श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२६६-२७३ ] आश्रयजातीय-भावके बिना विषयजातीय-भावसे सेवा-सुख आस्वादन सम्भव नहीं :- एइ तिन तृष्णा मोर नहिल पूरण। विजातीय-भावे नहे ताहा आस्वादन॥२६६॥ राधिकार भावकान्ति-अङ्गीकार बिने। सेइ तिन सुख कभु नहे आस्वादने॥२६७॥ राधाभाव अङ्गीकरि' धरि' तार वर्ण। तिनसुख आस्वादिते हब अवतीर्ण॥'२६८॥ अनुवाद—[राधाके प्रेमकी महिमा क्या है? मेरी वह अद्भुत माधुरी कैसी है? और मेरे इस माधुर्यका आस्वादन करके राधिकाको कैसा सुख अनुभव होता है?] मेरी ये तीन अभिलाषाएँ अभी पूर्ण नहीं हो पायी हैं, क्योंकि विजातीय भावसे अर्थात् विषयजातीय होनेके कारण आश्रयजातीय सुखका आस्वादन नहीं किया जा सकता। राधिकाके भाव और कान्ति को अङ्गीकार किये बिना उन तीन सुखोंका मैं कभी भी आस्वादन नहीं कर सकता। राधाके भावोंको अङ्गीकार करके और उनके वर्ण (कान्ति) को धारण करके इन तीन सुखोंका आस्वादन करनेके लिये मैं अवतीर्ण होऊँगा॥'२६६-२६८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विजातीय' अर्थात् विषयजातीय॥२६६॥ गौररूपमें अवतरणकालमें युगावतार-काल और श्रीअद्वैतके आकर्षणका सम्मिलन :- सर्वभावे करिल कृष्ण, एइ त' निश्चय। हेनकाले आइल युगावतार-समय॥२६९॥ सेइकाले श्रीअद्वैत करेन आराधन। ताँहार हुङ्कारे कैल कृष्णे आकर्षण॥२७०॥ अनुवाद—सभी प्रकारसे विचार करके श्रीकृष्णने यह निश्चय किया। उसी समय युगावतारका समय भी आ गया। और उसी समय श्रीअद्वैत प्रभुने भी श्रीकृष्णकी आराधना की तथा अपनी हुङ्कारके द्वारा उन्हें आकर्षित किया॥२६९-२७०॥ पहले गुरुवर्गका अवतार, तत्पश्चात् स्वयंरूप श्रीगौरका अवतार :- पितामाता, गुरुगण आगे अवतरिं। राधिकार भाव-वर्ण अङ्गीकार करि'॥२७१॥ नवद्वीपे शचीगर्भ-शुद्धदुग्धसिन्धु। ताहाते प्रकट हैला कृष्ण पूर्ण इन्दु॥२७२॥ अनुवाद—सबसे पहले पिता-माता और गुरुवर्गोंको अवतरित करवाकर तत्पश्चात् राधाके भाव और वर्णको अङ्गीकार करके, नवद्वीपमें शचीगर्भरूपी शुद्ध दुग्धसिन्धु (क्षीरसागर) से पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र प्रकट हुए॥२७१-२७२॥ अनुभाष्य—'अवतारिं'—अवतरण करवाकर॥२७१॥ एइ त' षष्ठश्लोकेर करिलुँ व्याख्यान। श्रीरूप-गोसाञिर पादपद्म करि' ध्यान॥२७३॥ चौथा अध्याय | २४५