श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/२१२-२१६ दासीके समान सेवा करनेवाली, बन्धुके समान प्रीति-आचरणशील और विवाहिता पत्नीके समान भोग्या, गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं? [वे मेरी सर्वस्व हैं, यह अर्थ है] ॥ २१२ ॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्डमें (३९) आदिपुराणवचन :- मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्र जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः॥ २१३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा माहात्म्य, मेरी सेवा, मेरे प्रति श्रद्धा, मेरे मनके भाव केवल गोपियाँ ही जानतीं हैं। हे पार्थ! स्वरूपसे इन सबको और कोई नहीं जानता है॥ २१३॥ अनुभाष्य-हे पार्थ! गोपिकाः मन्माहात्म्यं (मम महिमानं) मत्सपर्यां (मम सेवां) मच्छ्रद्धां (मम स्पृहनीयं) मन्मनोगतं (मम मनोऽभिप्रायं) तत्त्वतः (स्वरूपतः) जानन्ति, [अन्ये] भक्ताः न जानन्ति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥ गोपियोंमें श्रीराधिका ही सर्वश्रेष्ठा :- सेइ गोपीगण-मध्ये उत्तमा राधिका। रूपे, गुणे, सौभाग्ये, प्रेमे सर्वाधिका ॥ २१४॥ अनुवाद-उन गोपियोंमें राधिका ही सबसे श्रेष्ठा हैं। रूप, गुण, सौभाग्य और प्रेममें भी वे सबसे अधिक हैं॥२१४॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४५) पद्मपुराणवचन :- यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ २१५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥ २१५॥ अनुभाष्य-विष्णोः (कृष्णस्य) राधा यथा प्रिया, तस्याः (राधायाः) कुण्डं तथा प्रियम्। सर्वगोपीषु सा (श्रीराधिका) एका एव विष्णोः अत्यन्तवल्लभाः (परा प्रियतमा)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४६) आदिपुराणवचन :- त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या यत्र वृन्दावनं पुरी। तत्रापि गोपिकाः पार्थ यत्र राधाभिधा मम ॥ २१६ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पृथ्वीपर वृन्दावनधामके अवतीर्ण होनेपर पृथ्वी तीनों लोकोंमें धन्य हुई है। उसमें भी गोपियाँ धन्य हैं, क्योंकि उनमें मेरी अत्यन्त प्रिय 'राधा' नामक गोपी विद्यमान है॥ २१६॥ अनुभाष्य-हे पार्थ! त्रैलोक्ये (भूर्भुवःस्वर्लोकत्रयमध्ये) पृथिवी धन्या, यत्र (पृथिव्यां) वृन्दावनं [नाम] पुरी [अस्ति]। तत्र (वृन्दावने) अपि गोपिकाः धन्याः, यत्र मम राधाभिधा [गोपीवर्त्तते]। २३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत