भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/१७६-१८० प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये अन्तर्हित हो गया था। इसलिये मेरे प्रति दोषारोप करना तुम लोगोंके लिये उचित नहीं है॥१७६॥ शुद्धभक्तिके प्रकार-भेदसे श्रीकृष्णप्राप्तिका तारतम्य :- कृष्णेर प्रतिज्ञा एक आछे पूर्व हैते। ये यैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे॥१७७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने पहले एक प्रतिज्ञा की है कि जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसका उसी प्रकारसे भजन करता हूँ॥१७७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (४/११)— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥१७८॥ अनुवाद—हे पार्थ! जो जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी रूपसे फल देकर उनका भजन किया करता हूँ। क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे पथका अनुसरण करते हैं॥१७८॥ गोपियोंके प्रेमके ऋण-शोधनमें श्रीकृष्णकी असमर्थता :- से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल गोपीर भजने। ताहाते प्रमाण कृष्ण-श्रीमुखवचने॥१७९॥ अनुवाद—परन्तु गोपियोंके भजन अर्थात् प्रेमसे वह प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसका प्रमाण स्वयं श्रीकृष्णके मुखसे निकले वचन हैं॥१७९॥ श्रीमद्भागवत (१०/३२/२२)— न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माऽभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥१८०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन निर्मल है। अनेक जन्मोंमें भी मैं अपने सत्कार्योंके द्वारा तुम्हारे प्रति कर्त्तव्यानुष्ठान नहीं कर सकता, क्योंकि तुम लोगोंने मेरी प्राप्तिके लिये अति कठिन संसार-शृङ्खलाको सम्पूर्णरूपसे तोड़कर मेरा अन्वेषण किया है। मैं तुम लोगोंके इस ऋणका परिशोधन करनेमें सक्षम नहीं हूँ। इसलिये तुम लोग अपने साधु कार्योंके द्वारा ही परितुष्ट होओ॥१८०॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण जब राससे अन्तर्धान हो गये और गोपियाँ उनके अदर्शनसे विलाप करने लगीं। उनके विलाप-गीतको श्रवणकर श्रीकृष्ण पुनः प्रकट होकर गोपियोंको इस प्रकार कहकर सान्त्वना प्रदान करने लगे— निरवद्यसंयुजां (निरवद्या निष्कपटा संयुक् सम्यक् मिलनं यासां तासां) वः (युष्माकं) स्वसाधुकृत्यं (स्वीयम् असाधारणं यत् साधुकृत्यं साधुकर्म तत्) अहं विबुधायुषापि (विबुधानां देवानां आयुस्तत्कालमितेनापि) न पारये २२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत