श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/१९२-१९६ ] वर्द्धित) शोभाको देखकर गोपियोंकी शोभा उतनी ही और बढ़ जाती है। इस प्रकार दोनोंकी शोभाकी आपसमें होड़ लग जाती है और दोनों बढ़ती जाती हैं। इस प्रतिस्पर्धा में कोई हार नहीं मानती॥१९२-१९३॥ श्रीकृष्णके सुखमें गोपियोंका सुख :- किन्तु कृष्णेर सुख हय गोपी-रूप-गुणे। ताँर सुखे सुखवृद्धि हये गोपीगणे॥१९४॥ श्रीकृष्णके सुखकी वृद्धिके कारण गोपीप्रेम 'काम' नहीं :- अतएव सेइ सुख कृष्ण-सुख पोषे। एइ हेतु गोपी-प्रेमे नाहि काम-दोष॥१९५॥ अनुवाद-किन्तु गोपियोंके रूप और गुणोंका आस्वादनकर श्रीकृष्णको सुख होता है और श्रीकृष्णके सुखको देखकर गोपियोंके सुखमें वृद्धि होती है। वही गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखका पोषण करता है, इसलिये गोपी-प्रेममें 'काम' का दोष नहीं है॥१९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि श्रीकृष्णके दर्शनसे गोपियोंको जो सुख होता है, उसे कोई-कोई 'काम' कहकर दोषारोपण कर सकते हैं, तो भी जब गोपियोंके मनका भाव इस प्रकार है कि 'कृष्ण-दर्शनसे हम लोग सुखी हुई हैं-इस भावको ग्रहण करनेपर कृष्णका सुख अधिक पुष्ट होगा' तब श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छा ही गोपियोंके सुखप्राप्तिका परम कारण है। इसलिये उसमें निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छारूप काम-दोष नहीं है॥१९४-१९५॥ स्तवमालामें केशवाष्टक (८)- उपेत्य पथि सुन्दरीततिभिरभिरभ्यर्थितं स्मिताङ्कुरकरम्बितैर्नटदपाङ्गभङ्गीशतैः। स्तन-स्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं व्रजे विजयिनं भजे विपिनदेशतः केशवम्॥१९६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो केशव वनसे व्रजमें आ रहे हैं, मैं उनका भजन करता हूँ। वे मृदुहास्ययुक्त व्रजसुन्दरियोंकी सैकड़ों प्रकारसे नृत्यशील भङ्गीके द्वारा मार्गमें अर्चित हो रहे हैं। भ्रमरके समान उनके नेत्र-कटाक्ष उन गोपियोंके स्तनस्तबकके (स्तनोंको पुष्पोंका गुच्छा मानकर उनके) चारों ओर मँडरा रहे हैं॥१९६॥ अनुभाष्य-आभिः सुन्दरीततिभिः (व्रजविलासिनीश्रेणीभिः) उपेत्य (अट्टालिकामारुह्य) पथि (मार्गे) स्मिताङ्कुरकरम्बितैः (मन्दहास्याङ्कुरं तेन करम्बिताः युक्तास्तैः) नटदपाङ्गभङ्गीशतैः (नटत् अपाङ्गं नयनकटाक्षं यस्य तस्य भङ्गीशतानि तैः) अभ्यर्थितं (सर्वतोभावेन पूजितं) स्तनस्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं (स्तनस्तबकाः गुच्छाः इव तेषु सञ्चरत् नयनयोः चञ्चरीकयोः भृङ्गयोः इव अञ्चलं प्रान्तभागः यस्य सः तं) विपिनदेशतः (अपराह्ने गोचारणात्) व्रजे (नन्दीश्वरे) विजयिनं केशवं (कृष्णं) भजे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ चौथा अध्याय | २२७