श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४/२३५-२३६ अप्राकृत कामदेव मन्मथमन्मथ भगवान्की मधुर लीलाकथा आजकल एक खेलकी वस्तु हो गयी है, लोगोंकी विलासिताकी वस्तुरूपमें परिणत हो गयी है। आचार्यवर श्रील सनातन गोस्वामीने रासपञ्चाध्यायके अति आरम्भमें लिखा है— “तत्तस्तादृश-भक्तैरेवैतच्छ्र श्रीशुक उवाचेति पाठे तु ॰ ॰ तत्तस्तादृशचित्ततयैव श्रोतव्यमिदमिति व्यञ्जितम्।” अर्थात् श्रीशुकदेव गोस्वामी ही इस परम उज्ज्वलरससे परिपूर्ण रासलीला प्रसङ्गके उपयुक्त वक्ता हैं। इसलिये वक्ताकी भाँति श्रोताको भी उज्ज्वलरसमें आविष्ट चित्त रहकर श्रवण करना उचित है, यही 'शुक' शब्दके प्रयोगकी व्यञ्जना (सङ्केतिक अर्थ) है। साक्षात् भागवत (१०/३३/३०) में भी कहा गया है— “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥” अर्थात् “परन्तु जो अनीश्वर-असमर्थ है, उन्हें शरीरसे करना तो दूर रहा, मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वरकी इस लीलाका अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट-पतित हो जायेगा। भगवान् शिवने समुद्रसे उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।” वर्तमान युगमें श्रीमद्भागवतके आदेश, श्रीमन्महाप्रभुके आचरण, आचार्य गोस्वामियोंके उपदेश और महाजनोंके वाक्योंका उल्लङ्घन करके श्रीराधागोविन्दकी अप्राकृतलीलाको नाना प्रकारसे विलासके द्रव्यरूपमें परिणत करके जगत्में जो नास्तिकता और व्यभिचारकी दुर्गन्ध विस्तार हो रही है, उसे वर्णन नहीं किया जा सकता। जिन चण्डीदास, विद्यापति और जयदेव गोस्वामीकी मधुर कोमलकान्त पदावली, अप्राकृत-चिद्विलासवैचित्र्य-कथाका श्रीमन्महाप्रभुने कुछ पवित्रतम चरित्र अन्तरङ्ग भक्तोंके साथ आस्वादन किया था, आज वही लीलाएँ कामुक लोगोंके विलासकी वस्तुरूपमें परिणत हो गयी है। आज प्राकृत जड़-साहित्यिकगण अप्राकृत चित्-साहित्यको अवैधरूपमें अपने भोग्यवस्तु मानकर स्वयं तो परमार्थसे चिरकालसे वञ्चित हैं और जगत्को भी उसी मार्गपर ले जा रहे हैं। उनकी धारणा है कि प्राकृत ही अप्राकृतमें परिणत होती है। इस प्रकारका विचार नास्तिकता या बौद्धवादके अतिरिक्त कुछ नहीं है। अप्राकृतका ही तुच्छ प्रतिफलन प्राकृत है। प्रतिफलित वस्तु होनेके कारण अप्राकृतके साथ प्राकृतका कुछ साम्य है, किन्तु वह अप्राकृत नहीं। प्राकृतमें तुच्छता, अवास्तविकता, वञ्चना, न्यूनता, नश्वरता आदि धर्म विद्यमान हैं। इसलिये छायाको सत्यवस्तु माननेसे या छायाका अनुसरण करनेसे कभी भी सत्यवस्तु प्राप्त नहीं होती॥२३५॥ ये लागि कहिते भय, से यदि ना जाने। इहा वइ किबा सुख आछे त्रिभुवने॥२३६॥ अनुवाद—जिन अभक्त लोगोंके कारण ये सब सिद्धान्त कहनेमें भय लगता है, वे यदि इन्हें ना समझ पायें, तो इससे अधिक इस त्रिभुवनमें और क्या सुख होगा?॥२३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तथापि मेरे हृदयमें यह आनन्द हो रहा है कि जिन सब अभक्तोंसे मुझे २३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत