भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/२२४-२२७ ] व्रजललनाओंके साथ श्रीकृष्णका नित्य विलास :- श्रीगीतगोविन्द (१/११)- विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामलकोमलैरूपनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥ २२४॥ अनुवाद-हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलास-रसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गार रसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा है, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं। परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गको सम्यक् और स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गित कर रही हैं॥ २२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि ! शृङ्गारस्वरूप श्रीकृष्ण अपने अङ्गसौन्दर्यके द्वारा जगत्में आनन्द उत्पन्न कराकर और इन्दीवरके (नीलकमलके) सदृश सुन्दर, कोमल हस्त-चरणादिके द्वारा व्रजाङ्गनाओंके हृदयमें कन्दर्पोत्सव उदय करते हुए व्रजसुन्दरियोंके द्वारा स्वच्छन्दतापूर्वक आलिङ्गित होकर वसन्तकालमें क्रीड़ा कर रहे हैं॥ २२४॥ अनुभाष्य-हे सखि ! अनुरञ्जनेन (प्रीणनेन) विश्वेषां (सर्वासां गोपरामाणां) आनन्दं जनयन्, इन्दीवरश्रेणी-श्यामलकोमलैः (हरिद्वर्णविविध-सुकुमार-नीलपद्मप्रतिमैः) अङ्गैः अनङ्गोत्सवं उपनयन् (प्रापयन्) स्वच्छन्दम् (असङ्कोचं यथा स्यात् तथा) अभितः व्रजसुन्दरीभिः प्रत्यङ्गं आलिङ्गितः मुग्धः हरिः मधौ (वसन्तसमये) मूर्त्तिमान् शृङ्गारः इव क्रीड़ति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २२४॥ गौरावतारमें रसनिधान श्रीकृष्णका नाना प्रकारसे गोपीप्रेम-रसास्वादन :- श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि रसेर सदन। अशेष-विशेष कैल रस आस्वादन ॥ २२५ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु रसका भण्डार हैं, उन्होंने सभी प्रकारसे रसका आस्वादन किया॥ २२५॥ चैतन्यदास ही चित्-शक्तिके आश्रयमें श्रीगौरावतार-रहस्यके ज्ञाता :- सेइ द्वारे प्रवर्त्ताइल कलियुग-धर्म। चैतन्येर दासे जाने एइ सब मर्म॥ २२६॥ अनुवाद-उसके द्वारा महाप्रभुने कलियुगके धर्मकी भी स्थापना की। इस रहस्यको केवल उनके भक्त ही जानते हैं॥ २२६ ॥ गौरपार्षद और गौरभक्त-वन्दना :- अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, श्रीनिवास। गदाधर, दामोदर, मुरारि, हरिदास ॥ २२७ ॥ चौथा अध्याय | २३५