श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२३५-२४१ ] भय लगता है, उनकी इस ग्रन्थमें प्रवेशकी सम्भावना नहीं है। इसलिये वे लोग इस ग्रन्थको नहीं पढ़ेंगे (अथवा पढ़कर भी नहीं समझेंगे)। मुझे इससे अधिक और क्या सुख हो सकता है?॥२३५-२३६॥ अमृताणुकणिका—अभक्त लोग इन गूढ़ सिद्धान्तोंका वास्तविक अर्थ ना समझकर उसके विपरीत अर्थको ग्रहणकर अपराध करेंगे, इसलिये उनके समक्ष इन्हें प्रकाशित करना उचित नहीं है। मेरे द्वारा प्रच्छन्न वर्णनके द्वारा वे इन सिद्धान्तोंके विषयमें कुछ जान नहीं पायेंगे, इसलिये अपराधसे उनकी रक्षा होगी। परम गूढ़ रहस्यको अभक्तोंको प्रकाश करना उचित नहीं है, ऐसा गीता (१८/६७) में श्रीकृष्णने सर्वगुह्यतम भजन रहस्य अर्जुनको प्रकाशितकर कहा— “इदन्ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥” अर्थात् “इस गीताशास्त्रको तुम कभी भी असंयमित, अभक्त, सेवाविहीन और मुझसे द्वेष करनेवालेको नहीं बतलाना।”॥२३६॥ अतएव भक्तगणे करि नमस्कार। निःशङ्के कहिये, तार हउक चमत्कार ॥ २३७ ॥ अनुवाद—इसलिये भक्तोंको प्रणाम करके मैं निःसङ्कोच होकर ये सब सिद्धान्त कह रहा हूँ जिससे भक्तोंके हृदयमें चमत्कार होगा अर्थात् अत्यधिक प्रसन्नता होगी॥२३७॥ श्रीकृष्णकी गौरावतार-चिन्ता, ह्लादिनी-शक्तिका महात्म्य :- कृष्णेर विचार एक आछये अन्तरे। 'पूर्णानन्द-रसस्वरूप सबे कहे मोरे ॥ २३८ ॥ ह्लादिनी-माधुर्यसे श्रीकृष्ण-माधुर्यकी हीनता और पराजय :— आमा हैते आनन्दित हय त्रिभुवन। आमाके आनन्द दिबे—ऐछे कोन् जन॥ २३९॥ आमा हैते यार हय शत शत गुण। सेइजन आह्लादिते पारे मोर मन॥ २४०॥ आमा हैते गुणी बड़ जगते असम्भव। एकलि राधाते ताहा करि' अनुभव॥ २४१॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण अपने मनमें यह विचार करने लगे—“सभी तत्त्वज्ञ मुझे पूर्णानन्द और रसस्वरूप कहते हैं। मुझसे ही यह त्रिभुवन आनन्दित होता है, किन्तु जो मुझे आनन्द प्रदान करे ऐसा कौन है? जिसमें मुझसे सैकड़ों गुणा अधिक गुण हैं, वही केवल मेरे मनको आनन्दित कर सकता है। मुझसे अधिक गुणवान् व्यक्ति इस जगत्में होना असम्भव है, केवल राधामें ही ऐसे गुणोंको मैं अनुभव करता हूँ॥२३८-२४१॥ अमृताणुकणिका—रस-स्वरूप अथवा आनन्द-स्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होकर सभी आनन्दित होते हैं। (तैत्तिरीय २/७)— चौथा अध्याय | २३९