भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/२३२-२३५ ]

अतएव कहि किछु करिया निगूढ़। बुझिबे रसिक भक्त, ना बुझिबे मूढ़॥२३२॥ अनुवाद—इसलिये मैं इसका वर्णन कुछ रहस्यमय ढंगसे करूँगा जिसे रसिक भक्त तो समझेंगे, किन्तु मूर्ख व्यक्ति समझ नहीं पायेंगे॥२३२॥ श्रीगुरु-गौराङ्ग-दासका ही रससिद्धान्तमें अधिकार :- हृदये धरये ये चैतन्य-नित्यानन्द। एसब सिद्धान्ते सेइ पाइबे आनन्द॥२३३॥ ए सब सिद्धान्त हय आम्रेर पल्लव। भक्तगण-कोकिलेर सर्वदा वल्लभ॥२३४॥ अनुवाद—जिन्होंने अपने हृदयमें चैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको धारण किया है, वे लोग ही ये सब सिद्धान्त समझकर हृदयमें आनन्दकी उपलब्धि करेंगे। ये सब सिद्धान्त अत्यन्त कोमल आमके पत्तोंकी भाँति हैं, जो भक्तरूपी कोयलको प्रिय है॥२३३-२३४॥ ग्रन्थकारको अभक्तोंकी दुर्बुद्धिका भय, परन्तु उनकी अज्ञतासे सुख :- अभक्त-उष्ट्र तबे चित्ते हय मोर आनन्द-विशेष॥२३५॥ अनुवाद—यदि अभक्तरूपी ऊँट इसमें प्रवेश नहीं करें, तो मेरे हृदयमें विशेष आनन्द होगा। [क्योंकि कँटीली झाड़ियोंको खानेपर ऊँटकी जीभ कट जाती है और उससे रक्त निकलता है। वह रक्त उसे बहुत स्वादिष्ट लगता है, परन्तु वह सोचता है कि यह स्वाद कँटीली झाड़ीका है। इसलिये उसकी रुचि काँटोंमें है, कोमल आम्र पल्लवोंमें नहीं]॥२३५॥ अनुभाष्य—यह सब कथा गौर-नित्यानन्दके भक्तोंके ही आनन्दका विधान करती है। गौरभक्त कोयलकी भाँति हैं और सिद्धान्त आम्रपल्लवस्वरूप हैं। कोयलकी जिस प्रकार आम्रपल्लवमें विशेष प्रीति है, वैसे ही भक्त लोग इन सिद्धान्तोंमें परमानन्द प्राप्त करते हैं। पक्षान्तरमें, ऊँट जिस प्रकार काँटोंके द्वारा अपनी जिह्वाको क्षत-विक्षत ना करवाकर आम्रपल्लवादि खानेकी इच्छा नहीं करता है, उस प्रकार अभक्त ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषी मिथ्याभक्तरूपी ऊँट इन सब सिद्धान्तोंमें कुतर्क करते हैं॥२३४-२३५॥ अमृतानुकणिका—श्रीमन्महाप्रभुने कहा—“अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत गोचर।” किन्तु श्रीकृष्णमें भोगबुद्धिवाले व्यक्तियोंका यह स्वभाव यह है कि वे अप्राकृत वस्तुको प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा मापने या भोग करनेकी चेष्टा करते हैं। अप्राकृत वस्तुको प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण करनेकी चेष्टाको ही सात्वतजन ‘श्रीकृष्णमें भोगबुद्धि' कहते हैं। अप्राकृत वस्तुमें प्राकृत इन्द्रियोंका प्रवेशाधिकार नहीं है—यह बात प्राकृत व्यक्तियोंके मस्तिष्कमें कुछ भी प्रवेश नहीं करती। वे सोचते हैं, जब हम नेत्रों, कानों, जिह्वा, त्वचा या मनके द्वारा सब कुछ जान सकते हैं, तब अप्राकृत वस्तु नामक और क्या हो सकता है? किन्तु अप्राकृतरसके रसिकजनोंका कहना है—अप्राकृत तत्त्वमें या सिद्धान्तमें अभक्त, ज्ञानी, कर्मी, अन्याभिलाषी या मिथ्याभक्तोंका प्रवेशाधिकार नहीं है। श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थमें श्रीरूप गोस्वामीने इसे स्पष्ट रूपमें कहा है—

चौथा अध्याय | २३७