भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/२३९-२४८ “रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयति॥” अर्थात् “वे परमतत्त्व ही रसस्वरूप हैं। उस रसस्वरूपको प्राप्तकर जीव आनन्दका अनुभव करते हैं। यदि वे परमतत्त्व रसरूप-आनन्दस्वरूप नहीं होते, तो कौन जीवित रहता और प्राण-रक्षाकी चेष्टा करता? वे ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं।”॥२३९॥ कोटिकाम जिनि' रूप यद्यपि आमार। असमोध्वंमाधुर्य-साम्य नाहि यार॥ २४२॥ मोर रूपे आप्यायित हय त्रिभुवन। राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयन॥ २४३॥ अनुवाद-यद्यपि मेरा सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और इस अतुलनीय माधुर्यके सामान माधुर्य किसीमें नहीं हो सकता, मेरा रूप तीनों लोकोंको आनन्द प्रदान करनेवाला है, तथापि राधाके दर्शनसे मेरे नेत्रोंको आनन्द होता है॥२४२-२४३॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण मदनमोहन हैं। श्रीकृष्णका माधुर्य करोड़ों कामदेवोंके असाधारण सौन्दर्यको कुचलनेमें समर्थ है। श्रीकृष्णके रूपके समान अथवा उससे अधिक माधुर्य किसी वस्तुमें नहीं है। श्रीकृष्णके रूपके साथ अन्य किसी रूपवान्की तुलना हो ही नहीं सकती॥ २४२-२४३॥ मोर वंशी-गीत आकर्षये त्रिभुवन। राधार वचने हरे आमार श्रवण॥ २४४॥ यद्यपि आमार गन्धे जगत् सुगन्ध। मोर चित्त-घ्राण हरे राधा-अङ्ग-गन्ध॥ २४५॥ यद्यपि आमार रसे जगत् सरस। राधार अधर-रसे आमा करे वश॥ २४६॥ यद्यपि आमार स्पर्श कोटीन्दु-शीतल। राधिकार स्पर्शे आमा करे सुशीतल॥ २४७॥ अनुवाद-मेरा मधुर वंशी-गान तीनों लोकोंको आकर्षित करता है, किन्तु राधाके मधुर वचन मेरे कानोंको हर लेते हैं। यद्यपि मेरी अङ्गोंकी सुगन्धसे जगत् सुगन्धित होता है, तथापि मेरे चित्त और नासिकाको राधाके अङ्गोंकी सुगन्ध हर लेती है। यद्यपि मेरे रससे सम्पूर्ण जगत् सरस होता है, तथापि राधाके अधरोंका रस मुझे वशीभूत कर लेता है। यद्यपि मेरा स्पर्श करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी शीतल है, तथापि राधिकाका स्पर्श मुझे सुशीतल करता है॥२४३-२४७॥ राधिकाका रूप-गुण ही श्रीकृष्णके जीवनका सर्वस्व :- एइ मत जगतेर सुखे आमि हेतु। राधिकार रूप-गुण आमार जीवातु॥ २४८॥ अनुवाद-इस प्रकार जगत्के सुखका कारण मैं ही हूँ, किन्तु राधिकाके रूप और गुण मेरे जीवनके आधार हैं॥ २४८॥ २४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत