भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/२१९-२२३ कंसारिः (श्रीकृष्णः) अपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलां (सम्यक् सारभूता रासलीला-वासना तया आबद्धा बन्धनं दृढ़ीकरणाय संयुक्ता शृङ्खला निगड़रूपा तां रासक्रीड़ा-परमाश्रयां) राधां हृदये आधाय (आ-सम्यक् प्रकारेण धृत्वा) व्रजसुन्दरीः (सर्वाः गोपवधूः) तत्याज। श्लोक-भावानुवाद-कंसारि (श्रीकृष्ण) ने सम्पूर्ण साररूप रासलीलाकी वासनाके बन्धनको दृढ़ करनेवाली शृङ्खलारूपी रासक्रीड़ाकी परमाश्रया श्रीराधाको हृदयमें पूर्णरूपसे धारण करके अन्य सभी गोपियोंको त्याग दिया॥२१९॥ अमृतानुकणिका-श्रीराधा जब रासमण्डली छोड़कर चली गयीं, तब अन्य सभी गोपियाँ रासमण्डलमें थीं, तथापि रासलीलाभिलाषी श्रीकृष्ण उन सबको छोड़कर केवल राधाजीका अन्वेषण करने लगे। इसके द्वारा यह समझा जाता है कि श्रीराधाके बिना शत-कोटि गोपियोंके द्वारा रासलीला सम्पन्न नहीं हो सकती, अन्यथा श्रीकृष्ण इन गोपियोंको लेकर रासलीला करते। श्रीराधाके बिना अन्य समस्त गोपियाँ भी स्वतन्त्रभावसे श्रीकृष्णके सुखका विधान नहीं कर सकतीं, इसका ही प्रमाण यह श्लोक है। इससे ही समस्त गोपियोंमें श्रीराधाका सर्वश्रेष्ठत्व प्रमाणित हुआ है॥२१९॥ मुख्यरूपसे राधाभावसे ही तीनों वाञ्छाओंकी पूर्ति, गौणरूपमें नामप्रेम प्रचार :- सेइ राधाभाव लञा चैतन्यावतार। युगधर्म नाम-प्रेम कैल परचार॥२२०॥ सेइभावे निजवाञ्छा करिल पूरण। अवतारेर एइ वाञ्छा मूल-कारण॥२२१॥ अनुवाद-उसी राधा-भावको लेकर ही चैतन्यावतार हुआ है। अवतीर्ण होकर उन्होंने युगधर्म नाम-सङ्कीर्तन और उसके द्वारा श्रीकृष्ण-प्रेमका प्रचार भी किया। उस राधा-भावको लेकर श्रीकृष्णने अपनी उपरोक्त तीन इच्छाओंको पूर्ण किया। ये तीन इच्छाएँ ही उनके अवतारकी मूल कारण है॥२२०-२२१॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी सर्वस्व, प्रीतिकी आश्रयस्वरूपा, सर्वोत्तम श्रीमती गान्धर्विका (राधिका) का भाव अर्थात् उनकी ऐकान्तिकी श्रीकृष्णसेवापरायण चित्तवृत्ति ही 'सेइ राधाभाव' (उसी राधाभाव) का तात्पर्य है॥२२०॥ सम्भोगरस-विग्रह श्रीनन्दनन्दन ही विप्रलम्भरस-विग्रह श्रीगौर :- श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि व्रजेन्द्रकुमार। रसमय-मूर्ति कृष्ण साक्षात् शृङ्गार॥२२२॥ सेइ रस आस्वादिते कैल अवतार। आनुषङ्गे कैल सब रसेर प्रचार॥२२३॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य ही रसमय मूर्ति व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्ण हैं, जो साक्षात् शृङ्गाररस हैं। उसी शृङ्गाररसका आस्वादन करनेके लिये उन्होंने अवतार ग्रहण किया और आनुषङ्गिक रूपसे दूसरे रसोंका भी प्रचार किया॥२२१-२२३॥ २३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत