भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

४।१८०-१८५ ] (शक्नोमि प्रतिदातुमित्यर्थः)। याः (भवत्यः) दुर्जरगेहशृङ्खलाः (दुर्जराः अनभिभव्याः याः गेहरूपाः शृङ्खलास्ताः) संवृश्च्य (निःशेषं छित्वा) मा (माम्) अभजन्, तासां वः (युष्माकम्) एव साधुना (साधुकृत्येन) तत् (युष्मत्साधुकृतं) प्रतियातु (प्रतिकृतं भवतु)। श्लोक-भावानुवाद—मेरे साथ तुम लोगोंका जो मिलन है, वह सर्वथा निष्कपट है। इसलिये देवताओंकी आयुकालतक भी मैं तुम लोगोंके साधुकर्मोंका प्रतिदान करनेमें समर्थ नहीं हूँ। [वे साधुकर्म किस प्रकारके हैं?]—तुम लोगोंने दुर्जर अर्थात् कठिन और ना टूटनेवाली घर-गृहस्थीकी शृङ्खलाओंको सम्पूर्ण रूपसे तोड़कर मेरा जो भजन किया है। मैं तुम लोगोंका इस प्रकार एकनिष्ठ भजन नहीं कर सकता, इसलिये तुम लोगोंके साधुकर्मोंके द्वारा ही तुम लोगोंका साधुकृत्य प्रत्युपकृत हो॥१८०॥ गोपियोंकी अपनी देहके शृङ्गारके मूलमें भी श्रीकृष्ण-सुखतात्पर्य :- तबे ये देखिये गोपीर निजदेहे प्रीत। सेहो त' कृष्णेर लागि, जानिह निश्चित॥१८१॥ 'एइ देह कैलुँ आमि कृष्णे समर्पण। ताँर धन, ताँर एइ सम्भोग-कारण॥१८२॥ ए देह-दर्शन-स्पर्शे कृष्ण-सन्तोषन।' एइ लागि' करे अङ्गेर मार्जन-भूषण॥१८३॥ अनुवाद—तब गोपियोंकी जो अपनी देहके प्रति प्रीति दिखायी देती है, तो यह निश्चित जानो कि वह श्रीकृष्णके सुखके लिये ही है। गोपियाँ सोचती हैं—'इस शरीरको मैंने कृष्णको समर्पण कर दिया है, अब यह उनका धन और उनके भोगका साधन है।' इस देहके दर्शन और स्पर्शसे श्रीकृष्णकी सन्तुष्टि हो, इसलिये वे अपने अङ्गोंका मार्जनकर उनको अलङ्कारों आदिसे सजाती हैं॥१८१-१८३॥ लघुभागवतामृत उत्तरखण्डमें (४०) आदिपुराणवचन— निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते। ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढप्रेमभाजनम्॥१८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—“गोपियाँ अपने शरीरको मेरा भोग्य माननेके कारण उसके लिये यत्न (मार्जन-शृङ्गारादि) करती हैं। हे पार्थ! उन गोपियोंसे अधिक मेरे प्रेमका पात्र और कोई नहीं है॥”१८४॥ अनुभाष्य—हे पार्थ, या गोप्यः निजाङ्ग अपि मम इति (कान्तार्पितमिदं शरीरं भगवतः इति) समुपासते (भूषणादिभिरलङ्करोति) ताभ्यः (गोपीभ्यः) परम अन्यत् मे (मम) निगूढप्रेमभाजनं (निगूढप्रेमपात्रं) नास्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८४॥ गोपियोंका सेवासुख श्रीकृष्णसुखकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक :- आर एक अद्भुत गोपीभावेर स्वभाव। बुद्धिर गोचर नहे याहार प्रभाव॥१८५॥ चौथा अध्याय | २२५