भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/१६७-१७३ अपने लिये परम-दुःखकर स्वजनोंकी डाँट-फटकार स्वीकार करके तथा मृत्युकी अपेक्षा भी दुःखजनक स्वजन-आर्यपथ-लज्जा-धैर्य आदिका पत्यागकर ब्रजसुन्दरियाँ श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा करती हैं। वे स्वजनोंकी डाँट-फटकारसे तनिक भी दुःखी नहीं होतीं अपितु सेवाके द्वारा श्रीकृष्णको सुखी देखकर स्वयंको कृतार्थ और सौभाग्यवती मानती हैं। लोकसमाजमें देखा जाता है कि कोई-कोई कुलटा स्त्री अपने सुखके लिये लोकधर्म-वेदधर्मादिका त्याग करती है, परन्तु वह निज सुखके निमित्त होनेके कारण काम ही है, प्रेम नहीं। ब्रजगोपियोंका आचरण श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीति-इच्छा-मूलक प्रेम है, आत्मेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा-मूलक काम नहीं है॥ १६७-१७०॥ काम और प्रेमका पार्थक्य :- अतएव काम-प्रेमे बहुत अन्तर। काम-अन्धतमः, प्रेम-निर्मल भास्कर॥ १७१॥ काम और गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम :- अतएव गोपीगणेर नाहि कामगन्ध। कृष्णसुख लागि मात्र, कृष्ण से सम्बन्ध॥ १७२॥ अनुवाद-इसलिये काम और प्रेममें बहुत अन्तर है। काम गहनतम अन्धकारके समान है और प्रेम चमकते हुए सूर्यकी भाँति है। इसलिये गोपियोंके प्रेममें कामकी गन्ध भी नहीं है, केवलमात्र श्रीकृष्ण-सुखके लिये उनका श्रीकृष्णसे सम्बन्ध है॥ १७१-१७२॥ अमृतानुकणिका-सूर्य और अन्धकार जिस प्रकार विरोधी वस्तुएँ हैं, प्रेम और काम भी उसी प्रकार परस्पर विरोधी हैं। अन्धकार और सूर्यके दृष्टान्तके द्वारा यह व्यञ्जित हो रहा है-जिस स्थानपर अन्धकार है, वहाँ सूर्यका अभाव है, इसी प्रकार जिस हृदयमें काम है, उस हृदयमें प्रेम नहीं रह सकता। और जहाँ सूर्य है, वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता; सूर्यके आगमनसे जैसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार जिस हृदयमें विशुद्ध प्रेम है, उसमें काम दूर हो जाता है। गोपियोंके हृदयमें विशुद्ध प्रेम है, इसलिये वहाँ कामका अत्यन्त अभाव है-गोपीप्रेममें कामकी गन्धमात्र भी नहीं है॥ १७१-१७२॥ गोपियोंके गाढ़ श्रीकृष्णप्रेमका परिचय :- श्रीमद्भागवत (१०/३१/१९)- यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ १७३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियाँ बोलीं- “हे प्रिय! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ १७३॥ २२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत