श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२४९-२५३ ] श्रीकृष्णकी राधाप्रीति अपेक्षा श्रीराधाकी श्रीकृष्णप्रीतिका आधिक्य-विचार :- एइमत अनुभव आमार प्रतीत। विचारि' देखिये यदि, सब विपरीत॥ २४९॥ अनुवाद-इस प्रकार मुझे ऐसा अनुभव प्रतीत होता है, किन्तु तटस्थ होकर विचार करके देखनेसे सब कुछ इसके विपरीत लगता है॥ २४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुझे ऐसा लगता है कि मेरी राधिकाके प्रति प्रीति अत्यन्त प्रबल है, किन्तु विचार करके देखनेसे इसका विपरीत ज्ञान होता है, अर्थात् मेरे प्रति राधिकाकी प्रीति मुझसे अधिक प्रतीत होती है॥ २४९॥ राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयन। आमार दर्शने राधा सुखे अगेयान॥ २५०॥ अनुवाद-राधाके दर्शनसे मेरे नेत्रोंको सन्तोष होता है, किन्तु मेरे दर्शनसे राधाको ऐसा सुख होता जिससे उसको और कोई ज्ञान नहीं रहता॥ २५०॥ परस्पर वेणुगीते हरये चेतन। मोर भ्रमे तमालेरे करे आलिङ्गन॥ २५१ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी वेणुकी ध्वनि राधिकाके चित्तको हर लेती है और राधिकाके कोमल गीत मेरे चित्तको हर लेते हैं। जब राधिकाका चित्त-हरण होता है, तब वह कृष्णभ्रमसे तमालवृक्षका आलिङ्गन करके महासुख अनुभव करती है। अथवा इसका एक और अर्थ है-बांसोंकी आपसमें रगड़के फलस्वरूप वेणुगीत जैसा स्वर निकलता है, जिसे श्रवण करके राधिकाका चित्त-हरण होनेपर वह तमालवृक्षको मेरे भ्रमसे आलिङ्गन करती है॥ २५१॥ श्रीराधाकी सम्पूर्ण कृष्णमयता, सर्वत्र श्रीकृष्णदर्शनसे आनन्द-विह्वलता :- कृष्ण-आलिङ्गन पाइनु, जनम सफले। एइ सुखे मग्न रहे वृक्ष करि' कोले॥ २५२ ॥ अनुकूलवाते यदि पाय मोर गन्ध। उड़िया पड़िते चाहे, प्रेमे हय अन्ध॥ २५३ ॥ अनुवाद-मुझे कृष्णका आलिङ्गन मिल गया और मेरा जीवन सफल हो गया, इस प्रकार वह सुखमें मग्न होकर वृक्षका आलिङ्गन करके खड़ी रह जाती है। जब अनुकूल वायु मेरे शरीरकी सुगन्ध लेकर राधा तक पहुँचती है, तब वह उस सुगन्धको पाकर प्रेममें अन्धी हो जाती है और जिधरसे वह वायु आ रही है, उस दिशामें उड़नेकी इच्छा करती है॥ २५२-२५३॥ अमृतानुकणिका-जिस दिशामें श्रीकृष्ण हैं, उस दिशासे वायु प्रवाहित होते हुए यदि श्रीराधाकी दिशामें आती है, तब उसे अनुकूल कहा गया है। श्रीकृष्णके अङ्गकी गन्ध लेकर वायु जब श्रीराधातक पहुँचती है, तब श्रीराधा श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये इतनी उत्कण्ठित हो जाती हैं कि चलकर जानेमें जो विलम्ब होगा, उसे सहन नहीं कर पाती हैं, इसलिये शीघ्रतासे चौथा अध्याय | २४१