भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/२२७-२३१ आर यत चैतन्य-कृष्णेर भक्तगण। भक्तिभावे शिरे धरि सबार चरण ॥ २२८ ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीनिवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूपदामोदर, मुरारिगुप्त प्रभु, श्रील हरिदास ठाकुर और जितने भी महाप्रभुके भक्त हैं, भक्तिभावसे उनके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण करता हूँ॥२२७-२२८॥ अब तक छठे श्लोककी भूमिका वर्णन; अब विस्तृत व्याख्या :- षष्ठश्लोकेर एइ कहिल आभास। मूल श्लोकेर अर्थ शुन, करिये प्रकाश ॥ २२९ ॥ अनुवाद-छठे श्लोकके अर्थकी मैंने भूमिका बतलायी थी, अब श्लोकके मूल अर्थको प्रकाश कर रहा हूँ॥२२९॥ श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चा- श्रीराधायाः प्रणयमहिमा कीदृशो वानयैवा- स्वाद्यो येनाद्भुतमधुरिमा कीदृशो वा मदीयः। सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभा- तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः ॥२३०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥२३०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाकी प्रणयमहिमा कैसी है? मेरी अद्भुत मधुरिमा-जिसको श्रीराधा आस्वादन करती है-वह कैसी है? मेरी मधुरिमाकी अनुभूतिसे श्रीराधाके हृदयमें कैसा सुख उदय होता है? इन तीन विषयोंके प्रति लोभ उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णरूप चन्द्रने शचीगर्भरूप समुद्रसे जन्मग्रहण किया॥२३०॥ अनुभाष्य-श्रीराधायाः (वार्षभानव्याः) प्रणयमहिमा (प्रणयमाहात्म्यः) वा कीदृशः, अनया (राधया) मदीयः अद्भुतमधुरिमा (अपूर्वमाधुर्यातिशयः) येन (प्रणयेन) कीदृशः वा आस्वाद्यः, मदनुभवतः (मदनुभवात्) अस्याः (श्रीराधायाः) सौख्यं कीदृशं वा-इति लोभात् तद्भावाढ्यः (तस्याः भावेन आढ्याः समन्वितः सन्) शचीगर्भसिन्धौ (शच्याः मातुः गर्भसमुद्रे) हरीन्दुः (कृष्णचन्द्रः) समजनि (प्रादुरासीत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२३०॥ गूढ़ होनेपर भी रसिक भक्तोंके लिये वर्णन :- ए सब सिद्धान्त गूढ़,-कहिते ना यूयाय। ना कहिले, केह इहार अन्त नाहि पाय ॥ २३१ ॥ अनुवाद-अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥२३१॥ अनुभाष्य-श्रीगौरावतारका यही गूढ़ सिद्धान्त है-श्रीकृष्णकी हृदयगत वासनाको जगत्में प्रकाशित करना यद्यपि योग्य नहीं है, अथवा जगत्के श्रोताओंके अधिकारोचित नहीं है, तथापि यह कथा प्रकाशित ना होनेपर जीव अपनी चेष्टासे इसकी सीमाकी उपलब्धि नहीं कर पायेंगे अर्थात् उसकी पूर्ण महिमाको नहीं जान पायेंगे ॥ २३१॥ २३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत