श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१८५-१९३ गोपीगण करेन यबे कृष्ण दरशन। सुखवाञ्छा नाहि, सुख हय कोटिगुण ॥ १८६ ॥ गोपिका-दर्शने कृष्णेर ये आनन्द हय। ताहा हैते कोटिगुण गोपी आस्वादय ॥ १८७ ॥ अनुवाद—गोपीभावका और एक अद्भुत स्वभाव है, जिसका प्रभाव बुद्धिसे अतीत है। गोपियाँ जब श्रीकृष्णका दर्शन करती हैं, उनको अपने सुखकी अभिलाषा नहीं रहनेपर भी उनको श्रीकृष्णसे कोटि गुणा सुख होता है। गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उससे कोटि गुणा आनन्द गोपियाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे आस्वादन करती हैं॥ १८४-१८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंमें निजसुखकी अभिलाषा नहीं है, तो भी गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णको जो सुख होता है, उसकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक सुखका आस्वादन गोपियोंको श्रीकृष्णका दर्शन करके होता है॥ १८६-१८७॥ ताँ सबार नाहि निजसुख-अनुरोध। तथापि बाड़ये सुख, पड़िल विरोध ॥ १८८ ॥ ए विरोधेर एकमात्र देखि समाधान। गोपिकार सुखे कृष्णसुख पर्यवसान ॥ १८९ ॥ पाठान्तर—गोपिकार सुख कृष्णसुखे पर्यवसान। अनुवाद—यद्यपि गोपियोंमें निजसुखकी लालसा नहीं रहती है, तो भी उनका सुख बढ़ता है। यह तो निःसन्देह विरोधाभास है, [क्योंकि सुखकी लालसा नहीं होनेसे सुखका आस्वादन कैसे हो सकता है?] इस विरोधाभासका एकमात्र जो समाधान दिखायी देता है—वह यह है कि गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखमें ही निहित है॥ १८८-१८९॥ गोपिका-दर्शने कृष्णेर बाड़े प्रफुल्लता। से माधुर्य बाड़े यार नाहिक समता ॥ १९० ॥ आमार दर्शने कृष्ण पाइल एत सुख। एइ सुखे गोपीर प्रफुल्ल अङ्गमुख ॥ १९१ ॥ अनुवाद—गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णके हृदयमें जो प्रफुल्लता होती है, उससे उनका अद्वितीय माधुर्य और बढ़ता है। 'अहो! हमारे दर्शनसे हमारे प्रिय कृष्णको इतना सुख मिला'—इसी सुखसे गोपियोंका मुखमण्डल और शरीर प्रफुल्लित हो जाता है अर्थात् उसकी शोभा और बढ़ जाती है॥ १९०-१९१॥ गोपी-शोभा देखि' कृष्णेर शोभा बाड़े यत। कृष्ण-शोभा देखि' गोपीर शोभा बाड़े तत ॥ १९२ ॥ एइमत परस्पर पड़े हुड़ाहूड़ी। परस्पर बाड़े, केह मुख नाहि मुड़ि ॥ १९३ ॥ अनुवाद—गोपियोंकी शोभाको देखकर, श्रीकृष्णकी शोभा जितनी बढ़ती है; श्रीकृष्णकी (उस २२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत