भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/२१६-२१९ ] श्लोक-भावानुवाद-भू (पृथ्वी), भुवः और स्वर्ग, इन तीन लोकोंमें पृथ्वी धन्य है, जिसपर वृन्दावन नामक पुरी है। वृन्दावनमें भी गोपियाँ धन्य हैं, जिनमें मेरी राधा नामक गोपी विद्यमान है॥ २१६॥ मधुररसमें श्रीराधाके साथ ही मूल विलास, अन्य सब वस्तुएँ उसके उपकरण :- राधासह क्रीड़ा रस-वृद्धिर कारण। आर सब गोपीगण रसोपकरण॥ २१७॥ अनुवाद-श्रीराधाके साथ क्रीड़ा श्रीकृष्णके रसास्वादनकी वृद्धिका कारण है। अन्य सभी गोपियाँ उस रसकी वृद्धिकी उपकरण स्वरूप अर्थात् सहायिका हैं॥ २१७॥ अनुभाष्य-श्रीराधिका ही श्रीकृष्णकी सर्वस्व हैं। अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णकी श्रीराधाके साथ क्रीड़ारसकी वृद्धिके उद्देश्यसे रसकी उपकरणमात्र हैं। “समन्तान्माधवाकर्षिविभ्रमाः सन्ति सुभ्रुवः। तास्तु वृन्दावनेश्वर्याः सख्यः पञ्चविधा मताः॥ सख्यश्च नित्यसख्यश्च प्राणसख्यश्च काश्चन। प्रियसख्यश्च परमप्रेष्ठसख्यश्च विश्रुताः ॥ ××× आसां सुष्ठु द्वयोरेव प्रेम्णः परमकाष्ठया। क्वचिज्जातु क्वचिज्जातु तदाधिक्यमिवेक्ष्यते ॥ ××प्रेमलीलाविहाराणं सम्यग्विस्तारिका सखी ॥” काम-भावोंको उद्दीप्त करनेकी चेष्टाके द्वारा श्रीकृष्णको सभी प्रकारसे आकर्षित करनेमें समर्था उज्ज्वल वर्णवाली श्रीवृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधिकाकी पाँच प्रकारकी सखियाँ हैं। जैसे-सखी, नित्यसखी, प्राणसखी, प्रियसखी और परमप्रेष्ठसखी। परमप्रेष्ठ सखियाँ आठ हैं और इनमें प्रेमकी पराकाष्ठा होनेसे ये कभी राधाजीके मान करनेपर श्रीकृष्णका और कभी खण्डितावस्थामें श्रीराधाका पक्ष लेते हुए एकके प्रति अनुराग और दूसरेके प्रति विपक्ष भाव प्रदर्शन करते हुए रसकी वृद्धि करती हैं॥ २१७॥ कृष्णेर वल्लभा राधा, कृष्ण-प्राणधन। ताँहा बिनु सुखहेतु नहे गोपीगण॥ २१८॥ अनुवाद-श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी सर्वाधिक प्रिया तथा प्राणधन हैं, उनके बिना अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णके सुखका कारण नहीं हो सकती॥ २१८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिकाके बिना अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णके सुखका कारण नहीं हो सकतीं ॥ २१८॥ श्रीगीतगोविन्द (३/१)- कंसारिरपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलाम्। राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ २१९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कंसारि (कंसके शत्रु) श्रीकृष्ण सम्पूर्णसाररूपी रासलीला-वासनाकी शृङ्खला श्रीराधाको हृदयमें धारणकर अन्यान्य व्रजसुन्दरीयोंको त्यागकर चले गये॥ २१९॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके रासस्थलीको त्यागकर रासकी मूल-आश्रय श्रीराधाके पीछे जानेपर श्रीजयदेवका वाक्य- चौथा अध्याय | २३३