श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२०२-२०६ ]
अनुभाष्य-येन (प्रेमानन्देन) कंसारातेः (कृष्णस्य) बीजने (चामरसेवने) साक्षात् अक्षोदीयान् (महान्) अन्तरायः (बाधकः) व्यधायि, दारुकः (श्रीकृष्णस्य सारथिः) अङ्गस्तम्भारम्भम् (अङ्गानां स्तम्भारम्भं जड़ीभावम्) उत्तुङ्गयन्तं (प्रापयन्तं) तं प्रेमानन्दं (निजानुभवार्हानन्दं) नाभ्यनन्दत् (आनुकूल्यकरत्वे नैव अभिलषितवान्)। श्लोक-भावानुवाद-जब श्रीकृष्णके सारथी दारुक श्रीकृष्णको चामर झुला रहे थे, उस समय प्रेमानन्दसे उनके सारे अङ्गोंमें जड़ता उपस्थित हुई, किन्तु दारुकने इस प्रेमानन्दको साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें अवरोध मानकर उसका अभिनन्दन नहीं किया अर्थात् उसकी अभिलाषा नहीं की॥२०२॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (२/३/५४)- गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणम्। उच्चैरनिन्ददानन्दमरविन्दविलोचना॥२०३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कमलनयना श्रीकृष्णभामिनीने श्रीकृष्णदर्शनके बाधास्वरूप नेत्रोंसे जलका वर्षण करनेवाले आनन्दकी अतिशय निन्दा की॥२०३॥ अनुभाष्य-अरविन्दविलोचना (कमलनेत्रा राधिका) गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणं (गोविन्दस्य प्रेक्षणं तस्य आक्षेपी बाधको यो वाष्पपूराश्रुवृन्दं तम् अभिवर्षितुं स्वभावो यस्य तम्) आनन्दम् उच्चैः (अतिशयेन) अनिन्दत् (निनिन्द)। श्लोक-भावानुवाद-कमलनयना श्रीमती राधिकाने गोविन्दके दर्शनमें बाधक आनन्द जिसका स्वभाव नेत्रोंसे अश्रुवर्षण कराना है, उसकी अत्यधिक निन्दा की॥२०३॥ शुद्धभक्तकी श्रीकृष्णभक्ति बिना मुक्तिसे भी घृणा :- आर शुद्धभक्त कृष्ण-प्रेम-सेवा-बिने। स्वसुखार्थ सालोक्यादि ना करे ग्रहणे॥२०४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-और भी देखो, श्रीकृष्ण-प्रेमसेवाके बिना अपने सुखके लिये शुद्धभक्त सालोक्यादि मुक्तिको भी कभी ग्रहण नहीं करते॥२०४॥ श्रीकृष्णमें अहैतुकी और अप्रतिहता भक्ति ही निर्गुणा :- श्रीमद्भागवत (३/२९/११-१२)- मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥२०५॥ लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥२०६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०५-२०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी
चौथा अध्याय | २२९