श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
४/१९२-१९६ ] वर्द्धित) शोभाको देखकर गोपियोंकी शोभा उतनी ही और बढ़ जाती है। इस प्रकार दोनोंकी शोभाकी आपसमें होड़ लग जाती है और दोनों बढ़ती जाती हैं। इस प्रतिस्पर्धा में कोई हार नहीं मानती॥१९२-१९३॥ श्रीकृष्णके सुखमें गोपियोंका सुख :- किन्तु कृष्णेर सुख हय गोपी-रूप-गुणे। ताँर सुखे सुखवृद्धि हये गोपीगणे॥१९४॥ श्रीकृष्णके सुखकी वृद्धिके कारण गोपीप्रेम 'काम' नहीं :- अतएव सेइ सुख कृष्ण-सुख पोषे। एइ हेतु गोपी-प्रेमे नाहि काम-दोष॥१९५॥ अनुवाद-किन्तु गोपियोंके रूप और गुणोंका आस्वादनकर श्रीकृष्णको सुख होता है और श्रीकृष्णके सुखको देखकर गोपियोंके सुखमें वृद्धि होती है। वही गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखका पोषण करता है, इसलिये गोपी-प्रेममें 'काम' का दोष नहीं है॥१९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि श्रीकृष्णके दर्शनसे गोपियोंको जो सुख होता है, उसे कोई-कोई 'काम' कहकर दोषारोपण कर सकते हैं, तो भी जब गोपियोंके मनका भाव इस प्रकार है कि 'कृष्ण-दर्शनसे हम लोग सुखी हुई हैं-इस भावको ग्रहण करनेपर कृष्णका सुख अधिक पुष्ट होगा' तब श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छा ही गोपियोंके सुखप्राप्तिका परम कारण है। इसलिये उसमें निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छारूप काम-दोष नहीं है॥१९४-१९५॥ स्तवमालामें केशवाष्टक (८)- उपेत्य पथि सुन्दरीततिभिरभिरभ्यर्थितं स्मिताङ्कुरकरम्बितैर्नटदपाङ्गभङ्गीशतैः। स्तन-स्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं व्रजे विजयिनं भजे विपिनदेशतः केशवम्॥१९६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो केशव वनसे व्रजमें आ रहे हैं, मैं उनका भजन करता हूँ। वे मृदुहास्ययुक्त व्रजसुन्दरियोंकी सैकड़ों प्रकारसे नृत्यशील भङ्गीके द्वारा मार्गमें अर्चित हो रहे हैं। भ्रमरके समान उनके नेत्र-कटाक्ष उन गोपियोंके स्तनस्तबकके (स्तनोंको पुष्पोंका गुच्छा मानकर उनके) चारों ओर मँडरा रहे हैं॥१९६॥ अनुभाष्य-आभिः सुन्दरीततिभिः (व्रजविलासिनीश्रेणीभिः) उपेत्य (अट्टालिकामारुह्य) पथि (मार्गे) स्मिताङ्कुरकरम्बितैः (मन्दहास्याङ्कुरं तेन करम्बिताः युक्तास्तैः) नटदपाङ्गभङ्गीशतैः (नटत् अपाङ्गं नयनकटाक्षं यस्य तस्य भङ्गीशतानि तैः) अभ्यर्थितं (सर्वतोभावेन पूजितं) स्तनस्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं (स्तनस्तबकाः गुच्छाः इव तेषु सञ्चरत् नयनयोः चञ्चरीकयोः भृङ्गयोः इव अञ्चलं प्रान्तभागः यस्य सः तं) विपिनदेशतः (अपराह्ने गोचारणात्) व्रजे (नन्दीश्वरे) विजयिनं केशवं (कृष्णं) भजे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ चौथा अध्याय | २२७
[ ४/१९७-२०२ गोपीप्रेमके स्वाभाविक लक्षण :- आर एक गोपीप्रेमेर स्वाभाविक चिह्न। ये-प्रकारे हय प्रेम काम-गन्ध-हीन॥१९७॥ गोपीप्रेमे करे कृष्णमाधुर्य्येर पुष्टि। माधुर्य बाड़ाय प्रेम हञा महातुष्टि॥१९८॥ सेव्य 'विषय'की प्रीतिमें ही सेवक 'आश्रय'की शुद्धप्रीति :- प्रीतिविषयानन्दे तदाश्रयानन्द। ताँहा नाहि निजसुखवाञ्छार सम्बन्ध॥१९९॥ निरुपाधि प्रेम याँहा, ताँहा एइ रीति। प्रीतिविषयसुखे आश्रयेर प्रीति॥२००॥ अनुवाद-गोपीप्रेमका एक और प्रकारका स्वाभाविक लक्षण है जो दिखलाता है कि उसमें कामकी गन्ध भी नहीं है। गोपियोंका प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्यकी पुष्टि करता है और वही वर्धित माधुर्य उनके प्रेमको बढ़ाता है; इस प्रकार वे परम सन्तुष्ट होती हैं। जो प्रेमके विषय हैं, उनके आनन्दमें ही प्रेमके आश्रयका आनन्द निहित होता है। इसलिये इसमें निजसुख लालसाका कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँ निरुपाधिक प्रेम है, वहाँ यही रीति है। प्रेमके विषयके सुखसे ही आश्रयको सुख मिलता है॥१९७-२००॥ श्रीकृष्णसेवाकालमें निजेन्द्रियप्रीतिके प्रति घृणा और दूरसे ही परित्यज्य :- निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे। से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महाक्रोधे॥२०१॥ अनुवाद-जब प्रेममें अपने आनन्दसे श्रीकृष्णके सेवानन्दमें बाधा उत्पन्न होती है, तो उस निज आनन्दके प्रति भक्तको अत्यधिक क्रोध होता है॥२०१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रीतिके विषय श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उसीसे ही प्रीतिकी आश्रय गोपियोंको आनन्द होता है। इस प्रकार आनन्दसमृद्धिसे गोपियोंका अपनी सुख-अभिलाषासे कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँपर निरुपाधिक प्रेम होता है, वहाँपर यही रीति दिखलायी देती है अर्थात् प्रीतिके विषयके सुखमें ही प्रीतिके आश्रयका सुख निहित होता है। तो भी एक बात कही जा सकती है, जहाँ अपना प्रेमानन्द होता है, वहाँ श्रीकृष्णसेवानन्दमें बाधा अवश्य ही होगी। इसलिये जब सेवानन्दके बाधकरूप आनन्दका उदय होता है, तब भक्तके अन्दर महाक्रोध उपस्थित होता है॥१९९-२०१॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (३/२/६२)- अङ्गस्तम्भारम्भमुत्तुङ्गयन्तं प्रेमानन्दं दारुको नाभ्यनन्दत्। कंसारातेर्बीजने येन साक्षादक्षोदीयानन्तरायो व्यधायि॥२०२॥ अनुवाद-अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥२०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णको चामर ढुलानेके समय प्रेमानन्दसे उत्पन्न शरीरकी जड़ताको सेवामें बाधा जानकर दारुकने उसका अभिनन्दन नहीं किया॥२०२॥ २२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२०२-२०६ ]
अनुभाष्य-येन (प्रेमानन्देन) कंसारातेः (कृष्णस्य) बीजने (चामरसेवने) साक्षात् अक्षोदीयान् (महान्) अन्तरायः (बाधकः) व्यधायि, दारुकः (श्रीकृष्णस्य सारथिः) अङ्गस्तम्भारम्भम् (अङ्गानां स्तम्भारम्भं जड़ीभावम्) उत्तुङ्गयन्तं (प्रापयन्तं) तं प्रेमानन्दं (निजानुभवार्हानन्दं) नाभ्यनन्दत् (आनुकूल्यकरत्वे नैव अभिलषितवान्)। श्लोक-भावानुवाद-जब श्रीकृष्णके सारथी दारुक श्रीकृष्णको चामर झुला रहे थे, उस समय प्रेमानन्दसे उनके सारे अङ्गोंमें जड़ता उपस्थित हुई, किन्तु दारुकने इस प्रेमानन्दको साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें अवरोध मानकर उसका अभिनन्दन नहीं किया अर्थात् उसकी अभिलाषा नहीं की॥२०२॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (२/३/५४)- गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणम्। उच्चैरनिन्ददानन्दमरविन्दविलोचना॥२०३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कमलनयना श्रीकृष्णभामिनीने श्रीकृष्णदर्शनके बाधास्वरूप नेत्रोंसे जलका वर्षण करनेवाले आनन्दकी अतिशय निन्दा की॥२०३॥ अनुभाष्य-अरविन्दविलोचना (कमलनेत्रा राधिका) गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणं (गोविन्दस्य प्रेक्षणं तस्य आक्षेपी बाधको यो वाष्पपूराश्रुवृन्दं तम् अभिवर्षितुं स्वभावो यस्य तम्) आनन्दम् उच्चैः (अतिशयेन) अनिन्दत् (निनिन्द)। श्लोक-भावानुवाद-कमलनयना श्रीमती राधिकाने गोविन्दके दर्शनमें बाधक आनन्द जिसका स्वभाव नेत्रोंसे अश्रुवर्षण कराना है, उसकी अत्यधिक निन्दा की॥२०३॥ शुद्धभक्तकी श्रीकृष्णभक्ति बिना मुक्तिसे भी घृणा :- आर शुद्धभक्त कृष्ण-प्रेम-सेवा-बिने। स्वसुखार्थ सालोक्यादि ना करे ग्रहणे॥२०४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-और भी देखो, श्रीकृष्ण-प्रेमसेवाके बिना अपने सुखके लिये शुद्धभक्त सालोक्यादि मुक्तिको भी कभी ग्रहण नहीं करते॥२०४॥ श्रीकृष्णमें अहैतुकी और अप्रतिहता भक्ति ही निर्गुणा :- श्रीमद्भागवत (३/२९/११-१२)- मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥२०५॥ लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥२०६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०५-२०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी
चौथा अध्याय | २२९
[ ४/२०५-२०८ अर्थात् अकारण या स्वतःसिद्धा और अव्यवहिता अर्थात् बिना किसी व्यवधानके अथवा अन्य किसी फलकी आकाङ्क्षासे रहित है॥२०५-२०६॥ अनुभाष्य—श्रीकपिलदेवने माता देवहूतिसे कहा— मद्गुणश्रुतिमात्रेण (मम गुणश्रवणमात्रेण) सर्वगुहाशये (सर्वान्तःकरणवर्त्तिनि) मयि, अम्बुधौ (समुद्रे) गङ्गाम्भसः यथा, [तथा] अविच्छिन्ना (अप्रतिरुद्धा, विषयान्तरेण छेत्तुमशक्या या) मनोगतिः, पुरुषोत्तमे या अहैतुकी (फलानुसन्धानरहिता) अव्यवहिता (देहद्रविणजनतालोभपाषण्डत्वादि-व्यवधान-विवर्जिता) भक्तिः, सा निर्गुणस्य (त्रिगुणातीतस्य भगवतः) भक्तियोगस्य लक्षणम् उदाहृतं (कथितं) हि। श्लोक-भावानुवाद—मेरे गुणोंको श्रवण करनेमात्रसे सबके अन्तःकरणमें मुझ अन्तर्यामीमें समुद्रकी ओर बहते गङ्गाके प्रवाहके समान बिना किसी अवरोधके (विषयान्तर करनेमें अक्षम) फलाकाङ्क्षारहित, (देह-धन-जनके लोभ और पाखण्डादि) व्यवधानसे रहित मनकी गतिको ही त्रिगुणातीत भगवत्-भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥२०५-२०६॥ श्रीमद्भागवत (३/२९/१३)— सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः॥२०७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है॥२०७॥ अनुभाष्य—जनाः (हरिजनाः) मत्सेवनं बिना (मद्भजनं त्यक्त्वा) दीयमानं सालोक्यं (मया सह एकस्मिन् लोके वासं) सार्ष्टिं (समानमैश्वर्यं) सामीप्यं (निकटवर्त्तित्वं) सारूप्यं (समानरूपताम्) एकत्वम् उत (सायुज्यमपि) न गृह्णन्ति (नाभिनन्दन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०७॥ नश्वर भोग तो दूर रहे, भक्त मोक्षकी भी कामना नहीं करते :- श्रीमद्भागवत (९/४/६७)— मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम्। नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम्॥२०८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी सेवासे ही परिपूर्ण-हृदयवाले शुद्धभक्त मेरी सेवाके द्वारा सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ स्वयं आनेपर भी जब उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, तब मायिक (स्वर्गादि) भोग और सायुज्य मुक्ति, जो कालके द्वारा अति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, उनकी इच्छा वे क्यों करेंगे? सायुज्यमुक्तिके द्वारा जीवकी सत्ता कालका ग्रास बन जाती है, इसलिये भुक्ति और सायुज्य-मुक्ति, ये स्थायी नहीं हैं॥२०८॥ अनुभाष्य—अम्बरीष जैसे भक्तोंके गुणोंका वर्णन करते हुए श्रीभगवान्ने दुर्वासासे कहा— २३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२०८-२१२ ] सेवया पूर्णाः ते (भक्ताः) मत्सेवया प्रतीतं (प्राप्तम् अपि) सालोक्यादिचतुष्टयं न इच्छन्ति (नाभिलषन्ति), अन्यत् (स्वर्गादिकं) कालविप्लुतं (काले नाशयोग्यं) कुतः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०८॥ गोपीप्रेमका वर्णन :- कामगन्धहीन स्वाभाविक गोपी-प्रेम। निर्मल, उज्ज्वल, शुद्ध येन दग्ध हेम॥२०९॥ श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका सम्पर्क :- कृष्णेर सहाय, गुरु, बान्धवी, प्रेयसी। गोपिका हयेन प्रिया शिष्या, सखी, दासी॥२१०॥ गोपिका जानेन कृष्णेर मनेर वाञ्छित। प्रेमसेवा परिपाटी, इष्ट-समीहित॥२११॥ अनुवाद-गोपियोंका प्रेम स्वाभाविक है जिसमें कामकी गन्ध तक भी नहीं है। वह प्रेम अग्निसे तपाये हुए (दोषरहित) स्वर्णकी भाँति निर्मल, उज्ज्वल और शुद्ध है। गोपियाँ श्रीकृष्णकी सहायिका, गुरु, बान्धवी, प्रेयसी, प्रिय शिष्या, सखी और दासी हैं। गोपियाँ श्रीकृष्णकी सभी मनोवाञ्छाओंको जानती हैं और उन्हें पूर्ण करनेके लिये उनकी प्रेममयी सेवाकी रीति भी जानती हैं। श्रीकृष्णकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेके लिये ही उनकी सभी चेष्टाएँ होती हैं॥२०९-२११॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘इष्ट-समीहित’ अर्थात् अभिलषित चेष्टा॥२११॥ श्रीकृष्णका अपने साथ गोपियोंका सम्बन्ध-वर्णन :- आदिपुराणवचन- सहाया गुरवः शिष्या भुजिष्या बान्धवाः स्त्रियः। सत्यं वदामि ते पार्थ गोप्यः किं मे भवन्ति न॥२१२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१२॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा- “हे पार्थ! गोपियाँ मेरी सर्वस्व हैं- वे मेरी सहायिका अर्थात् प्रिया हैं, मुझे गुरुके समान स्नेह करती हैं, शिष्याके समान मेरी सेवा करती हैं, मेरी उपभोग्या जैसी दासी हैं, बन्धुके समान प्रेम आचरण करनेवाली हैं और विवाहिता स्त्रीके समान व्यवहार करती हैं।”२१२॥ अनुभाष्य- हे पार्थ ! ते (तुभ्यम्) अहं सत्यं (स-शपथं निश्चितं) वदामि- मे (मम) सहायाः (रासक्रीड़ादौ सहायाः) गुरवः (प्रेमशिक्षादौ उपदेष्टारः) शिष्याः (मदाज्ञापालनपराः) भुजिष्याः (दासीवत् मत्सेवापराः) बान्धवाः (बन्धुवत् प्रीत्याचरणशीलाः) स्त्रियः (स्वपत्नीवत् भोग्याः)-[अतः] गोप्यो मे किं न भवन्ति? [अपि तु मत्सर्वस्वा एवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद- हे पार्थ! तुम्हें मैं शपथके साथ निश्चित रूपसे कह रहा हूँ मेरी रासक्रीड़ादिमें सहायिका, प्रेमकी शिक्षा देनेवाली गुरु, मेरी आज्ञाका पालन करनेवाली शिष्या, चौथा अध्याय | २३१
[ ४/२१२-२१६ दासीके समान सेवा करनेवाली, बन्धुके समान प्रीति-आचरणशील और विवाहिता पत्नीके समान भोग्या, गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं? [वे मेरी सर्वस्व हैं, यह अर्थ है] ॥ २१२ ॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्डमें (३९) आदिपुराणवचन :- मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्र जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः॥ २१३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा माहात्म्य, मेरी सेवा, मेरे प्रति श्रद्धा, मेरे मनके भाव केवल गोपियाँ ही जानतीं हैं। हे पार्थ! स्वरूपसे इन सबको और कोई नहीं जानता है॥ २१३॥ अनुभाष्य-हे पार्थ! गोपिकाः मन्माहात्म्यं (मम महिमानं) मत्सपर्यां (मम सेवां) मच्छ्रद्धां (मम स्पृहनीयं) मन्मनोगतं (मम मनोऽभिप्रायं) तत्त्वतः (स्वरूपतः) जानन्ति, [अन्ये] भक्ताः न जानन्ति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥ गोपियोंमें श्रीराधिका ही सर्वश्रेष्ठा :- सेइ गोपीगण-मध्ये उत्तमा राधिका। रूपे, गुणे, सौभाग्ये, प्रेमे सर्वाधिका ॥ २१४॥ अनुवाद-उन गोपियोंमें राधिका ही सबसे श्रेष्ठा हैं। रूप, गुण, सौभाग्य और प्रेममें भी वे सबसे अधिक हैं॥२१४॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४५) पद्मपुराणवचन :- यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ २१५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥ २१५॥ अनुभाष्य-विष्णोः (कृष्णस्य) राधा यथा प्रिया, तस्याः (राधायाः) कुण्डं तथा प्रियम्। सर्वगोपीषु सा (श्रीराधिका) एका एव विष्णोः अत्यन्तवल्लभाः (परा प्रियतमा)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४६) आदिपुराणवचन :- त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या यत्र वृन्दावनं पुरी। तत्रापि गोपिकाः पार्थ यत्र राधाभिधा मम ॥ २१६ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पृथ्वीपर वृन्दावनधामके अवतीर्ण होनेपर पृथ्वी तीनों लोकोंमें धन्य हुई है। उसमें भी गोपियाँ धन्य हैं, क्योंकि उनमें मेरी अत्यन्त प्रिय 'राधा' नामक गोपी विद्यमान है॥ २१६॥ अनुभाष्य-हे पार्थ! त्रैलोक्ये (भूर्भुवःस्वर्लोकत्रयमध्ये) पृथिवी धन्या, यत्र (पृथिव्यां) वृन्दावनं [नाम] पुरी [अस्ति]। तत्र (वृन्दावने) अपि गोपिकाः धन्याः, यत्र मम राधाभिधा [गोपीवर्त्तते]। २३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२१६-२१९ ] श्लोक-भावानुवाद-भू (पृथ्वी), भुवः और स्वर्ग, इन तीन लोकोंमें पृथ्वी धन्य है, जिसपर वृन्दावन नामक पुरी है। वृन्दावनमें भी गोपियाँ धन्य हैं, जिनमें मेरी राधा नामक गोपी विद्यमान है॥ २१६॥ मधुररसमें श्रीराधाके साथ ही मूल विलास, अन्य सब वस्तुएँ उसके उपकरण :- राधासह क्रीड़ा रस-वृद्धिर कारण। आर सब गोपीगण रसोपकरण॥ २१७॥ अनुवाद-श्रीराधाके साथ क्रीड़ा श्रीकृष्णके रसास्वादनकी वृद्धिका कारण है। अन्य सभी गोपियाँ उस रसकी वृद्धिकी उपकरण स्वरूप अर्थात् सहायिका हैं॥ २१७॥ अनुभाष्य-श्रीराधिका ही श्रीकृष्णकी सर्वस्व हैं। अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णकी श्रीराधाके साथ क्रीड़ारसकी वृद्धिके उद्देश्यसे रसकी उपकरणमात्र हैं। “समन्तान्माधवाकर्षिविभ्रमाः सन्ति सुभ्रुवः। तास्तु वृन्दावनेश्वर्याः सख्यः पञ्चविधा मताः॥ सख्यश्च नित्यसख्यश्च प्राणसख्यश्च काश्चन। प्रियसख्यश्च परमप्रेष्ठसख्यश्च विश्रुताः ॥ ××× आसां सुष्ठु द्वयोरेव प्रेम्णः परमकाष्ठया। क्वचिज्जातु क्वचिज्जातु तदाधिक्यमिवेक्ष्यते ॥ ××प्रेमलीलाविहाराणं सम्यग्विस्तारिका सखी ॥” काम-भावोंको उद्दीप्त करनेकी चेष्टाके द्वारा श्रीकृष्णको सभी प्रकारसे आकर्षित करनेमें समर्था उज्ज्वल वर्णवाली श्रीवृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधिकाकी पाँच प्रकारकी सखियाँ हैं। जैसे-सखी, नित्यसखी, प्राणसखी, प्रियसखी और परमप्रेष्ठसखी। परमप्रेष्ठ सखियाँ आठ हैं और इनमें प्रेमकी पराकाष्ठा होनेसे ये कभी राधाजीके मान करनेपर श्रीकृष्णका और कभी खण्डितावस्थामें श्रीराधाका पक्ष लेते हुए एकके प्रति अनुराग और दूसरेके प्रति विपक्ष भाव प्रदर्शन करते हुए रसकी वृद्धि करती हैं॥ २१७॥ कृष्णेर वल्लभा राधा, कृष्ण-प्राणधन। ताँहा बिनु सुखहेतु नहे गोपीगण॥ २१८॥ अनुवाद-श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी सर्वाधिक प्रिया तथा प्राणधन हैं, उनके बिना अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णके सुखका कारण नहीं हो सकती॥ २१८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिकाके बिना अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णके सुखका कारण नहीं हो सकतीं ॥ २१८॥ श्रीगीतगोविन्द (३/१)- कंसारिरपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलाम्। राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ २१९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कंसारि (कंसके शत्रु) श्रीकृष्ण सम्पूर्णसाररूपी रासलीला-वासनाकी शृङ्खला श्रीराधाको हृदयमें धारणकर अन्यान्य व्रजसुन्दरीयोंको त्यागकर चले गये॥ २१९॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके रासस्थलीको त्यागकर रासकी मूल-आश्रय श्रीराधाके पीछे जानेपर श्रीजयदेवका वाक्य- चौथा अध्याय | २३३
[ ४/२१९-२२३ कंसारिः (श्रीकृष्णः) अपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलां (सम्यक् सारभूता रासलीला-वासना तया आबद्धा बन्धनं दृढ़ीकरणाय संयुक्ता शृङ्खला निगड़रूपा तां रासक्रीड़ा-परमाश्रयां) राधां हृदये आधाय (आ-सम्यक् प्रकारेण धृत्वा) व्रजसुन्दरीः (सर्वाः गोपवधूः) तत्याज। श्लोक-भावानुवाद-कंसारि (श्रीकृष्ण) ने सम्पूर्ण साररूप रासलीलाकी वासनाके बन्धनको दृढ़ करनेवाली शृङ्खलारूपी रासक्रीड़ाकी परमाश्रया श्रीराधाको हृदयमें पूर्णरूपसे धारण करके अन्य सभी गोपियोंको त्याग दिया॥२१९॥ अमृतानुकणिका-श्रीराधा जब रासमण्डली छोड़कर चली गयीं, तब अन्य सभी गोपियाँ रासमण्डलमें थीं, तथापि रासलीलाभिलाषी श्रीकृष्ण उन सबको छोड़कर केवल राधाजीका अन्वेषण करने लगे। इसके द्वारा यह समझा जाता है कि श्रीराधाके बिना शत-कोटि गोपियोंके द्वारा रासलीला सम्पन्न नहीं हो सकती, अन्यथा श्रीकृष्ण इन गोपियोंको लेकर रासलीला करते। श्रीराधाके बिना अन्य समस्त गोपियाँ भी स्वतन्त्रभावसे श्रीकृष्णके सुखका विधान नहीं कर सकतीं, इसका ही प्रमाण यह श्लोक है। इससे ही समस्त गोपियोंमें श्रीराधाका सर्वश्रेष्ठत्व प्रमाणित हुआ है॥२१९॥ मुख्यरूपसे राधाभावसे ही तीनों वाञ्छाओंकी पूर्ति, गौणरूपमें नामप्रेम प्रचार :- सेइ राधाभाव लञा चैतन्यावतार। युगधर्म नाम-प्रेम कैल परचार॥२२०॥ सेइभावे निजवाञ्छा करिल पूरण। अवतारेर एइ वाञ्छा मूल-कारण॥२२१॥ अनुवाद-उसी राधा-भावको लेकर ही चैतन्यावतार हुआ है। अवतीर्ण होकर उन्होंने युगधर्म नाम-सङ्कीर्तन और उसके द्वारा श्रीकृष्ण-प्रेमका प्रचार भी किया। उस राधा-भावको लेकर श्रीकृष्णने अपनी उपरोक्त तीन इच्छाओंको पूर्ण किया। ये तीन इच्छाएँ ही उनके अवतारकी मूल कारण है॥२२०-२२१॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी सर्वस्व, प्रीतिकी आश्रयस्वरूपा, सर्वोत्तम श्रीमती गान्धर्विका (राधिका) का भाव अर्थात् उनकी ऐकान्तिकी श्रीकृष्णसेवापरायण चित्तवृत्ति ही 'सेइ राधाभाव' (उसी राधाभाव) का तात्पर्य है॥२२०॥ सम्भोगरस-विग्रह श्रीनन्दनन्दन ही विप्रलम्भरस-विग्रह श्रीगौर :- श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि व्रजेन्द्रकुमार। रसमय-मूर्ति कृष्ण साक्षात् शृङ्गार॥२२२॥ सेइ रस आस्वादिते कैल अवतार। आनुषङ्गे कैल सब रसेर प्रचार॥२२३॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य ही रसमय मूर्ति व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्ण हैं, जो साक्षात् शृङ्गाररस हैं। उसी शृङ्गाररसका आस्वादन करनेके लिये उन्होंने अवतार ग्रहण किया और आनुषङ्गिक रूपसे दूसरे रसोंका भी प्रचार किया॥२२१-२२३॥ २३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२२४-२२७ ] व्रजललनाओंके साथ श्रीकृष्णका नित्य विलास :- श्रीगीतगोविन्द (१/११)- विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामलकोमलैरूपनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥ २२४॥ अनुवाद-हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलास-रसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गार रसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा है, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं। परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गको सम्यक् और स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गित कर रही हैं॥ २२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि ! शृङ्गारस्वरूप श्रीकृष्ण अपने अङ्गसौन्दर्यके द्वारा जगत्में आनन्द उत्पन्न कराकर और इन्दीवरके (नीलकमलके) सदृश सुन्दर, कोमल हस्त-चरणादिके द्वारा व्रजाङ्गनाओंके हृदयमें कन्दर्पोत्सव उदय करते हुए व्रजसुन्दरियोंके द्वारा स्वच्छन्दतापूर्वक आलिङ्गित होकर वसन्तकालमें क्रीड़ा कर रहे हैं॥ २२४॥ अनुभाष्य-हे सखि ! अनुरञ्जनेन (प्रीणनेन) विश्वेषां (सर्वासां गोपरामाणां) आनन्दं जनयन्, इन्दीवरश्रेणी-श्यामलकोमलैः (हरिद्वर्णविविध-सुकुमार-नीलपद्मप्रतिमैः) अङ्गैः अनङ्गोत्सवं उपनयन् (प्रापयन्) स्वच्छन्दम् (असङ्कोचं यथा स्यात् तथा) अभितः व्रजसुन्दरीभिः प्रत्यङ्गं आलिङ्गितः मुग्धः हरिः मधौ (वसन्तसमये) मूर्त्तिमान् शृङ्गारः इव क्रीड़ति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २२४॥ गौरावतारमें रसनिधान श्रीकृष्णका नाना प्रकारसे गोपीप्रेम-रसास्वादन :- श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि रसेर सदन। अशेष-विशेष कैल रस आस्वादन ॥ २२५ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु रसका भण्डार हैं, उन्होंने सभी प्रकारसे रसका आस्वादन किया॥ २२५॥ चैतन्यदास ही चित्-शक्तिके आश्रयमें श्रीगौरावतार-रहस्यके ज्ञाता :- सेइ द्वारे प्रवर्त्ताइल कलियुग-धर्म। चैतन्येर दासे जाने एइ सब मर्म॥ २२६॥ अनुवाद-उसके द्वारा महाप्रभुने कलियुगके धर्मकी भी स्थापना की। इस रहस्यको केवल उनके भक्त ही जानते हैं॥ २२६ ॥ गौरपार्षद और गौरभक्त-वन्दना :- अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, श्रीनिवास। गदाधर, दामोदर, मुरारि, हरिदास ॥ २२७ ॥ चौथा अध्याय | २३५
[ ४/२२७-२३१ आर यत चैतन्य-कृष्णेर भक्तगण। भक्तिभावे शिरे धरि सबार चरण ॥ २२८ ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीनिवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूपदामोदर, मुरारिगुप्त प्रभु, श्रील हरिदास ठाकुर और जितने भी महाप्रभुके भक्त हैं, भक्तिभावसे उनके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण करता हूँ॥२२७-२२८॥ अब तक छठे श्लोककी भूमिका वर्णन; अब विस्तृत व्याख्या :- षष्ठश्लोकेर एइ कहिल आभास। मूल श्लोकेर अर्थ शुन, करिये प्रकाश ॥ २२९ ॥ अनुवाद-छठे श्लोकके अर्थकी मैंने भूमिका बतलायी थी, अब श्लोकके मूल अर्थको प्रकाश कर रहा हूँ॥२२९॥ श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चा- श्रीराधायाः प्रणयमहिमा कीदृशो वानयैवा- स्वाद्यो येनाद्भुतमधुरिमा कीदृशो वा मदीयः। सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभा- तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः ॥२३०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥२३०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाकी प्रणयमहिमा कैसी है? मेरी अद्भुत मधुरिमा-जिसको श्रीराधा आस्वादन करती है-वह कैसी है? मेरी मधुरिमाकी अनुभूतिसे श्रीराधाके हृदयमें कैसा सुख उदय होता है? इन तीन विषयोंके प्रति लोभ उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णरूप चन्द्रने शचीगर्भरूप समुद्रसे जन्मग्रहण किया॥२३०॥ अनुभाष्य-श्रीराधायाः (वार्षभानव्याः) प्रणयमहिमा (प्रणयमाहात्म्यः) वा कीदृशः, अनया (राधया) मदीयः अद्भुतमधुरिमा (अपूर्वमाधुर्यातिशयः) येन (प्रणयेन) कीदृशः वा आस्वाद्यः, मदनुभवतः (मदनुभवात्) अस्याः (श्रीराधायाः) सौख्यं कीदृशं वा-इति लोभात् तद्भावाढ्यः (तस्याः भावेन आढ्याः समन्वितः सन्) शचीगर्भसिन्धौ (शच्याः मातुः गर्भसमुद्रे) हरीन्दुः (कृष्णचन्द्रः) समजनि (प्रादुरासीत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२३०॥ गूढ़ होनेपर भी रसिक भक्तोंके लिये वर्णन :- ए सब सिद्धान्त गूढ़,-कहिते ना यूयाय। ना कहिले, केह इहार अन्त नाहि पाय ॥ २३१ ॥ अनुवाद-अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥२३१॥ अनुभाष्य-श्रीगौरावतारका यही गूढ़ सिद्धान्त है-श्रीकृष्णकी हृदयगत वासनाको जगत्में प्रकाशित करना यद्यपि योग्य नहीं है, अथवा जगत्के श्रोताओंके अधिकारोचित नहीं है, तथापि यह कथा प्रकाशित ना होनेपर जीव अपनी चेष्टासे इसकी सीमाकी उपलब्धि नहीं कर पायेंगे अर्थात् उसकी पूर्ण महिमाको नहीं जान पायेंगे ॥ २३१॥ २३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२३२-२३५ ]
अतएव कहि किछु करिया निगूढ़। बुझिबे रसिक भक्त, ना बुझिबे मूढ़॥२३२॥ अनुवाद—इसलिये मैं इसका वर्णन कुछ रहस्यमय ढंगसे करूँगा जिसे रसिक भक्त तो समझेंगे, किन्तु मूर्ख व्यक्ति समझ नहीं पायेंगे॥२३२॥ श्रीगुरु-गौराङ्ग-दासका ही रससिद्धान्तमें अधिकार :- हृदये धरये ये चैतन्य-नित्यानन्द। एसब सिद्धान्ते सेइ पाइबे आनन्द॥२३३॥ ए सब सिद्धान्त हय आम्रेर पल्लव। भक्तगण-कोकिलेर सर्वदा वल्लभ॥२३४॥ अनुवाद—जिन्होंने अपने हृदयमें चैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको धारण किया है, वे लोग ही ये सब सिद्धान्त समझकर हृदयमें आनन्दकी उपलब्धि करेंगे। ये सब सिद्धान्त अत्यन्त कोमल आमके पत्तोंकी भाँति हैं, जो भक्तरूपी कोयलको प्रिय है॥२३३-२३४॥ ग्रन्थकारको अभक्तोंकी दुर्बुद्धिका भय, परन्तु उनकी अज्ञतासे सुख :- अभक्त-उष्ट्र तबे चित्ते हय मोर आनन्द-विशेष॥२३५॥ अनुवाद—यदि अभक्तरूपी ऊँट इसमें प्रवेश नहीं करें, तो मेरे हृदयमें विशेष आनन्द होगा। [क्योंकि कँटीली झाड़ियोंको खानेपर ऊँटकी जीभ कट जाती है और उससे रक्त निकलता है। वह रक्त उसे बहुत स्वादिष्ट लगता है, परन्तु वह सोचता है कि यह स्वाद कँटीली झाड़ीका है। इसलिये उसकी रुचि काँटोंमें है, कोमल आम्र पल्लवोंमें नहीं]॥२३५॥ अनुभाष्य—यह सब कथा गौर-नित्यानन्दके भक्तोंके ही आनन्दका विधान करती है। गौरभक्त कोयलकी भाँति हैं और सिद्धान्त आम्रपल्लवस्वरूप हैं। कोयलकी जिस प्रकार आम्रपल्लवमें विशेष प्रीति है, वैसे ही भक्त लोग इन सिद्धान्तोंमें परमानन्द प्राप्त करते हैं। पक्षान्तरमें, ऊँट जिस प्रकार काँटोंके द्वारा अपनी जिह्वाको क्षत-विक्षत ना करवाकर आम्रपल्लवादि खानेकी इच्छा नहीं करता है, उस प्रकार अभक्त ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषी मिथ्याभक्तरूपी ऊँट इन सब सिद्धान्तोंमें कुतर्क करते हैं॥२३४-२३५॥ अमृतानुकणिका—श्रीमन्महाप्रभुने कहा—“अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत गोचर।” किन्तु श्रीकृष्णमें भोगबुद्धिवाले व्यक्तियोंका यह स्वभाव यह है कि वे अप्राकृत वस्तुको प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा मापने या भोग करनेकी चेष्टा करते हैं। अप्राकृत वस्तुको प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण करनेकी चेष्टाको ही सात्वतजन ‘श्रीकृष्णमें भोगबुद्धि' कहते हैं। अप्राकृत वस्तुमें प्राकृत इन्द्रियोंका प्रवेशाधिकार नहीं है—यह बात प्राकृत व्यक्तियोंके मस्तिष्कमें कुछ भी प्रवेश नहीं करती। वे सोचते हैं, जब हम नेत्रों, कानों, जिह्वा, त्वचा या मनके द्वारा सब कुछ जान सकते हैं, तब अप्राकृत वस्तु नामक और क्या हो सकता है? किन्तु अप्राकृतरसके रसिकजनोंका कहना है—अप्राकृत तत्त्वमें या सिद्धान्तमें अभक्त, ज्ञानी, कर्मी, अन्याभिलाषी या मिथ्याभक्तोंका प्रवेशाधिकार नहीं है। श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थमें श्रीरूप गोस्वामीने इसे स्पष्ट रूपमें कहा है—
चौथा अध्याय | २३७
[ ४/२३५-२३६ अप्राकृत कामदेव मन्मथमन्मथ भगवान्की मधुर लीलाकथा आजकल एक खेलकी वस्तु हो गयी है, लोगोंकी विलासिताकी वस्तुरूपमें परिणत हो गयी है। आचार्यवर श्रील सनातन गोस्वामीने रासपञ्चाध्यायके अति आरम्भमें लिखा है— “तत्तस्तादृश-भक्तैरेवैतच्छ्र श्रीशुक उवाचेति पाठे तु ॰ ॰ तत्तस्तादृशचित्ततयैव श्रोतव्यमिदमिति व्यञ्जितम्।” अर्थात् श्रीशुकदेव गोस्वामी ही इस परम उज्ज्वलरससे परिपूर्ण रासलीला प्रसङ्गके उपयुक्त वक्ता हैं। इसलिये वक्ताकी भाँति श्रोताको भी उज्ज्वलरसमें आविष्ट चित्त रहकर श्रवण करना उचित है, यही 'शुक' शब्दके प्रयोगकी व्यञ्जना (सङ्केतिक अर्थ) है। साक्षात् भागवत (१०/३३/३०) में भी कहा गया है— “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥” अर्थात् “परन्तु जो अनीश्वर-असमर्थ है, उन्हें शरीरसे करना तो दूर रहा, मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वरकी इस लीलाका अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट-पतित हो जायेगा। भगवान् शिवने समुद्रसे उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।” वर्तमान युगमें श्रीमद्भागवतके आदेश, श्रीमन्महाप्रभुके आचरण, आचार्य गोस्वामियोंके उपदेश और महाजनोंके वाक्योंका उल्लङ्घन करके श्रीराधागोविन्दकी अप्राकृतलीलाको नाना प्रकारसे विलासके द्रव्यरूपमें परिणत करके जगत्में जो नास्तिकता और व्यभिचारकी दुर्गन्ध विस्तार हो रही है, उसे वर्णन नहीं किया जा सकता। जिन चण्डीदास, विद्यापति और जयदेव गोस्वामीकी मधुर कोमलकान्त पदावली, अप्राकृत-चिद्विलासवैचित्र्य-कथाका श्रीमन्महाप्रभुने कुछ पवित्रतम चरित्र अन्तरङ्ग भक्तोंके साथ आस्वादन किया था, आज वही लीलाएँ कामुक लोगोंके विलासकी वस्तुरूपमें परिणत हो गयी है। आज प्राकृत जड़-साहित्यिकगण अप्राकृत चित्-साहित्यको अवैधरूपमें अपने भोग्यवस्तु मानकर स्वयं तो परमार्थसे चिरकालसे वञ्चित हैं और जगत्को भी उसी मार्गपर ले जा रहे हैं। उनकी धारणा है कि प्राकृत ही अप्राकृतमें परिणत होती है। इस प्रकारका विचार नास्तिकता या बौद्धवादके अतिरिक्त कुछ नहीं है। अप्राकृतका ही तुच्छ प्रतिफलन प्राकृत है। प्रतिफलित वस्तु होनेके कारण अप्राकृतके साथ प्राकृतका कुछ साम्य है, किन्तु वह अप्राकृत नहीं। प्राकृतमें तुच्छता, अवास्तविकता, वञ्चना, न्यूनता, नश्वरता आदि धर्म विद्यमान हैं। इसलिये छायाको सत्यवस्तु माननेसे या छायाका अनुसरण करनेसे कभी भी सत्यवस्तु प्राप्त नहीं होती॥२३५॥ ये लागि कहिते भय, से यदि ना जाने। इहा वइ किबा सुख आछे त्रिभुवने॥२३६॥ अनुवाद—जिन अभक्त लोगोंके कारण ये सब सिद्धान्त कहनेमें भय लगता है, वे यदि इन्हें ना समझ पायें, तो इससे अधिक इस त्रिभुवनमें और क्या सुख होगा?॥२३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तथापि मेरे हृदयमें यह आनन्द हो रहा है कि जिन सब अभक्तोंसे मुझे २३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२३५-२४१ ] भय लगता है, उनकी इस ग्रन्थमें प्रवेशकी सम्भावना नहीं है। इसलिये वे लोग इस ग्रन्थको नहीं पढ़ेंगे (अथवा पढ़कर भी नहीं समझेंगे)। मुझे इससे अधिक और क्या सुख हो सकता है?॥२३५-२३६॥ अमृताणुकणिका—अभक्त लोग इन गूढ़ सिद्धान्तोंका वास्तविक अर्थ ना समझकर उसके विपरीत अर्थको ग्रहणकर अपराध करेंगे, इसलिये उनके समक्ष इन्हें प्रकाशित करना उचित नहीं है। मेरे द्वारा प्रच्छन्न वर्णनके द्वारा वे इन सिद्धान्तोंके विषयमें कुछ जान नहीं पायेंगे, इसलिये अपराधसे उनकी रक्षा होगी। परम गूढ़ रहस्यको अभक्तोंको प्रकाश करना उचित नहीं है, ऐसा गीता (१८/६७) में श्रीकृष्णने सर्वगुह्यतम भजन रहस्य अर्जुनको प्रकाशितकर कहा— “इदन्ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥” अर्थात् “इस गीताशास्त्रको तुम कभी भी असंयमित, अभक्त, सेवाविहीन और मुझसे द्वेष करनेवालेको नहीं बतलाना।”॥२३६॥ अतएव भक्तगणे करि नमस्कार। निःशङ्के कहिये, तार हउक चमत्कार ॥ २३७ ॥ अनुवाद—इसलिये भक्तोंको प्रणाम करके मैं निःसङ्कोच होकर ये सब सिद्धान्त कह रहा हूँ जिससे भक्तोंके हृदयमें चमत्कार होगा अर्थात् अत्यधिक प्रसन्नता होगी॥२३७॥ श्रीकृष्णकी गौरावतार-चिन्ता, ह्लादिनी-शक्तिका महात्म्य :- कृष्णेर विचार एक आछये अन्तरे। 'पूर्णानन्द-रसस्वरूप सबे कहे मोरे ॥ २३८ ॥ ह्लादिनी-माधुर्यसे श्रीकृष्ण-माधुर्यकी हीनता और पराजय :— आमा हैते आनन्दित हय त्रिभुवन। आमाके आनन्द दिबे—ऐछे कोन् जन॥ २३९॥ आमा हैते यार हय शत शत गुण। सेइजन आह्लादिते पारे मोर मन॥ २४०॥ आमा हैते गुणी बड़ जगते असम्भव। एकलि राधाते ताहा करि' अनुभव॥ २४१॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण अपने मनमें यह विचार करने लगे—“सभी तत्त्वज्ञ मुझे पूर्णानन्द और रसस्वरूप कहते हैं। मुझसे ही यह त्रिभुवन आनन्दित होता है, किन्तु जो मुझे आनन्द प्रदान करे ऐसा कौन है? जिसमें मुझसे सैकड़ों गुणा अधिक गुण हैं, वही केवल मेरे मनको आनन्दित कर सकता है। मुझसे अधिक गुणवान् व्यक्ति इस जगत्में होना असम्भव है, केवल राधामें ही ऐसे गुणोंको मैं अनुभव करता हूँ॥२३८-२४१॥ अमृताणुकणिका—रस-स्वरूप अथवा आनन्द-स्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होकर सभी आनन्दित होते हैं। (तैत्तिरीय २/७)— चौथा अध्याय | २३९
[ ४/२३९-२४८ “रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयति॥” अर्थात् “वे परमतत्त्व ही रसस्वरूप हैं। उस रसस्वरूपको प्राप्तकर जीव आनन्दका अनुभव करते हैं। यदि वे परमतत्त्व रसरूप-आनन्दस्वरूप नहीं होते, तो कौन जीवित रहता और प्राण-रक्षाकी चेष्टा करता? वे ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं।”॥२३९॥ कोटिकाम जिनि' रूप यद्यपि आमार। असमोध्वंमाधुर्य-साम्य नाहि यार॥ २४२॥ मोर रूपे आप्यायित हय त्रिभुवन। राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयन॥ २४३॥ अनुवाद-यद्यपि मेरा सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और इस अतुलनीय माधुर्यके सामान माधुर्य किसीमें नहीं हो सकता, मेरा रूप तीनों लोकोंको आनन्द प्रदान करनेवाला है, तथापि राधाके दर्शनसे मेरे नेत्रोंको आनन्द होता है॥२४२-२४३॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण मदनमोहन हैं। श्रीकृष्णका माधुर्य करोड़ों कामदेवोंके असाधारण सौन्दर्यको कुचलनेमें समर्थ है। श्रीकृष्णके रूपके समान अथवा उससे अधिक माधुर्य किसी वस्तुमें नहीं है। श्रीकृष्णके रूपके साथ अन्य किसी रूपवान्की तुलना हो ही नहीं सकती॥ २४२-२४३॥ मोर वंशी-गीत आकर्षये त्रिभुवन। राधार वचने हरे आमार श्रवण॥ २४४॥ यद्यपि आमार गन्धे जगत् सुगन्ध। मोर चित्त-घ्राण हरे राधा-अङ्ग-गन्ध॥ २४५॥ यद्यपि आमार रसे जगत् सरस। राधार अधर-रसे आमा करे वश॥ २४६॥ यद्यपि आमार स्पर्श कोटीन्दु-शीतल। राधिकार स्पर्शे आमा करे सुशीतल॥ २४७॥ अनुवाद-मेरा मधुर वंशी-गान तीनों लोकोंको आकर्षित करता है, किन्तु राधाके मधुर वचन मेरे कानोंको हर लेते हैं। यद्यपि मेरी अङ्गोंकी सुगन्धसे जगत् सुगन्धित होता है, तथापि मेरे चित्त और नासिकाको राधाके अङ्गोंकी सुगन्ध हर लेती है। यद्यपि मेरे रससे सम्पूर्ण जगत् सरस होता है, तथापि राधाके अधरोंका रस मुझे वशीभूत कर लेता है। यद्यपि मेरा स्पर्श करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी शीतल है, तथापि राधिकाका स्पर्श मुझे सुशीतल करता है॥२४३-२४७॥ राधिकाका रूप-गुण ही श्रीकृष्णके जीवनका सर्वस्व :- एइ मत जगतेर सुखे आमि हेतु। राधिकार रूप-गुण आमार जीवातु॥ २४८॥ अनुवाद-इस प्रकार जगत्के सुखका कारण मैं ही हूँ, किन्तु राधिकाके रूप और गुण मेरे जीवनके आधार हैं॥ २४८॥ २४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२४९-२५३ ] श्रीकृष्णकी राधाप्रीति अपेक्षा श्रीराधाकी श्रीकृष्णप्रीतिका आधिक्य-विचार :- एइमत अनुभव आमार प्रतीत। विचारि' देखिये यदि, सब विपरीत॥ २४९॥ अनुवाद-इस प्रकार मुझे ऐसा अनुभव प्रतीत होता है, किन्तु तटस्थ होकर विचार करके देखनेसे सब कुछ इसके विपरीत लगता है॥ २४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुझे ऐसा लगता है कि मेरी राधिकाके प्रति प्रीति अत्यन्त प्रबल है, किन्तु विचार करके देखनेसे इसका विपरीत ज्ञान होता है, अर्थात् मेरे प्रति राधिकाकी प्रीति मुझसे अधिक प्रतीत होती है॥ २४९॥ राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयन। आमार दर्शने राधा सुखे अगेयान॥ २५०॥ अनुवाद-राधाके दर्शनसे मेरे नेत्रोंको सन्तोष होता है, किन्तु मेरे दर्शनसे राधाको ऐसा सुख होता जिससे उसको और कोई ज्ञान नहीं रहता॥ २५०॥ परस्पर वेणुगीते हरये चेतन। मोर भ्रमे तमालेरे करे आलिङ्गन॥ २५१ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी वेणुकी ध्वनि राधिकाके चित्तको हर लेती है और राधिकाके कोमल गीत मेरे चित्तको हर लेते हैं। जब राधिकाका चित्त-हरण होता है, तब वह कृष्णभ्रमसे तमालवृक्षका आलिङ्गन करके महासुख अनुभव करती है। अथवा इसका एक और अर्थ है-बांसोंकी आपसमें रगड़के फलस्वरूप वेणुगीत जैसा स्वर निकलता है, जिसे श्रवण करके राधिकाका चित्त-हरण होनेपर वह तमालवृक्षको मेरे भ्रमसे आलिङ्गन करती है॥ २५१॥ श्रीराधाकी सम्पूर्ण कृष्णमयता, सर्वत्र श्रीकृष्णदर्शनसे आनन्द-विह्वलता :- कृष्ण-आलिङ्गन पाइनु, जनम सफले। एइ सुखे मग्न रहे वृक्ष करि' कोले॥ २५२ ॥ अनुकूलवाते यदि पाय मोर गन्ध। उड़िया पड़िते चाहे, प्रेमे हय अन्ध॥ २५३ ॥ अनुवाद-मुझे कृष्णका आलिङ्गन मिल गया और मेरा जीवन सफल हो गया, इस प्रकार वह सुखमें मग्न होकर वृक्षका आलिङ्गन करके खड़ी रह जाती है। जब अनुकूल वायु मेरे शरीरकी सुगन्ध लेकर राधा तक पहुँचती है, तब वह उस सुगन्धको पाकर प्रेममें अन्धी हो जाती है और जिधरसे वह वायु आ रही है, उस दिशामें उड़नेकी इच्छा करती है॥ २५२-२५३॥ अमृतानुकणिका-जिस दिशामें श्रीकृष्ण हैं, उस दिशासे वायु प्रवाहित होते हुए यदि श्रीराधाकी दिशामें आती है, तब उसे अनुकूल कहा गया है। श्रीकृष्णके अङ्गकी गन्ध लेकर वायु जब श्रीराधातक पहुँचती है, तब श्रीराधा श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये इतनी उत्कण्ठित हो जाती हैं कि चलकर जानेमें जो विलम्ब होगा, उसे सहन नहीं कर पाती हैं, इसलिये शीघ्रतासे चौथा अध्याय | २४१
[ ४/२५३-२५९ उड़कर जानेकी इच्छा करती हैं। अन्धेको जैसे किधर पथ है, किधर काँटें हैं, उसका ज्ञान नहीं है, श्रीराधा उसी प्रकार श्रीकृष्णकी अङ्ग-गन्धसे प्रेममें उन्मत्त होकर इस प्रकार दौड़ती हैं, पथ है अथवा नहीं, काँटोंके ऊपर अथवा सर्पके ऊपर चरण रखकर जा रही हैं, इसका भी ज्ञान नहीं रहता, केवल गन्धको लक्ष्य करके दौड़ती हैं॥ २५३॥ श्रीराधाका कृष्णसेवा-सुख श्रीकृष्णके लिये भी दुर्ज्ञेय :- ताम्बूलचर्व्वित यबे करे आस्वाद्ने। आनन्दसमुद्रे डुबे, किछुइ ना जाने॥ २५४॥ आमार सङ्गमे राधा पाय ये आनन्द। शतमुखे बलि, तबु ना पाइ तार अन्त॥ २५५॥ लीला-अन्ते सुखे इँहार अङ्गेर माधुरी। ताहा देखि' सुखे आमि आपना पाशरि॥ २५६॥ अनुवाद—जब राधा मेरे द्वारा चबाये हुए ताम्बुलका वह आस्वादन करती है, तब वह आनन्दसमुद्रमें डूबकर सब कुछ भूल जाती है। मेरे मिलनसे राधाको जो आनन्द मिलता है, उसे मैं सैंकड़ों मुखोंसे कहनेपर भी उसको पूर्ण रूपसे व्यक्त नहीं कर सकता। लीलाके अन्तमें लीला-सुखसे राधाके अङ्गोंकी माधुरी देखकर मैं आनन्दसे स्वयंको भूल जाता हूँ॥ २५४-२५६॥ प्राकृत नायक-नायिकामें समान रस होनेपर भी चित्-जगत्में कान्तरसकी अपेक्षा कान्ता-रसकी अधिकता :- दोंहार ये सम-रस, भरत-मुनि माने। आमार व्रजेर रस सेइ नाहि जाने॥ २५७॥ अनुवाद—भरतमुनि हम दोनोंका सम-रस कहते हैं, किन्तु वे मेरे व्रजके इस रसको नहीं जानते हैं॥ २५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भरतमुनिके मतानुसार स्त्री-पुरुषका रस समान है, किन्तु वे मुनि होकर भी मेरे व्रजरसके तत्त्वको नहीं जानते हैं, क्योंकि राधिकाका रस स्वरूपतः अधिक है॥ २५७॥ श्रीराधासङ्गसे श्रीकृष्णको सर्वापेक्षा अधिक आनन्द :- अन्येरे सङ्गमे आमि यत सुख पाइ। ताहा हैते राधा-सङ्गे शत अधिकाइ॥ २५८॥ अनुवाद—दूसरेके सङ्गसे मुझे जितना आनन्द होता है, उससे सौ गुणा अधिक आनन्द राधाके सङ्गसे होता है॥ २५८॥ ललितमाधव (९/९)— निर्धूतामृतमाधुरीपरिमलः कल्याणि बिम्बाधरो वक्त्रं पङ्कजसौरभं कुहरितश्लाघाभिदस्त गिरः। अङ्गं चन्दनशीतलं तनुरियं सौन्दर्यसर्वस्वभाक् त्वामासाद्य ममेदमिन्द्रियकुलं राधे मुहुर्मोदते॥ २५९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५९॥ २४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२५९-२६० ] अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्णने कहा—“हे कल्याणि! अमृतकी माधुरी और सुगन्धको विजय करनेवाला तुम्हारा बिम्बाधर है, कमलकी सुगन्धयुक्त तुम्हारा मुख है, कोयलकी ध्वनिको भी तिरस्कृत करनेवाली तुम्हारी वाणी है, चन्दनकी भाँति तुम्हारे शीतल अङ्ग हैं और समस्त सौन्दर्यका आधारस्वरूप तुम्हारा शरीर है। इस प्रकार रूपगुण-लीलामयी तुम्हें प्राप्तकर मेरी इन्द्रियोंको बारम्बार महासुख प्राप्त हो रहा है॥” २५९॥ अनुभाष्य-हे कल्याणि (आनन्दविग्रहे), ते (तव) बिम्बाधरः (रक्तवर्णोधरः) निर्धूतामृतमाधुरीपरिमलः (निर्धूतो पराजितौ अमृतस्य माधुरीपरिमलो येन तादृशः), वक्त्रं पङ्कजसौरभं (पङ्कजस्य कमलस्य सौरभं इव सौरभं यस्य तत्), गिरः (वाचः) कुहरितश्लाघाभिदः (कुहरितानां कोकिलध्वनीनां श्लाघाभिदः तिरस्कारिण्यः), अङ्गम् (अवयवः) चन्दनशीतलं (चन्दनवत् शीतलं), इयं तनुः (मूर्तिः) सौन्दर्यसर्वस्वभाक् (सौन्दर्याणां सर्वस्वं भजते या सा)। हे राधे त्वाम् आस्वाद्य (प्राप्य) मम इदम् इन्द्रियकुलं (इन्द्रियगणः) मुहुः (पुनः पुनः) मोदते (ह्लादयुक्तो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५९॥ श्रीरूपगोस्वामीकी उक्ति- रूपे कंसहरस्य लुब्धनयनां स्पर्शोऽतिहृष्यत्त्वचं वाण्यामुत्कलितश्रुतिं परिमले संहृष्टनासापुटाम्। आरज्यद्रसनां किलाधरपुटे न्यञ्चन्मुखाम्भोरुहां दम्भोद्गीर्णमहाधृतिं बहिरपि प्रोद्यद्विकाराकुलाम्॥ २६०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाके नेत्रयुगल कंसारि श्रीकृष्णके रूपके लोभसे युक्त रहते हैं। श्रीकृष्णस्पर्शसे उनकी त्वगिन्द्रय (त्वचा) अति हर्षान्वित होती हैं, श्रीकृष्णकी वाणी सुननेके लिये उनके कान सदा उत्कण्ठित रहते हैं, श्रीकृष्णकी अङ्गकी सुगन्धसे उनकी नासिका प्रफु रहनेवाले मुखकमलको नीचे झुकाकर, राधाजीके द्वारा धैर्य धारण करनेका प्रयास करनेपर भी धैर्यनाशक प्रबल रोमाञ्चादि विकार अङ्गोंमें लक्षित हो रहे हैं॥ २६०॥ अनुभाष्य-कंसहरस्य (कंसान्तकस्य श्रीकृष्णस्य) रूपे (रूपदर्शने) लुब्धनयनां (लुब्धे क्षोभयुक्ते नयने यस्याः तां कृष्णरूपाकृष्टनेत्रां), स्पर्शे (अङ्गसङ्गे) अतिहृष्यत्त्वचं (अतिहृष्यन्ती पुलकिता त्वक् यस्याः तां, कृष्णस्पर्शात्यानन्दितगात्रां), वाण्यां (वाचि) उत्कलितश्रुतिं (उत्कलिते उत्सुके श्रुती कर्णौ यस्याः तां, कृष्णशब्दश्रवणोत्कर्णा), परिमले (अङ्गसौरभे) संहृष्टनासापुटां (संहृष्टे नासापुटे यस्याः तां, कृष्णसुगन्ध- घ्राणाद्भूतमोदाम्), अधरपुटे (अधरामृतपाने) आरज्यद्रसनां (आरज्यन्ती अनुरागभरा रसना जिह्वा यस्याः तां, कृष्णाधरानुरक्तरसनां), न्यञ्चन्मुखाम्भोरुहां (न्यञ्चत् पूजितं मुखं एव अम्भोरुहं यस्याः ताम्, अवनतवदनकमलां) बहिः अपि किल दम्भोद्गीर्णमहाधृतिं (दम्भेन कपटेन उद्गीर्णा प्रकाशिता महती धृतिः धैर्यं यस्याः तां बहिर्वाम्यचेष्टावतीं) अपि प्रोद्यद्विकाराकुलां (प्रोद्यता प्रकर्षेण उद्भूतेन विकारेण आकुलाम् अन्तःक्रीड़ौत्सुक्यपरां) [राधामहं स्मरामि]। श्लोक-भावानुवाद-(कंसका वध करनेवाले) श्रीकृष्णके रूपसे आकृष्ट जिनके लोभयुक्त नयन हैं, श्रीकृष्णके स्पर्शसे जिनका शरीर अति आनन्दित हो जाता है, श्रीकृष्णकी वाणीको श्रवण करनेके लिये जिनके कान उत्कण्ठित रहते हैं, श्रीकृष्णकी अङ्ग-सुगन्धसे जिनकी चौथा अध्याय | २४३
[ ४/२६०-२६५ नासिकाको अद्भुत आनन्द प्राप्त होता है और श्रीकृष्णके अधरसुधापानमें जिनकी रसना सदा अनुरक्त रहती है, अपने मुखकमलको नीचे झुकाकर जो कपटतासे धैर्यपूर्वक बाहरसे वाम्यभावका प्रदर्शन कर रही हैं, परन्तु हृदयमें श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ाकी प्रबल उत्सुकताके कारण रोमाञ्चादि विकार शरीरमें लक्षित हो रहे हैं, उन श्रीराधाका मैं स्मरण करता हूँ॥२६०॥ श्रीकृष्णका अपने माधुर्यके बलका विचार :- ताते जानि, मोते आछे कोन एक रस। आमार मोहिनी राधा, तारे करे वश॥२६१॥ राधासुख-आस्वादन-हेतु श्रीकृष्णकी व्याकुलता :- आमा हैते राधा पाय ये जातीय सुख। ताहा आस्वादिते आमि सदाइ उन्मुख॥२६२॥ नाना यत्न करि आमि, नारि आस्वादिते। सेइ सुखमाधुर्य-घ्राणे लोभ बाड़े चित्ते॥२६३॥ अनुवाद-इससे मैं यह समझता हूँ कि मुझमें कोई एक अनूठा रस है, जो मेरी मोहिनी राधाको सम्पूर्ण रूपसे वशीभूत करता है। मुझसे राधाको जो आश्रयजातीय सुख मिलता है, उसका आस्वादन करनेके लिये मैं सदा व्यग्र रहता हूँ। नाना प्रकारके यत्न करके भी मैं उस रसका आस्वादन नहीं कर पाता हूँ। उस सुखमाधुर्यकी गन्धसे मेरे चित्तमें लोभ बढ़ता है॥२६१-२६३॥ अमृतानुकणिका-श्रीकृष्ण विचार करके इस निष्कर्षपर पहुँचे- “मेरा विश्वास था कि राधिकाके रूपादिके माधुर्यसे जब मेरी पञ्चेन्द्रियाँ परितृप्त होती हैं, तब रूपादिमें राधिका मुझसे श्रेष्ठ है। किन्तु मेरे रूपादिके प्रभावसे राधिकाकी जो अवस्था होती है, अब उसकी विवेचना करके यह देखा कि राधिकाके रूपादिसे मुझे जो आनन्द होता है, मेरे रूपादिसे राधिकाको उससे बहुत अधिक आनन्द होता है; इससे मैं यह मानता हूँ कि मुझमें कोई एक अनिर्वचनीय रस है जो अन्योंकी बात तो दूर, मुझे तक मोहित कर लेता है; वही राधिका तकको मुग्ध करके वशीभूत कर लेता है॥”२६१॥ विभिन्न भावोंमें राधाप्रेमरसके आस्वादन हेतु श्रीगौरावतार :- रस आस्वादिते आमि कैल अवतार। प्रेमरस आस्वादिब विविध प्रकार॥२६४॥ रागभजन-विधिका प्रचार एवं आचार :- रागमार्गे भक्त भक्ति करे ये प्रकारे। ताहा शिखाइब लीला-आचरणद्वारे॥२६५॥ अनुवाद-रसास्वादन करनेके लिये मैं अवतार ग्रहण करूँगा। मैं विभिन्न प्रकारसे प्रेमरसका आस्वादन करूँगा। रागमार्गमें भक्तको किस प्रकार भक्ति करनी चाहिये, अपने आचरणके द्वारा मैं उसकी शिक्षा दूँगा॥२६४-२६५॥ २४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२६६-२७३ ] आश्रयजातीय-भावके बिना विषयजातीय-भावसे सेवा-सुख आस्वादन सम्भव नहीं :- एइ तिन तृष्णा मोर नहिल पूरण। विजातीय-भावे नहे ताहा आस्वादन॥२६६॥ राधिकार भावकान्ति-अङ्गीकार बिने। सेइ तिन सुख कभु नहे आस्वादने॥२६७॥ राधाभाव अङ्गीकरि' धरि' तार वर्ण। तिनसुख आस्वादिते हब अवतीर्ण॥'२६८॥ अनुवाद—[राधाके प्रेमकी महिमा क्या है? मेरी वह अद्भुत माधुरी कैसी है? और मेरे इस माधुर्यका आस्वादन करके राधिकाको कैसा सुख अनुभव होता है?] मेरी ये तीन अभिलाषाएँ अभी पूर्ण नहीं हो पायी हैं, क्योंकि विजातीय भावसे अर्थात् विषयजातीय होनेके कारण आश्रयजातीय सुखका आस्वादन नहीं किया जा सकता। राधिकाके भाव और कान्ति को अङ्गीकार किये बिना उन तीन सुखोंका मैं कभी भी आस्वादन नहीं कर सकता। राधाके भावोंको अङ्गीकार करके और उनके वर्ण (कान्ति) को धारण करके इन तीन सुखोंका आस्वादन करनेके लिये मैं अवतीर्ण होऊँगा॥'२६६-२६८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विजातीय' अर्थात् विषयजातीय॥२६६॥ गौररूपमें अवतरणकालमें युगावतार-काल और श्रीअद्वैतके आकर्षणका सम्मिलन :- सर्वभावे करिल कृष्ण, एइ त' निश्चय। हेनकाले आइल युगावतार-समय॥२६९॥ सेइकाले श्रीअद्वैत करेन आराधन। ताँहार हुङ्कारे कैल कृष्णे आकर्षण॥२७०॥ अनुवाद—सभी प्रकारसे विचार करके श्रीकृष्णने यह निश्चय किया। उसी समय युगावतारका समय भी आ गया। और उसी समय श्रीअद्वैत प्रभुने भी श्रीकृष्णकी आराधना की तथा अपनी हुङ्कारके द्वारा उन्हें आकर्षित किया॥२६९-२७०॥ पहले गुरुवर्गका अवतार, तत्पश्चात् स्वयंरूप श्रीगौरका अवतार :- पितामाता, गुरुगण आगे अवतरिं। राधिकार भाव-वर्ण अङ्गीकार करि'॥२७१॥ नवद्वीपे शचीगर्भ-शुद्धदुग्धसिन्धु। ताहाते प्रकट हैला कृष्ण पूर्ण इन्दु॥२७२॥ अनुवाद—सबसे पहले पिता-माता और गुरुवर्गोंको अवतरित करवाकर तत्पश्चात् राधाके भाव और वर्णको अङ्गीकार करके, नवद्वीपमें शचीगर्भरूपी शुद्ध दुग्धसिन्धु (क्षीरसागर) से पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र प्रकट हुए॥२७१-२७२॥ अनुभाष्य—'अवतारिं'—अवतरण करवाकर॥२७१॥ एइ त' षष्ठश्लोकेर करिलुँ व्याख्यान। श्रीरूप-गोसाञिर पादपद्म करि' ध्यान॥२७३॥ चौथा अध्याय | २४५
[ ४/२६९-२७६ एइ दुइ श्लोकेर आमि ये करिल अर्थ। श्रीरूप-गोसाञिर श्लोक प्रमाण-समर्थ॥ २७४॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके चरणकमलोंका ध्यान करके मैंने छठे श्लोककी व्याख्या की। पाँचवें और छठे, इन दो श्लोकोंका मैंने जो अर्थ किया है उसका प्रमाण श्रीरूप गोस्वामीका यह श्लोक है॥ २७३-२७४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त अपनी तीन प्रकारकी अभिलाषाओंकी पूर्ति और भक्तोंको रागमार्गकी भक्तिका अपने आचरणके द्वारा शिक्षा प्रदान करूँगा, यह विचारकर जिस समय श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय किया, उस समय युगावतारका समय उपस्थित हुआ और उसी समय श्रीअद्वैताचार्यने भी श्रीकृष्णकी आराधना की। इन कारणोंसे राधिकाके भाव और वर्णको अङ्गीकार करके नवद्वीपमें शचीगर्भसे श्रीकृष्णचन्द्र गौराङ्गस्वरूपसे उदय हुए। स्वरूपगोस्वामीके जिन दो श्लोकोंसे जिस तत्त्वकी व्याख्या की थी, उसे श्रीरूप गोस्वामीके श्लोकके द्वारा प्रमाणित कर रहा हूँ॥ २६९-२७४॥ स्तवमालामें द्वितीय चैतन्याष्टक (३)— अपारं कस्यापि प्रणयिजनवृन्दस्य कुतुकी रसस्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तुं कमपि यः। रुचिं स्वामावव्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥ २७५॥ अनुवाद—जो कौतुकी श्रीकृष्ण अपने प्रेमीजनोंके रसोंको आस्वादन करते हुए अपार (असीम) किसी एक प्रकारके मधुररसविशेषका भोग करनेके उद्देश्यसे अपने वर्णको गोपन करके श्रीराधाकी द्युति स्वीकारकर चैतन्याकृतिसे प्रकट हुए हैं, वे मेरे ऊपर विशेष कृपा करें॥ २७५॥ अनुभाष्य—आदिलीला ४/५२ द्रष्टव्य है॥ २७५॥ मङ्गलाचरणं कृष्णचैतन्य-तत्त्वलक्षणम्। प्रयोजनञ्चावतारे श्लोकषट्कैनिरूपितम्॥ २७६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मङ्गलाचरण, श्रीकृष्णचैतन्य-तत्त्वलक्षण और श्रीचैतन्यावतारका प्रयोजन, ये तीन विषय प्रथम छह श्लोकोंके द्वारा निरूपित हुए हैं॥ २७६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये चतुर्थ परिच्छेद। चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—कृष्णचैतन्यतत्त्वलक्षणं (गौरतत्त्वनिरूपणात्मकं) मङ्गलाचरणम्, अवतारे (गौरावतारविषये) प्रयोजनं च श्लोकषट्कैः ('वन्दे गुरून्' इत्यारभ्य 'गर्भसिन्धौ हरीन्दुः' इत्यन्तैः श्लोकैः षट्संख्यकैः) निरूपितम्। श्लोक-भावानुवाद—गौरतत्त्वका निरूपण करनेवाले मङ्गलाचरण और गौरावतारका प्रयोजन 'वन्दे गुरून्' से आरम्भकर 'गर्भसिन्धौ हरिन्दु' तक छह श्लोकोंमें निरूपित किया गया॥ २७६॥ २४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत