श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/२०५-२०८ अर्थात् अकारण या स्वतःसिद्धा और अव्यवहिता अर्थात् बिना किसी व्यवधानके अथवा अन्य किसी फलकी आकाङ्क्षासे रहित है॥२०५-२०६॥ अनुभाष्य—श्रीकपिलदेवने माता देवहूतिसे कहा— मद्गुणश्रुतिमात्रेण (मम गुणश्रवणमात्रेण) सर्वगुहाशये (सर्वान्तःकरणवर्त्तिनि) मयि, अम्बुधौ (समुद्रे) गङ्गाम्भसः यथा, [तथा] अविच्छिन्ना (अप्रतिरुद्धा, विषयान्तरेण छेत्तुमशक्या या) मनोगतिः, पुरुषोत्तमे या अहैतुकी (फलानुसन्धानरहिता) अव्यवहिता (देहद्रविणजनतालोभपाषण्डत्वादि-व्यवधान-विवर्जिता) भक्तिः, सा निर्गुणस्य (त्रिगुणातीतस्य भगवतः) भक्तियोगस्य लक्षणम् उदाहृतं (कथितं) हि। श्लोक-भावानुवाद—मेरे गुणोंको श्रवण करनेमात्रसे सबके अन्तःकरणमें मुझ अन्तर्यामीमें समुद्रकी ओर बहते गङ्गाके प्रवाहके समान बिना किसी अवरोधके (विषयान्तर करनेमें अक्षम) फलाकाङ्क्षारहित, (देह-धन-जनके लोभ और पाखण्डादि) व्यवधानसे रहित मनकी गतिको ही त्रिगुणातीत भगवत्-भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥२०५-२०६॥ श्रीमद्भागवत (३/२९/१३)— सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः॥२०७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है॥२०७॥ अनुभाष्य—जनाः (हरिजनाः) मत्सेवनं बिना (मद्भजनं त्यक्त्वा) दीयमानं सालोक्यं (मया सह एकस्मिन् लोके वासं) सार्ष्टिं (समानमैश्वर्यं) सामीप्यं (निकटवर्त्तित्वं) सारूप्यं (समानरूपताम्) एकत्वम् उत (सायुज्यमपि) न गृह्णन्ति (नाभिनन्दन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०७॥ नश्वर भोग तो दूर रहे, भक्त मोक्षकी भी कामना नहीं करते :- श्रीमद्भागवत (९/४/६७)— मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम्। नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम्॥२०८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी सेवासे ही परिपूर्ण-हृदयवाले शुद्धभक्त मेरी सेवाके द्वारा सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ स्वयं आनेपर भी जब उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, तब मायिक (स्वर्गादि) भोग और सायुज्य मुक्ति, जो कालके द्वारा अति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, उनकी इच्छा वे क्यों करेंगे? सायुज्यमुक्तिके द्वारा जीवकी सत्ता कालका ग्रास बन जाती है, इसलिये भुक्ति और सायुज्य-मुक्ति, ये स्थायी नहीं हैं॥२०८॥ अनुभाष्य—अम्बरीष जैसे भक्तोंके गुणोंका वर्णन करते हुए श्रीभगवान्ने दुर्वासासे कहा— २३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत