भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

[ ४/१९७-२०२ गोपीप्रेमके स्वाभाविक लक्षण :- आर एक गोपीप्रेमेर स्वाभाविक चिह्न। ये-प्रकारे हय प्रेम काम-गन्ध-हीन॥१९७॥ गोपीप्रेमे करे कृष्णमाधुर्य्येर पुष्टि। माधुर्य बाड़ाय प्रेम हञा महातुष्टि॥१९८॥ सेव्य 'विषय'की प्रीतिमें ही सेवक 'आश्रय'की शुद्धप्रीति :- प्रीतिविषयानन्दे तदाश्रयानन्द। ताँहा नाहि निजसुखवाञ्छार सम्बन्ध॥१९९॥ निरुपाधि प्रेम याँहा, ताँहा एइ रीति। प्रीतिविषयसुखे आश्रयेर प्रीति॥२००॥ अनुवाद-गोपीप्रेमका एक और प्रकारका स्वाभाविक लक्षण है जो दिखलाता है कि उसमें कामकी गन्ध भी नहीं है। गोपियोंका प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्यकी पुष्टि करता है और वही वर्धित माधुर्य उनके प्रेमको बढ़ाता है; इस प्रकार वे परम सन्तुष्ट होती हैं। जो प्रेमके विषय हैं, उनके आनन्दमें ही प्रेमके आश्रयका आनन्द निहित होता है। इसलिये इसमें निजसुख लालसाका कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँ निरुपाधिक प्रेम है, वहाँ यही रीति है। प्रेमके विषयके सुखसे ही आश्रयको सुख मिलता है॥१९७-२००॥ श्रीकृष्णसेवाकालमें निजेन्द्रियप्रीतिके प्रति घृणा और दूरसे ही परित्यज्य :- निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे। से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महाक्रोधे॥२०१॥ अनुवाद-जब प्रेममें अपने आनन्दसे श्रीकृष्णके सेवानन्दमें बाधा उत्पन्न होती है, तो उस निज आनन्दके प्रति भक्तको अत्यधिक क्रोध होता है॥२०१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रीतिके विषय श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उसीसे ही प्रीतिकी आश्रय गोपियोंको आनन्द होता है। इस प्रकार आनन्दसमृद्धिसे गोपियोंका अपनी सुख-अभिलाषासे कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँपर निरुपाधिक प्रेम होता है, वहाँपर यही रीति दिखलायी देती है अर्थात् प्रीतिके विषयके सुखमें ही प्रीतिके आश्रयका सुख निहित होता है। तो भी एक बात कही जा सकती है, जहाँ अपना प्रेमानन्द होता है, वहाँ श्रीकृष्णसेवानन्दमें बाधा अवश्य ही होगी। इसलिये जब सेवानन्दके बाधकरूप आनन्दका उदय होता है, तब भक्तके अन्दर महाक्रोध उपस्थित होता है॥१९९-२०१॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (३/२/६२)- अङ्गस्तम्भारम्भमुत्तुङ्गयन्तं प्रेमानन्दं दारुको नाभ्यनन्दत्। कंसारातेर्बीजने येन साक्षादक्षोदीयानन्तरायो व्यधायि॥२०२॥ अनुवाद-अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥२०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णको चामर ढुलानेके समय प्रेमानन्दसे उत्पन्न शरीरकी जड़ताको सेवामें बाधा जानकर दारुकने उसका अभिनन्दन नहीं किया॥२०२॥ २२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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