भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/२६९-२७६ एइ दुइ श्लोकेर आमि ये करिल अर्थ। श्रीरूप-गोसाञिर श्लोक प्रमाण-समर्थ॥ २७४॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके चरणकमलोंका ध्यान करके मैंने छठे श्लोककी व्याख्या की। पाँचवें और छठे, इन दो श्लोकोंका मैंने जो अर्थ किया है उसका प्रमाण श्रीरूप गोस्वामीका यह श्लोक है॥ २७३-२७४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त अपनी तीन प्रकारकी अभिलाषाओंकी पूर्ति और भक्तोंको रागमार्गकी भक्तिका अपने आचरणके द्वारा शिक्षा प्रदान करूँगा, यह विचारकर जिस समय श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय किया, उस समय युगावतारका समय उपस्थित हुआ और उसी समय श्रीअद्वैताचार्यने भी श्रीकृष्णकी आराधना की। इन कारणोंसे राधिकाके भाव और वर्णको अङ्गीकार करके नवद्वीपमें शचीगर्भसे श्रीकृष्णचन्द्र गौराङ्गस्वरूपसे उदय हुए। स्वरूपगोस्वामीके जिन दो श्लोकोंसे जिस तत्त्वकी व्याख्या की थी, उसे श्रीरूप गोस्वामीके श्लोकके द्वारा प्रमाणित कर रहा हूँ॥ २६९-२७४॥ स्तवमालामें द्वितीय चैतन्याष्टक (३)— अपारं कस्यापि प्रणयिजनवृन्दस्य कुतुकी रसस्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तुं कमपि यः। रुचिं स्वामावव्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥ २७५॥ अनुवाद—जो कौतुकी श्रीकृष्ण अपने प्रेमीजनोंके रसोंको आस्वादन करते हुए अपार (असीम) किसी एक प्रकारके मधुररसविशेषका भोग करनेके उद्देश्यसे अपने वर्णको गोपन करके श्रीराधाकी द्युति स्वीकारकर चैतन्याकृतिसे प्रकट हुए हैं, वे मेरे ऊपर विशेष कृपा करें॥ २७५॥ अनुभाष्य—आदिलीला ४/५२ द्रष्टव्य है॥ २७५॥ मङ्गलाचरणं कृष्णचैतन्य-तत्त्वलक्षणम्। प्रयोजनञ्चावतारे श्लोकषट्कैनिरूपितम्॥ २७६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मङ्गलाचरण, श्रीकृष्णचैतन्य-तत्त्वलक्षण और श्रीचैतन्यावतारका प्रयोजन, ये तीन विषय प्रथम छह श्लोकोंके द्वारा निरूपित हुए हैं॥ २७६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये चतुर्थ परिच्छेद। चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—कृष्णचैतन्यतत्त्वलक्षणं (गौरतत्त्वनिरूपणात्मकं) मङ्गलाचरणम्, अवतारे (गौरावतारविषये) प्रयोजनं च श्लोकषट्कैः ('वन्दे गुरून्' इत्यारभ्य 'गर्भसिन्धौ हरीन्दुः' इत्यन्तैः श्लोकैः षट्संख्यकैः) निरूपितम्। श्लोक-भावानुवाद—गौरतत्त्वका निरूपण करनेवाले मङ्गलाचरण और गौरावतारका प्रयोजन 'वन्दे गुरून्' से आरम्भकर 'गर्भसिन्धौ हरिन्दु' तक छह श्लोकोंमें निरूपित किया गया॥ २७६॥ २४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत