भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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अनुभाष्य-रासलीलासे श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनके लिये गोपियोंका विलापगीत- हे प्रिय, ते (तव) यत् सुजातचरणााम्बुरुहं (सुजातं सुकुमारं चरणाम्बुरुहं पदकमलं) कर्कशेषु (कठिनेषु) स्तनेषु भीताः (स्पर्शनदुःखाशङ्किताः सत्यः वयं) शनैः (सावधानाः) दधीमहि (धारयामः) तेन (चरणेन) अटवीं (वनस्थलीम्) अटसि (विचरसि), तदा [त्वत्चरणकमलं] कूर्पादिभिः (सूक्ष्मपाषाणखण्डैः) किं स्वित् न व्यथते इति भवदायुषां (भवान् एव आयुः जीवनं यासां तासां) नः (अस्माकं) धीः भ्रमति (चञ्चलतां गच्छति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७३॥ गोपियोंका शुद्धकृष्णप्रेम :- आत्म-सुख-दुःखे गोपीर नाहिक विचार। कृष्णसुखहेतु करे सब व्यवहार॥१७४॥ कृष्ण लागि' आर सब करि' परित्याग। कृष्णसुखहेतु करे शुद्ध अनुराग॥१७५॥ अनुवाद-गोपियोंमें अपने सुख या दुखका कोई विचार नहीं है, उनके सभी चेष्टाएँ और भावनाएँ केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये हैं। गोपियाँने श्रीकृष्णके लिये सब कुछ परित्याग कर दिया। श्रीकृष्णसुखके लिये ही उनका श्रीकृष्णसे शुद्ध अनुराग है॥१७४-१७५॥ गोपियोंके प्रेममें आबद्ध श्रीकृष्णकी अन्तर्धान होनेके लिये क्षमा-याचना :- श्रीमद्भागवत (१०/३२/२१)- एवं मदर्थोज्झितलोकवेद- स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबलाः। मया परोक्षं भजता तिरोहितं मासूतियितुं मार्हथ तत् प्रियं प्रियाः॥१७६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे गोपियों! मेरे लिये तुम लोगोंने लोकधर्म, वेदधर्म और सभी बन्धु-बान्धवोंका परित्याग किया है, तथापि मुझमें तुम्हारे प्रेमकी वृद्धि होगी, यह सोचकर मैं अन्तर्धान हो गया था। हे प्रियाओं! मैं तुम्हारे प्रियसाधनमें प्रवृत्त हूँ, इसलिये मेरे प्रति दोषारोपण मत करो॥१७६॥ अनुभाष्य-रासस्थलीमें पुनः प्रकट होकर श्रीकृष्णने गोपियोंके वाक्य सुनकर कहा- हे प्रियाः अबलाः, एवं (अनेन प्रकारेण) मदर्थोज्झितलोकवेदस्वानां (मदर्थं मत्प्राप्तिनिमित्तं उज्झिताः त्यक्ताः लोकाः संसार-धर्मादयः, वेदाः पारलौकिक-धर्माः स्वाः च निजसम्बन्धिपरिजनाश्च याभिः कृष्णैकप्राणाभिः तासां) वः (युष्माकं) मयि अनुवृत्तये (उक्तलक्षणानामन्येषां भक्तानामिवानुवृत्तिवृद्धयै) परोक्षम् (अदर्शनं यथा भवति तथा) भजता (उपकुर्वता) मया तिरोहितम् (अन्तर्धानेन स्थितं) हि तत् (तस्मात्) प्रियं मा (माम्) असूयितुं (दोषदृष्ट्या द्रष्टुं) मा (न) अर्हथ। श्लोक-भावानुवाद-हे प्रियाओं! हे अबलाओं! तुमलोग मेरी प्राप्तिके लिये संसारधर्म (लौकिकधर्म), वेदधर्म (पारलौकिकधर्म) और अपने सगे-सम्बन्धियों, सबका परित्यागकर मेरे पास आयी हो। मैं भी उसी प्रकारसे 'अनुवृत्तये' अर्थात् प्रेमकी वृद्धिके लिये उक्त लक्षणके अनुसार अन्यान्य भक्तोंकी भाँति परोक्ष रूपसे तुम्हारा भजन कर रहा था, अर्थात् तुम्हारा

चौथा अध्याय | २२३