श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
४/२६६-२७३ ] आश्रयजातीय-भावके बिना विषयजातीय-भावसे सेवा-सुख आस्वादन सम्भव नहीं :- एइ तिन तृष्णा मोर नहिल पूरण। विजातीय-भावे नहे ताहा आस्वादन॥२६६॥ राधिकार भावकान्ति-अङ्गीकार बिने। सेइ तिन सुख कभु नहे आस्वादने॥२६७॥ राधाभाव अङ्गीकरि' धरि' तार वर्ण। तिनसुख आस्वादिते हब अवतीर्ण॥'२६८॥ अनुवाद—[राधाके प्रेमकी महिमा क्या है? मेरी वह अद्भुत माधुरी कैसी है? और मेरे इस माधुर्यका आस्वादन करके राधिकाको कैसा सुख अनुभव होता है?] मेरी ये तीन अभिलाषाएँ अभी पूर्ण नहीं हो पायी हैं, क्योंकि विजातीय भावसे अर्थात् विषयजातीय होनेके कारण आश्रयजातीय सुखका आस्वादन नहीं किया जा सकता। राधिकाके भाव और कान्ति को अङ्गीकार किये बिना उन तीन सुखोंका मैं कभी भी आस्वादन नहीं कर सकता। राधाके भावोंको अङ्गीकार करके और उनके वर्ण (कान्ति) को धारण करके इन तीन सुखोंका आस्वादन करनेके लिये मैं अवतीर्ण होऊँगा॥'२६६-२६८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विजातीय' अर्थात् विषयजातीय॥२६६॥ गौररूपमें अवतरणकालमें युगावतार-काल और श्रीअद्वैतके आकर्षणका सम्मिलन :- सर्वभावे करिल कृष्ण, एइ त' निश्चय। हेनकाले आइल युगावतार-समय॥२६९॥ सेइकाले श्रीअद्वैत करेन आराधन। ताँहार हुङ्कारे कैल कृष्णे आकर्षण॥२७०॥ अनुवाद—सभी प्रकारसे विचार करके श्रीकृष्णने यह निश्चय किया। उसी समय युगावतारका समय भी आ गया। और उसी समय श्रीअद्वैत प्रभुने भी श्रीकृष्णकी आराधना की तथा अपनी हुङ्कारके द्वारा उन्हें आकर्षित किया॥२६९-२७०॥ पहले गुरुवर्गका अवतार, तत्पश्चात् स्वयंरूप श्रीगौरका अवतार :- पितामाता, गुरुगण आगे अवतरिं। राधिकार भाव-वर्ण अङ्गीकार करि'॥२७१॥ नवद्वीपे शचीगर्भ-शुद्धदुग्धसिन्धु। ताहाते प्रकट हैला कृष्ण पूर्ण इन्दु॥२७२॥ अनुवाद—सबसे पहले पिता-माता और गुरुवर्गोंको अवतरित करवाकर तत्पश्चात् राधाके भाव और वर्णको अङ्गीकार करके, नवद्वीपमें शचीगर्भरूपी शुद्ध दुग्धसिन्धु (क्षीरसागर) से पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र प्रकट हुए॥२७१-२७२॥ अनुभाष्य—'अवतारिं'—अवतरण करवाकर॥२७१॥ एइ त' षष्ठश्लोकेर करिलुँ व्याख्यान। श्रीरूप-गोसाञिर पादपद्म करि' ध्यान॥२७३॥ चौथा अध्याय | २४५
[ ४/२६९-२७६ एइ दुइ श्लोकेर आमि ये करिल अर्थ। श्रीरूप-गोसाञिर श्लोक प्रमाण-समर्थ॥ २७४॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके चरणकमलोंका ध्यान करके मैंने छठे श्लोककी व्याख्या की। पाँचवें और छठे, इन दो श्लोकोंका मैंने जो अर्थ किया है उसका प्रमाण श्रीरूप गोस्वामीका यह श्लोक है॥ २७३-२७४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त अपनी तीन प्रकारकी अभिलाषाओंकी पूर्ति और भक्तोंको रागमार्गकी भक्तिका अपने आचरणके द्वारा शिक्षा प्रदान करूँगा, यह विचारकर जिस समय श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय किया, उस समय युगावतारका समय उपस्थित हुआ और उसी समय श्रीअद्वैताचार्यने भी श्रीकृष्णकी आराधना की। इन कारणोंसे राधिकाके भाव और वर्णको अङ्गीकार करके नवद्वीपमें शचीगर्भसे श्रीकृष्णचन्द्र गौराङ्गस्वरूपसे उदय हुए। स्वरूपगोस्वामीके जिन दो श्लोकोंसे जिस तत्त्वकी व्याख्या की थी, उसे श्रीरूप गोस्वामीके श्लोकके द्वारा प्रमाणित कर रहा हूँ॥ २६९-२७४॥ स्तवमालामें द्वितीय चैतन्याष्टक (३)— अपारं कस्यापि प्रणयिजनवृन्दस्य कुतुकी रसस्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तुं कमपि यः। रुचिं स्वामावव्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥ २७५॥ अनुवाद—जो कौतुकी श्रीकृष्ण अपने प्रेमीजनोंके रसोंको आस्वादन करते हुए अपार (असीम) किसी एक प्रकारके मधुररसविशेषका भोग करनेके उद्देश्यसे अपने वर्णको गोपन करके श्रीराधाकी द्युति स्वीकारकर चैतन्याकृतिसे प्रकट हुए हैं, वे मेरे ऊपर विशेष कृपा करें॥ २७५॥ अनुभाष्य—आदिलीला ४/५२ द्रष्टव्य है॥ २७५॥ मङ्गलाचरणं कृष्णचैतन्य-तत्त्वलक्षणम्। प्रयोजनञ्चावतारे श्लोकषट्कैनिरूपितम्॥ २७६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मङ्गलाचरण, श्रीकृष्णचैतन्य-तत्त्वलक्षण और श्रीचैतन्यावतारका प्रयोजन, ये तीन विषय प्रथम छह श्लोकोंके द्वारा निरूपित हुए हैं॥ २७६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये चतुर्थ परिच्छेद। चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—कृष्णचैतन्यतत्त्वलक्षणं (गौरतत्त्वनिरूपणात्मकं) मङ्गलाचरणम्, अवतारे (गौरावतारविषये) प्रयोजनं च श्लोकषट्कैः ('वन्दे गुरून्' इत्यारभ्य 'गर्भसिन्धौ हरीन्दुः' इत्यन्तैः श्लोकैः षट्संख्यकैः) निरूपितम्। श्लोक-भावानुवाद—गौरतत्त्वका निरूपण करनेवाले मङ्गलाचरण और गौरावतारका प्रयोजन 'वन्दे गुरून्' से आरम्भकर 'गर्भसिन्धौ हरिन्दु' तक छह श्लोकोंमें निरूपित किया गया॥ २७६॥ २४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२७७ ] इति अनुभाष्ये चतुर्थ परिच्छेद। चौथे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ २७७ ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे चैतन्यावतार-मूलप्रयोजनकथनं नाम चतुर्थ-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ २७७ ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें चैतन्यावतारके मूलप्रयोजनका वर्णन नामक चौथे अध्यायका अनुवाद समाप्त। चौथा अध्याय | २४७
प्रेमे मत्त नित्यानन्द कृपा-अवतार। उत्तम, अधम, किछु ना करे विचार॥ ये आगे पड़ये, तारे करये निस्तार।
पाँचवाँ अध्याय पाँचवें अध्यायका कथासार-इस अध्यायमें पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमा इस प्रकार वर्णित हुई है। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं; उनकी विलासमूर्ति अर्थात् द्वितीय देह श्रीबलरामजी हैं। प्रकृतिसे परे 'परव्योम' नामक एक चिन्मय धाम है, जिसके सबसे ऊपरी भागमें 'कृष्णलोक' है। कृष्णलोकमें द्वारका, मथुरा और गोकुल-ये तीन प्रकोष्ठ हैं। वहाँ स्वयं भगवान् अपना विस्तारकर मूल चतुर्व्यूह रूप अर्थात् श्रीकृष्ण, श्रीबलदेव, प्रद्युम्न अर्थात् कामदेव और अनिरुद्ध, इन चार रूपोंमें वास करते हैं। इस कृष्णलोकमें वृन्दावनमें स्थित 'श्वेतद्वीप' नामक धाम है। कृष्णलोकके नीचे 'परव्योम' नामक वैकुण्ठ है, जहाँ श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति चतुर्भुज नारायण विराजमान हैं। कृष्णलोकमें जो श्रीबलदेव हैं, वे ही मूल सङ्कर्षण हैं। परव्योम-वैकुण्ठमें महासङ्कर्षण उनकी विलासमूर्ति हैं। उन्हीं महासङ्कर्षणकी चित्-शक्तिके द्वारा परव्योममें समस्त शुद्धसत्त्वका प्रकाश है और उनकी जीव-शक्तिके द्वारा समस्त शुद्धजीव वहाँ वर्तमान हैं, परन्तु उनकी (बहिरङ्गा) माया-शक्तिकी वहाँ अवस्थिति नहीं है। नारायण धाममें भगवान्का द्वितीय कायव्यूह वर्तमान है। उस परव्योमके बाहर ज्योतिर्मय धामरूप 'ब्रह्मलोक' है। उसके बाहर चिन्मयजलका कारणसमुद्र है। कारणसमुद्रके दूसरी ओर, उसे स्पर्श ना करते हुए मायाकी अवस्थिति है। कारणसमुद्रमें मूलसङ्कर्षणके अंशरूप आदिपुरुषावतार महाविष्णु वास करते हैं। वे दूरसे ही मायाके ऊपर दृष्टिपात करते हैं। उनके एक अङ्गाभाससे (अर्थात् जो अङ्ग जैसा प्रतीत होता है, परन्तु अङ्ग नहीं है) मायाके उपादान-कारणका मिलन होता है। माया ही उपादान-कारण रूपमें 'प्रधान' और निमित्त-कारण रूपमें 'प्रकृति' है। महाविष्णुका ईक्षण ही जड़रूपा प्रकृतिका मूल निमित्त-कारण है, इसलिये प्रकृति केवल गौण निमित्त-कारण है। वे कारणाब्धिशायी महाविष्णु ही समस्त जगत्में प्रवेशकर गर्भोदशायी और प्रत्येक ब्रह्माण्डमें, प्रत्येक जीवमें प्रवेशकर क्षीरोदशायी हैं। वे गर्भोदशायी पुरुष प्रत्येक ब्रह्माण्डमें एक-एक वैकुण्ठको प्रकटकर वहाँ विष्णु-परमात्मा-ईश्वरादि रूपमें विराजमान हैं और ब्रह्माण्डके जलांशमें शेष-शय्यापर शयन करते हैं; वे ही ब्रह्माके पिता हैं और उनके एक अंशकी ही विराट् रूपमें कल्पना की गयी है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें क्षीरसमुद्रके मध्य एक-एक 'श्वेतद्वीप' प्रकट हुआ है और उसमें विष्णु वास करते हैं। इसलिये दो श्वेतद्वीप हैं-एक कृष्णलोकमें और एक प्रत्येक ब्रह्माण्डमें क्षीरसमुद्रमें। कृष्णलोकका 'श्वेतद्वीप' वहाँ स्थित वृन्दावनसे अभिन्नरूपमें श्रीकृष्णकी किसी परिशिष्ट लीलाकी भूमि है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें 'शेष'-मूर्ति विष्णुकी छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, आवास, यज्ञसूत्र, सिंहासनादि रूपोंमें सेवा करते हैं। कृष्णलोकमें श्रीबलदेव प्रभु ही श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं, इसलिये वे मूल-सङ्कर्षण हैं। परव्योमके महासङ्कर्षण और उनके पुरुषावतारगण इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभुके अंश और कला हैं। इस अध्यायमें ग्रन्थकारने अपनी वृन्दावन यात्रा और वहाँ उनकी सर्वसिद्धिके विषयमें एक कथा लिखी है। उसमें उन्होंने लिखा है,- उनका पूर्व निवास कटोआ जिलेमें नेहाटीके निकट
[ ५/१-४ झामटपुर ग्राममें था। वे दो भाई थे। उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद श्रीमीनकेतनरामदासको अपने घरमें आमन्त्रित किया था। श्रीमीनकेतनरामदास उनके पुजारी गुणार्णवमिश्रके व्यवहारसे असन्तुष्ट हुए। कविराज गोस्वामीके भाईने भी पुजारीका ही समर्थन करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके महात्म्यको स्वीकार नहीं किया। (इसलिये श्रील कविराज गोस्वामीने अपने भाईका तिरस्कार किया)। श्रीरामदास अपनी वंशीको तोड़कर उस स्थानसे चले गये। इस अपराधके कारण श्रील कविराज गोस्वामीके भाईका तुरन्त ही सर्वनाश हो गया। उसी रात्रिमें श्रील कविराज गोस्वामीने स्वप्नमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और आदेश पाकर अगले दिन ही वृन्दावनकी ओर प्रस्थान किया। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाके बलसे श्रीनित्यानन्दस्वरूप-ज्ञान :- वन्देनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीनित्यानन्दमीश्वरम्। यस्येच्छया तत्स्वरूपमज्ञेनापि निरूप्यते ॥ १ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अनन्त-अद्भुत-ऐश्वर्यसे युक्त ईश्वर श्रीनित्यानन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। मूर्ख व्यक्ति भी उनकी इच्छासे उनके स्वरूपका निरूपण करनेमें समर्थ हो जाता है॥ १॥ अनुभाष्य-यस्य (नित्यानन्दस्य) इच्छया (अनुकम्पया) अज्ञेन (शास्त्रज्ञानानभिज्ञेन) अपि [मया] तत्स्वरूपं (नित्यानन्दतत्त्वं) निरूप्यते (वर्ण्यते), तम् अनन्ताद्भुतैश्वर्यम् (अनन्तम् अद्भुतम् ऐश्वर्यं यस्य तं देशकालपात्रातीतैश्वर्यसम्पन्नम्) ईश्वरं (देवदेवं) श्रीनित्यानन्दम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अनुकम्पासे शास्त्रोंको ना जाननेवाला (मुझ जैसा) व्यक्ति भी उनके तत्त्वको वर्णन करनेमें समर्थ हो जाता है। उन देश-काल-पात्रसे अतीत, अनन्त, अद्भुत ऐश्वर्यसम्पन्न देवोंके देव श्रीनित्यानन्द प्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमहाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु और श्रीमन्महाप्रभुके समस्त भक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ छह श्लोकोंमें श्रीगौर-तत्त्व, पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व :- एइ षट्श्लोके कहिल कृष्णचैतन्य-महिमा। पञ्चश्लोके कहि नित्यानन्दतत्त्व-सीमा ॥ ३ ॥ अनुवाद-पहले छह श्लोकोंमें मैंने श्रीकृष्णचैतन्यकी महिमाका वर्णन किया। अब पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व और उनकी महिमा कहूँगा ॥ ३ ॥ श्रीबलदेव-तत्त्व :- सर्व-अवतारी कृष्ण स्वयं भगवान्। ताँहार द्वितीय देह श्रीबलराम ॥ ४ ॥ अनुवाद-सभी अवतारोंके अवतारी श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। श्रीबलराम उनकी द्वितीय देहरूप हैं॥ ४॥ २५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/४-७ ] अमृतप्रवाह भाष्य—'ताँहार द्वितीय देह'—श्रीकृष्णकी विलास-देह ॥ ४॥ एकइ स्वरूप दोँहे, भिन्नमात्र काय। आद्य कायव्यूह, कृष्णलीलाय सहाय ॥ ५॥ अनुवाद—वे दोनों अभिन्न स्वरूप हैं, केवलमात्र देहका भेद है। श्रीबलराम श्रीकृष्णके आदिकायव्यूह अर्थात् उनकी देहका प्रथम विस्तार हैं और वे श्रीकृष्णकी लीलामें सहायक हैं॥ ५॥ अमृताणुकणिका—मूलरूपके साथ तदेकात्मरूपका स्वरूपसे अभेद होनेपर भी किसी लीला-विशेषके उद्देश्यसे भिन्न आकृतिमें (भिन्न वर्णमें, भिन्न वेशादिमें) प्रकटित स्वरूपका नाम विलास है। श्रीकृष्ण श्याम वर्ण हैं और श्रीबलराम श्वेत वर्ण, श्रीकृष्णके पीतवसन और श्रीबलरामके नीलवसन हैं; वर्ण और वेशमें भेद होनेसे श्रीबलराम श्रीकृष्णके विलास हैं। किसी विशेष उद्देश्यसे एक देहसे यदि एक अथवा एकसे अधिक देह प्रकटित हों, तब उन प्रकटित देहसमूहको कायव्यूह कहा जाता है। 'आद्य कायव्यूह'—प्रथम कायव्यूह। लीलाके अनुरोधसे श्रीकृष्ण जो सब रूपोंमें स्वयंको प्रकट करते हैं, उनमेंसे श्रीबलराम ही सर्वश्रेष्ठ और श्रीकृष्णके सर्वापेक्षा घनिष्ठ हैं। वे उनकी लीलामें कैसे सहायता करते हैं, इसका परवर्ती आठसे ग्यारह पयार संख्यामें वर्णन है॥ ५॥ श्रीकृष्ण—श्रीगौर, श्रीबलराम—श्रीनिताइ :- सेइ कृष्ण—नवद्वीपे श्रीचैतन्यचन्द्र। सेइ बलराम—सङ्गे श्रीनित्यानन्द ॥ ६॥ अनुवाद—वे श्रीकृष्ण ही नवद्वीपमें श्रीचैतन्यचन्द्रके रूपमें प्रकट हुए हैं और वे श्रीबलराम उनके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें हैं॥ ६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीबलदेव ही श्रीकृष्णके आदिकायव्यूह अर्थात् कायका विस्तार हैं और वे ही उनकी लीलाके सहायक हैं। वे श्रीकृष्ण ही नवद्वीपमें श्रीचैतन्यचन्द्रके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं और उनके आदिकायव्यूह वे श्रीबलराम ही उनके साथ श्रीनित्यानन्द रूपमें हैं॥ ५-६॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे सातवें श्लोककी व्याख्या :- सङ्कर्षण और कारण-गर्भ-क्षीर-जलशायिगण एवं शेषके अंशी श्रीनित्यानन्द अथवा श्रीबलदेव :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे— सङ्कर्षणः कारणतोयशायी गर्भोदशायी च पयोऽब्धिशायी। शेषश्च यस्यांशकलाः स नित्यानन्दाख्यरामः शरणं ममास्तु ॥ ७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सङ्कर्षण, कारणाब्धिशायी, गर्भोदशायी, पयोब्धिशायी और शेष जिनके अंश और कला हैं, वे श्रीनित्यानन्दराम मेरी शरणस्वरूप हों॥ ७॥ अनुभाष्य—सङ्कर्षणः (परव्योमस्थो महासङ्कर्षणः), कारणतोयशायी (आदिपुरुषावतारः), गर्भोदशायी (द्वितीय-पुरुषावतारः हिरण्यगर्भः समष्टिविष्णुः), पयोब्धिशायी (तृतीयपुरुषावतारः क्षीरशायी व्यष्टिविष्णुः), शेषः (अनन्तदेवः) यस्य अंशकलाः, सः नित्यानन्दाख्यारामः (नित्यानन्दनामा बलदेवः) मम शरणम् अस्तु। पाँचवाँ अध्याय | २५१
[ ५/७-११
श्लोक-भावानुवाद—परव्योम-स्थित महासङ्कर्षण, कारणोदशायी (आदिपुरुषावतार), गर्भोदशायी (द्वितीय पुरुषावतार हिरण्यगर्भ—समस्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त विष्णु), क्षीरोदशायी (तृतीय पुरुषावतार—सभी जीवोंके हृदयमें स्थित विष्णु) और अनन्तदेव जिनके अंश और कला हैं, वे श्रीनित्यानन्द नामक श्रीबलदेव मेरी शरणस्वरूप हों॥७॥ मूल-सङ्कर्षण श्रीबलदेवकी पाँच रूपोंमें श्रीकृष्णसेवा :— श्रीबलराम गोसाञि मूल-सङ्कर्षण। पञ्चरूप धरि' करेन कृष्णेर सेवन॥८॥ आपने करेन कृष्णलीलार सहाय। सृष्टिलीला-कार्य करे धरि' चारि काय॥९॥ चित्-अचित्-सृष्टि, स्थिति और अनुप्रवेशादि-कार्यमें चाररूप तथा शेषरूपमें दस देहसे सेवा :— सृष्ट्यादिक सेवा,—ताँर आज्ञार पालन। 'शेष'-रूपे करे कृष्णेर विविध सेवन॥१०॥ सर्वरूपे आस्वाद्ये कृष्ण-सेवानन्द। सेइ बलराम—गौरसङ्गे नित्यानन्द॥११॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८-११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिकायव्यूह श्रीबलरामको मूल-सङ्कर्षण कहा जा सकता है, क्योंकि वे अपने द्वितीय स्वरूपमें अंश रूपसे 'महासङ्कर्षण' और कलास्वरूपसे 'कारणाब्धिशायी', 'गर्भोदशायी', 'पयोब्धिशायी' और 'शेष'—ये पाँच रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। वे स्वयं श्रीकृष्णकी लीलामें सहायक रूपसे रहकर महासङ्कर्षण, कारणाब्धिशायी, गर्भोदशायी और पयोब्धिशायी—इन चार रूपोंमें श्रीकृष्णकी आज्ञानुसार सृष्टिलीलादिका कार्य करते हैं। 'शेष'-नामक 'अनन्त' रूपसे श्रीकृष्णकी विभिन्न प्रकारसे सेवा करते हैं। इन सभी रूपोंमें वे ही श्रीबलराम श्रीकृष्ण-सेवानन्दका आस्वादन करते हैं। वे श्रीबलराम ही श्रीगौरसुन्दरके सङ्गी श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं॥८-११॥ अनुभाष्य—श्रीबलरामजीके पाँच रूप—१) महासङ्कर्षण, २) कारणोदशायी, ३) गर्भोदशायी, ४) क्षीरोदशायी और ५) शेषशायी॥८॥ अमृताणुकणिका—कंसने देवकीके छह पुत्रोंकी जन्म लेते ही हत्या कर दी। तब देवकीके सप्तम गर्भमें श्रीबलराम आये। उसी समय रोहिणीका गर्भ भी प्रकाशित होते देखकर वसुदेवने स्वयं ही किसी व्यक्तिके द्वारा श्रीरोहिणीको गुप्त रूपसे नन्दालयमें भेज दिया था। तब कंसके अत्याचारकी आशङ्कासे श्रीकृष्णने योगमायाको आदेश दिया (भाः १०/२/८, १३)— “देवक्या जठरे गर्भं शेषाख्यं धाम मामकम्। तत् सन्निकृष्य रोहिण्या उदरे सन्निवेशय ॥ गर्भसङ्कर्षणात् तं वै प्राहुः सङ्कर्षणं भुवि। रामेति लोकरमणाद्बलभद्रं बलोच्छ्र अर्थात् “तुम वहाँ जाकर देवकीके उदरसे मेरे द्वितीय स्वरूप या आश्रय-स्वरूप जो सङ्कर्षण हैं, जिन्हें शेष भी कहा जाता है, उन्हें बिना किसी कष्टके आकर्षणकर अलक्षित रूपसे
२५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/८-१३ ] रोहिणीके उदरमें स्थापित करो। देवकीके गर्भसे आकर्षण किये जानेके कारण रोहिणीनन्दन इस भूतलपर 'सङ्कर्षण' नामसे प्रसिद्ध होंगे, गोकुलवासियोंका आनन्द विधान करनेके कारण 'राम' एवं बलकी अधिकताके कारण अर्थात् सन्धिनीशक्तिके मूर्तिमान विग्रह होनेके कारण 'बलभद्र' के नामसे कीर्त्तित होंगे।” यहाँ बलकी अधिकताका तात्पर्य केवल शारीरिक बलसे नहीं है, अपितु उनका श्रीकृष्ण-प्रेमबल अथवा श्रीकृष्ण-प्रेमाधिक्य ही विशेषरूपसे लक्षित होता है। 'सृष्टिलीला-कार्य'-शब्दसे सृष्टिको लीला कहा गया है। (मध्य, २०/२५५-२५७) - “क्रियाशक्ति-प्रधान सङ्कर्षण बलराम। प्राकृताप्राकृत-सृष्टि करेन निर्माण॥ अङ्गद्वारे अधिष्ठाता कृष्णेर इच्छाय। गोलोक, वैकुण्ठ सृजे चिच्छक्तिद्वारा॥ यद्यपि असृज्य नित्य चिच्छक्तिविलास। तथापि सङ्कर्षण-इच्छाय ताहार प्रकाश॥” अर्थात् “श्रीसङ्कर्षणमें ही क्रिया-शक्तिकी प्रधानता है। वे उस शक्तिके द्वारा प्राकृत और अप्राकृत ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हैं। श्रीकृष्णकी लीला-निर्वाहके लिये श्रीबलराम महासङ्कर्षण रूपमें चित्-शक्तिके विलास विशेष सन्धिनी-प्रधान शुद्धसत्त्वके द्वारा वैकुण्ठादि अप्राकृत भगवद्धामसमूहको प्रकाश करते हैं। यद्यपि भगवद्धाम नित्य होनेके कारण उसकी सृष्टि सम्भव नहीं है, तथापि श्रीकृष्णकी इच्छासे इनका केवल वे प्रकाश करते हैं॥”८-११॥ श्रीनित्यानन्दतत्त्व-वर्णन करते हुए मङ्गलाचरणके सातवें श्लोककी चार श्लोकोंमें व्याख्या :- सप्तम श्लोकेर अर्थ करि चारिश्लोके। याते नित्यानन्दतत्त्व जाने सर्वलोके॥१२॥ अनुवाद-सातवें श्लोकका अर्थ मैं इन चार श्लोकोंके द्वारा बतला रहा हूँ, जिससे श्रीनित्यानन्दप्रभुके तत्त्वको सब लोग समझ पायेंगे॥१२॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सप्तम श्लोकेर अर्थ'-सातवें श्लोकमें जो कहा गया है, उसे इस अध्यायके आठसे लेकर ग्यारह श्लोकमें बतलाया है॥१२॥ श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- मायातीते व्यापिवैकुण्ठलोके पूर्णैश्वर्ये श्रीचतुर्व्यूहमध्ये। रूपं यस्योद्भाति सङ्कर्षणाख्यं तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥१३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मायासे अतीत, सर्वव्यापक वैकुण्ठलोकमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त चतुर्व्यूह तत्त्वमें जो सङ्कर्षण रूपसे विराजमान हैं, उन श्रीनित्यानन्दस्वरूप रामके प्रति मैं शरणागत होता हूँ॥१३॥ अनुभाष्य-मायातीते (गुणमयदेशबहिर्भागे) व्यापिवैकुण्ठलोके (मायारहितासङ्कुचिताखण्डाधारे) पूर्णैश्वर्ये (परिपूर्णशक्तिसमन्विते) श्रीचतुर्व्यूहमध्ये (वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध-विष्णु चतुष्टयस्य मध्ये) यस्य (नित्यानन्दरामस्य) सङ्कर्षणाख्यं रूपम् उद्भाति (विराजते), तं नित्यानन्दरामम् अहं प्रपद्ये। श्लोक-भावानुवाद-गुणमय जगत्के बाहर मायारहित व्यापक वैकुण्ठलोकमें परिपूर्ण शक्तियुक्त पाँचवाँ अध्याय | २५३
[ ५/१३-१७ वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन विष्णु चतुर्व्यूहमें जो सङ्कर्षण रूपसे विराजमान हैं, उन श्रीनित्यानन्दरामकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥१३॥ अप्राकृत-षडैश्वर्ययुक्त 'परव्योम' :- प्रकृतिर पार 'परव्योम'-नामे धाम। कृष्णविग्रह यैछे विभूत्यादि-गुणवान्॥१४॥ ब्रह्म और उसके ऊपरके लोक एवं श्रीकृष्ण तथा उनके अवतारोंके धाम :- सर्वग, अनन्त, ब्रह्म-वैकुण्ठादि धाम। कृष्ण, कृष्ण-अवतारेर ताहाञि विश्राम॥१५॥ परव्योमके ऊपरके लोकोंमें तीन प्रकारके श्रीकृष्णलोक :- ताहार उपरिभागे 'कृष्णलोक' ख्याति। द्वारका-मथुरा-गोकुल-त्रिविधत्वे स्थिति॥१६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१४-१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चौबीस तत्त्वोंसे बने प्राकृत जगत्के ऊपर परव्योम नामसे एक चिन्मय धाम है। वह धाम श्रीकृष्णस्वरूपके समान ही समस्त विभूति आदि गुणोंसे युक्त है। उस धाममें सर्वव्यापी, अनन्त ब्रह्मधाम और वैकुण्ठादि धाम विराजमान हैं। उन समस्त धामोंमें साक्षात् श्रीकृष्ण और उनके सभी अवतार विश्राम (वास) करते हैं। उस धामके ऊपरी एक तिहाई भागमें जो सर्वोत्तम चिन्मयलोक है, उसका नाम 'कृष्णलोक' है। उस कृष्णलोकमें द्वारका, मथुरा और गोकुल नामसे तीन प्रकोष्ठ हैं॥१४-१६॥ अमृताणुकणिका-विभुत्वादि गुण अर्थात् जो सर्वव्यापी, अनन्त और विभु (बृहद्) है। परव्योममें समस्त भगवत्-स्वरूपोंका पृथक्-पृथक् धाम है। प्रत्येक भगवद्धाम ही सच्चिदानन्दमय, सर्वव्यापी, अनन्त और असीम है। परव्योममें अनन्त भगवत्-स्वरूप हैं। श्रीकृष्णके समान उनके धाम भी अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं। इस अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे एक ही परव्योममें असंख्य असीम-धामोंका समावेश सम्भव हुआ है। वस्तुतः स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण जैसे एक होकर भी लीलानुसार अनेक भगवत्-स्वरूपोंमें प्रकट होते हैं और इस कारण उन भगवत्-स्वरूपोंको उनका अंश कहा जाता है, वैसे ही स्वयं-भगवान्का धाम वृन्दावन भी स्वरूपतः एक होकर भी विभिन्न भगवत्-स्वरूपोंके धामरूपमें प्रकट होता है और सभी वैकुण्ठादि-धामको भी वृन्दावनका ही अंश कहा जाता है। “वैकुण्ठादि तदंशांशं स्वयं वृन्दावन भुवि" (पद्मपुराण, पातालखण्ड, ३८/९)॥१४-१६॥ सबसे ऊपर स्तरमें व्रज, गोलोक और श्वेतद्वीप :- सर्वोपरि श्रीगोकुल-व्रजलोक-धाम। श्रीगोलोक, श्वेतद्वीप, वृन्दावन नाम॥१७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उस परव्योम-धाममें सबसे ऊपर श्रीगोकुल अर्थात् व्रजलोक धाम, श्रीगोलोक अर्थात् स्वकीयभावयुक्त श्रीकृष्णधाम, श्वेतद्वीप और वृन्दावन हैं॥१७॥ २५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१४-१७ ]
अमृतानुकणिका—(अब यहाँ व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णके निज नित्य निवास-स्थानका निरूपण कर रहे हैं) भगवान् श्रीकृष्णका वह गोकुल धाम सहस्रदल कमलके स्वरूपमें सुशोभित है। उसकी विशेषता—वह चिन्तामणि स्वरूप है, भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति वह भी सच्चिदानन्दमय, सर्वव्यापक, विभु और सर्वत्र प्रकाशमान है। उस लोकको सर्वश्रेष्ठ लोक कहा जाता है। उस लोकको यहाँ जो सबसे ऊपर कहा गया है, वह भौगोलिक स्थानके समान ऊपर-नीचे नहीं है। सर्वव्यापी, अनन्त, विभु धामसमूहकी इस प्रकार भौगोलिक स्थानोंके समान ऊपर-नीचे अवस्थिति नहीं हो सकती। महिमाकी अधिकता अथवा न्यूनताके विवेचनसे ऊपर-नीचे कहा गया है। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृतम् (२/५/८७-८८) में लिखा है— “सुखक्रीड़ाविशेषोऽसौ तत्रत्यानाञ्च तस्य च। माधुर्यान्त्यावधिं प्राप्तः सिध्येत्तत्रोचितास्पदे॥ अहो किल तदेवाहं मन्ये भगवतो हरेः। सुगोप्यभगवत्तायाः सर्वसार-प्रकाशनम्॥” अर्थात् “लौकिक बन्धुके समान प्रेमका आधार वह गोलोकधाम ही है। वहाँ श्रीकृष्ण और उनके समस्त परिकरोंके द्वारा परम माधुर्यकी अन्तिम सीमातक पूर्ण रूपसे सुखमय विहार प्रकटित होता है। अहो! अधिक क्या कहूँ! मैंने यही निश्चित किया है कि भगवान् श्रीहरिने अपनी परम गोपनीय भगवत्ताका समस्त सार उस गोलोकमें ही प्रकटित किया है।” इस श्लोककी टीकामें श्रीसनातन गोस्वामीने कहा है—‘अहो' विस्मयके अर्थमें है तथा ‘किल’ शब्द निश्चयके अर्थमें है। मैं निश्चयपूर्वक कह रहा हूँ कि श्रीहरिके