श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४/२५३-२५९ उड़कर जानेकी इच्छा करती हैं। अन्धेको जैसे किधर पथ है, किधर काँटें हैं, उसका ज्ञान नहीं है, श्रीराधा उसी प्रकार श्रीकृष्णकी अङ्ग-गन्धसे प्रेममें उन्मत्त होकर इस प्रकार दौड़ती हैं, पथ है अथवा नहीं, काँटोंके ऊपर अथवा सर्पके ऊपर चरण रखकर जा रही हैं, इसका भी ज्ञान नहीं रहता, केवल गन्धको लक्ष्य करके दौड़ती हैं॥ २५३॥ श्रीराधाका कृष्णसेवा-सुख श्रीकृष्णके लिये भी दुर्ज्ञेय :- ताम्बूलचर्व्वित यबे करे आस्वाद्ने। आनन्दसमुद्रे डुबे, किछुइ ना जाने॥ २५४॥ आमार सङ्गमे राधा पाय ये आनन्द। शतमुखे बलि, तबु ना पाइ तार अन्त॥ २५५॥ लीला-अन्ते सुखे इँहार अङ्गेर माधुरी। ताहा देखि' सुखे आमि आपना पाशरि॥ २५६॥ अनुवाद—जब राधा मेरे द्वारा चबाये हुए ताम्बुलका वह आस्वादन करती है, तब वह आनन्दसमुद्रमें डूबकर सब कुछ भूल जाती है। मेरे मिलनसे राधाको जो आनन्द मिलता है, उसे मैं सैंकड़ों मुखोंसे कहनेपर भी उसको पूर्ण रूपसे व्यक्त नहीं कर सकता। लीलाके अन्तमें लीला-सुखसे राधाके अङ्गोंकी माधुरी देखकर मैं आनन्दसे स्वयंको भूल जाता हूँ॥ २५४-२५६॥ प्राकृत नायक-नायिकामें समान रस होनेपर भी चित्-जगत्में कान्तरसकी अपेक्षा कान्ता-रसकी अधिकता :- दोंहार ये सम-रस, भरत-मुनि माने। आमार व्रजेर रस सेइ नाहि जाने॥ २५७॥ अनुवाद—भरतमुनि हम दोनोंका सम-रस कहते हैं, किन्तु वे मेरे व्रजके इस रसको नहीं जानते हैं॥ २५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भरतमुनिके मतानुसार स्त्री-पुरुषका रस समान है, किन्तु वे मुनि होकर भी मेरे व्रजरसके तत्त्वको नहीं जानते हैं, क्योंकि राधिकाका रस स्वरूपतः अधिक है॥ २५७॥ श्रीराधासङ्गसे श्रीकृष्णको सर्वापेक्षा अधिक आनन्द :- अन्येरे सङ्गमे आमि यत सुख पाइ। ताहा हैते राधा-सङ्गे शत अधिकाइ॥ २५८॥ अनुवाद—दूसरेके सङ्गसे मुझे जितना आनन्द होता है, उससे सौ गुणा अधिक आनन्द राधाके सङ्गसे होता है॥ २५८॥ ललितमाधव (९/९)— निर्धूतामृतमाधुरीपरिमलः कल्याणि बिम्बाधरो वक्त्रं पङ्कजसौरभं कुहरितश्लाघाभिदस्त गिरः। अङ्गं चन्दनशीतलं तनुरियं सौन्दर्यसर्वस्वभाक् त्वामासाद्य ममेदमिन्द्रियकुलं राधे मुहुर्मोदते॥ २५९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५९॥ २४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत