भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/२०८-२१२ ] सेवया पूर्णाः ते (भक्ताः) मत्सेवया प्रतीतं (प्राप्तम् अपि) सालोक्यादिचतुष्टयं न इच्छन्ति (नाभिलषन्ति), अन्यत् (स्वर्गादिकं) कालविप्लुतं (काले नाशयोग्यं) कुतः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०८॥ गोपीप्रेमका वर्णन :- कामगन्धहीन स्वाभाविक गोपी-प्रेम। निर्मल, उज्ज्वल, शुद्ध येन दग्ध हेम॥२०९॥ श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका सम्पर्क :- कृष्णेर सहाय, गुरु, बान्धवी, प्रेयसी। गोपिका हयेन प्रिया शिष्या, सखी, दासी॥२१०॥ गोपिका जानेन कृष्णेर मनेर वाञ्छित। प्रेमसेवा परिपाटी, इष्ट-समीहित॥२११॥ अनुवाद-गोपियोंका प्रेम स्वाभाविक है जिसमें कामकी गन्ध तक भी नहीं है। वह प्रेम अग्निसे तपाये हुए (दोषरहित) स्वर्णकी भाँति निर्मल, उज्ज्वल और शुद्ध है। गोपियाँ श्रीकृष्णकी सहायिका, गुरु, बान्धवी, प्रेयसी, प्रिय शिष्या, सखी और दासी हैं। गोपियाँ श्रीकृष्णकी सभी मनोवाञ्छाओंको जानती हैं और उन्हें पूर्ण करनेके लिये उनकी प्रेममयी सेवाकी रीति भी जानती हैं। श्रीकृष्णकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेके लिये ही उनकी सभी चेष्टाएँ होती हैं॥२०९-२११॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘इष्ट-समीहित’ अर्थात् अभिलषित चेष्टा॥२११॥ श्रीकृष्णका अपने साथ गोपियोंका सम्बन्ध-वर्णन :- आदिपुराणवचन- सहाया गुरवः शिष्या भुजिष्या बान्धवाः स्त्रियः। सत्यं वदामि ते पार्थ गोप्यः किं मे भवन्ति न॥२१२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१२॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा- “हे पार्थ! गोपियाँ मेरी सर्वस्व हैं- वे मेरी सहायिका अर्थात् प्रिया हैं, मुझे गुरुके समान स्नेह करती हैं, शिष्याके समान मेरी सेवा करती हैं, मेरी उपभोग्या जैसी दासी हैं, बन्धुके समान प्रेम आचरण करनेवाली हैं और विवाहिता स्त्रीके समान व्यवहार करती हैं।”२१२॥ अनुभाष्य- हे पार्थ ! ते (तुभ्यम्) अहं सत्यं (स-शपथं निश्चितं) वदामि- मे (मम) सहायाः (रासक्रीड़ादौ सहायाः) गुरवः (प्रेमशिक्षादौ उपदेष्टारः) शिष्याः (मदाज्ञापालनपराः) भुजिष्याः (दासीवत् मत्सेवापराः) बान्धवाः (बन्धुवत् प्रीत्याचरणशीलाः) स्त्रियः (स्वपत्नीवत् भोग्याः)-[अतः] गोप्यो मे किं न भवन्ति? [अपि तु मत्सर्वस्वा एवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद- हे पार्थ! तुम्हें मैं शपथके साथ निश्चित रूपसे कह रहा हूँ मेरी रासक्रीड़ादिमें सहायिका, प्रेमकी शिक्षा देनेवाली गुरु, मेरी आज्ञाका पालन करनेवाली शिष्या, चौथा अध्याय | २३१