त्तव्य कर्मका आचरण और अकर्त्तव्य कर्मका अनाचरण करते हुए जो व्यक्ति वास्तविक आचार पालन करता है, उसे आर्य कहा जाता है।” इस प्रकार सदाचार-परायण आर्योंने जिसे सदाचार कहकर निर्दिष्ट किया है, वही आर्य पथ है। जैसे कुलरमणीके लिये पातिव्रत्यादि आर्यपथ है और इसका लोकसमाजमें रहते हुए त्याग करना दुष्कर है, क्योंकि इसके त्यागसे उनपर कलङ्क लगेगा और उनकी निन्दा होगी। परन्तु जो आर्यपथमें अवस्थित हैं, वे लोकसमाजमें सुख, ख्याति, सम्मानादि भोग करते हैं, इसलिये यह भी आत्मसुख पोषक होनेके कारण कामके ही अन्तर्गत है। 'निज परिजन'—कुलरमणी यदि पिता-माता, सास-ससुरादिका त्याग करके स्वतन्त्र आचरण करे, तो वह समाजमें कलङ्कित होती है तथा दुःख भोग करती है। परन्तु निज परिजनके बन्धनमें रहनेसे सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है। 'स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन'—परिवारजनोंकी डाँट-फटकार और अपमानके भयसे आर्यपथमें अवस्थान करना भी आत्मसुखका ही पोषण करता है, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है।

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