रूप-गुण-विनोदादि जो अन्यत्र विशेषरूपसे प्रकाशित नहीं हैं, उस गोलोकमें ही अपनी अन्तिम सीमा तक प्रकाशमान हैं। अथवा उस गोलोकमें ही श्रीभगवान्ने अपनी परम रहस्यपूर्ण भगवत्ताको अर्थात् परम ऐश्वर्यके सर्वश्रेष्ठ सारको प्रकाशित किया है। अन्यथा उस गोलोककी सर्वोच्च स्थिति असङ्गत होती। उसे कुछ लोग महावैकुण्ठ लोक भी कहते हैं। इस विषयमें किसीको कोई शङ्का उपस्थित ना हो, इसके लिये कहा है कि वह गोकुल नामक धाम है, जहाँ गोपावास अर्थात् गोप-गोपियोंका निवास स्थान है। इसी सन्दर्भमें श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धमें कहा है—'भगवान् गोकुलेश्वरः' अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलके ईश्वर, गोकुलपति हैं। भगवान् श्रीकृष्ण जहाँ अपने पिता नन्द महाराज तथा माता यशोदा आदिके साथ सदा निवास करते हैं, ऐसे महान् अन्तःपुरको गोकुल धाम कहा गया है। उसी गोकुल नामक नित्यधामका कर्णिकार ही षट्कोणमयी श्रीकृष्णकी निवास भूमि है। उसके ही भीतर प्रेमानन्द-महानन्द-रसमें मग्न होकर, अखिल जीव-जगत्के अद्वय और अव्यय बीजस्वरूप श्रीश्रीराधाकृष्ण विराज करते हैं। वे अपने अंश-सम्भूत कोटि-कोटि सखी ओर सखागणके द्वारा सदा सहस्ररूपोंमें सेवित और प्रमोदित होते हैं। वहाँ, उस पद्म-कर्णिकाको परिवेष्टित करते हुए किञ्जल्क अर्थात् लाखों पद्मकेशर और सूक्ष्म पँखुड़ियोंके समान श्रीकृष्णके अंशस्वरूप परम प्रेमीभक्त-सजातीय गोपोंकी आवासभूमि है ओर वह प्राचीरकी भाँति चारों ओर सुशोभित हो रही है। वे गोप-गोपीगण सर्वदा श्रीकृष्णसेवामें तत्पर होकर लाखों कामधेनुओं और बछड़ोंके साथ अपने-अपने स्थानमें सदा
पाँचवाँ अध्याय | २५५
[ ५/१४-१७
आनन्दसे वास करते हैं। उस कमलके विस्तृत दलसमूह ही श्रीकृष्णप्रेयसी श्रीराधा आदि ब्रजाङ्गनाओंके उपवन-स्वरूप धामविशेष हैं। चित्-शक्तिसे प्रकाशित श्रीकृष्णलोक विविध आनन्दमय वैचित्र्य-विकाससे विभिन्न तरु, लता, पत्र, पुष्प, वन, सरोवर, नदी, पर्वत, पशु, पक्षी और पतङ्गादि शोभा-सम्पत्तिसे सुसज्जित होकर श्रीकृष्णका सुखसाधन करता है। परन्तु हमारे इन्द्रिय-ज्ञानके द्वारा गोचर मायिक जगत्की अनित्य शोभा-सौन्दर्यके समान वह सब चित्-वैचित्र्य परिणामी (नश्वर) नहीं है, अपितु अपरिणामी और नित्य नव-सुखप्रद है। वहाँ सभी वस्तुएँ ही चिन्मय, चिद्धर्म-समन्वित हैं और वे सभी सब प्रकारसे अपने नाथ श्रीकृष्णके सेवा-सुखमें रत हैं। श्रीकृष्णके एकात्म-रूप स्वयंप्रकाश श्रीबलदेव ही निजांशसे उस श्रीधाम-स्वरूपमें उनकी सेवा करते हैं। वहाँ कालका प्रवेश नहीं है। अनादि-अनन्त आनन्द-मुहूर्त चिरस्थिर-भावसे श्रीकृष्णसेवामें तन्मय है। वहाँ कभी भी भूत-वर्तमान-भविष्यरूपमें काल विभक्त नहीं है। किन्तु श्रीभगवान्की अचिन्त्य शक्तिसे भूत-वर्तमान-भविष्यकी जो आनन्दके लिये उपयोगिता है, वह श्रीकृष्ण-सुख-साधनकी सहायिका सेविकारूपमें सदा वर्तमान है। वहाँ कुसुम हैं, कुसुममें कीट नहीं हैं। वहाँ चन्द्र-सूर्यादि प्रकाश वितरण नहीं करते, वह चिदानन्दमय स्वप्रकाशित धाम है। ब्रह्मसंहिता (५/५६)— “श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो द्रुमा भूमिचिन्तामणिगणमयी तोयममृतम्। कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखी चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च॥ स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान् निमेषार्द्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः। भजे श्वेतद्वीपं तमहमिह गोलोकमिति यं विदन्तस्ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये॥” अर्थात् “जहाँ अप्राकृत लक्ष्मीगण कान्ताएँ हैं, परमपुरुष श्रीकृष्ण ही एकमात्र कान्त हैं, वृक्षमात्र ही चिन्मय-कल्पतरु हैं, भूमिमात्र ही चिन्तामणि अर्थात् चिन्मय मणियाँ हैं, जलमात्र ही अमृत है, कथामात्र ही संगीत है, गमनमात्र अर्थात् चलना-फिरना ही नृत्य है, वंशी-प्रियसखी है, ज्योति-चिदानन्दमय है, परम-चित्पदार्थमात्र ही आस्वादनीय या भोग्य है, जहाँ करोड़ों-करोड़ों सुरभी-गायोंसे चिन्मय महाक्षीरसमुद्र निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, वहाँ भूत और भविष्यत् रूप कालका खण्डत्व नहीं है—अखण्ड नित्यकाल वर्तमान है। इसलिये वहाँ निमेषार्द्ध काल (पलक झपकनेका आधा काल) भी अतीत नहीं होता। उसी श्वेतद्वीपरूप परमपीठका मैं भजन करता हूँ। उसी धामको इस जगत्में कोई-कोई विरले अल्पसंख्यक साधुजन ही गोलोक नामसे जानते हैं।” उस षट्कोण गोकुलके बाहर अवस्थित चारों ओर श्वेतद्वीप नामका अद्भुत चतुष्कोण युक्त स्थान है। श्वेतद्वीप—चार खण्डोंमें चारों ओरसे विभक्त है। उसके एक-एक भागमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका धाम है। उन चारों धामोंमें—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ हैं और उन पुरुषार्थोंके हेतुस्वरूप मन्त्रमय ऋक्, यजु, साम और अथर्व—ये चारों
२५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१४-१८ ]
वेद सुशोभित हैं। आठ दिशाएँ एवं उर्द्ध और अधः क्रमसे दस दिशाओंमें दस शूल निबद्ध हैं तथा आठों दिशाओंमें महापद्म, पद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द और नील—ये आठ रत्न हैं। मन्तर्रूपी दश दिक्पाल दस दिशाओंमें वर्तमान हैं। श्यामवर्ण, गौरवर्ण, रक्तवर्ण और शुक्लवर्णके पार्षदसमूह तथा विमला आदि अद्भुत शक्तियोंके समुदायसमूह समस्त दिशाओंमें शोभित हो रहे हैं।
गोकुल और श्वेतद्वीपकी विभिन्न सीमा निर्दिष्ट होनेपर भी गोकुल अर्थात् व्रजलोक धामको गोलोक अर्थात् स्वकीयभावयुक्त श्रीकृष्णधाम, श्वेतद्वीप और वृन्दावन भी कहते हैं। (लघुभागवतामृतम्—पूर्व खण्ड ४९८)—“यत्तु गोलोकनाम स्यात् तच्च गोकुल-वैभवम्।” अर्थात् गोलोककी अपेक्षा गोकुलकी महिमा अधिक है, इसलिये गोलोकको गोकुलका वैभव कहा गया है॥ १७॥
गोलोक-वृन्दावन सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णभिन्न धाम :— सर्वग, अनन्त, विभु, कृष्णतनुसमा। उपर्युधो व्यापियाछे, नाहिक सीमा॥ १८॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी दिव्य देहके समान ही यह धाम सर्वव्यापी, अनन्त और विभु है। ऊपर-नीचे इसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है॥ १८॥ अनुभाष्य—श्रीजीव गोस्वामी कृत श्रीकृष्णसन्दर्भ (१०६ संख्या)में— “अथ कतमत्तत् पदं यत्रासौ विहरति? तत्रोच्यते—‘या यथा भुवि वर्त्तन्ते पुर्यो भगवतः प्रियाः। तास्तथा सन्ति वैकुण्ठे तत्तल्लीलार्थमादृताः॥’ इति स्कान्दवचनानुसारेण वैकुण्ठे यत्स्थानं वर्त्तते, तत्तदेवेति मन्तव्यम्। तच्चाखिलवैकुण्ठोपरिभाग एव। ××× स्वायम्भुवागमे च स्वतन्त्रतयैव सर्वोपरि तत्स्थानमुक्तम्; यथा ईश्वरदेवीसंवादे चतुर्दशाक्षरध्यानप्रसङ्गे पञ्चाशीतितमे पटले—‘नानाकल्पलताकीर्णं वैकुण्ठं व्यापकं स्मरेत्। अधः साम्यं गुणानाञ्च प्रकृतिः सर्वकारणम्॥” ×× तस्माद् ‘या यथा भुवि वर्त्तन्ते’ इति न्यायाच्च स्वतन्त्र एव द्वारकामथुरागोकुलात्मकः श्रीकृष्णलोकः स्वयंभगवतो विहारास्पदत्वेन भवति सर्वोपरीति सिद्धम्। अतएव वृन्दावनं गोकुलमेव सर्वोपरि विराजमानं गोलोकत्वेन प्रसिद्धम्। ब्रह्मसंहितायां—‘सहस्रपत्रं कमलं गोकुलाख्यं महत् पदम्। ×× चतुरस्रं तत्परितः श्वेतद्वीपाख्यमद्भुतम्॥” ×× तस्य श्रीकृष्णस्य धाम नन्दयशोदाभिः सह वासयोग्यं महान्तःपुरमर्, तस्य स्वरूपमाह—अनन्तस्य श्रीबलदेवस्यांशात् सम्भवो नित्याविर्भावो यस्य तत्। तथा तन्त्रेण तदपि बोध्यते—अनन्तोऽंशो यस्य तस्य श्रीबलदेवस्यापि सम्भवो निवासो यत्र तदिति। ×× अथ गोकुलावरण्यान्याह—तद्वहिश्चतुरस्रं तस्य गोकुलस्य बहिः सर्वतश्चतुरस्रं चतुष्कोणात्मकं स्थलं श्वेतद्वीपाख्यम्, इति तदंशे गोकुलमिति नाम-विशेषाभावात्। किन्तु चतुरस्राभ्यन्तर-मण्डलं वृन्दावनाख्यं, बहिर्मण्डलं केवलं श्वेतद्वीपाख्यंः ज्ञेयं; गोलोक इति यत्पर्यायः। ×× ब्रह्मलोकः वैकुण्ठाख्यः। ×× नारद-पञ्चरात्रे विजयाख्याने—‘तत्सर्वोपरि गोलोके श्रीगोविन्दः सदा स्वयम्। विहरेत् परमानन्दी गोपीगोकुलनायकः॥’ इति। तदेवं सर्वोपरि श्रीकृष्णलोकोऽस्तीति सिद्धम्। स च लोकस्तत्तल्लीलापरिकरभेदेनांशभेदात् द्वारकामथुरागोकुलाख्यस्थान-त्रयात्मक इति निर्णीतम्। अन्यत्र तु भुवि प्रसिद्धान्येव तत्तदाख्यानि स्थानानि तद्रूपत्वेन श्रूयन्ते, तेषामपि वैकुण्ठान्तरवत् प्रपञ्चातीतत्व- नित्यत्वालौकिकरूपत्व-भगवत्प्रियास्पदत्वकथनात्।” भगवान् कैसे धाममें विचरण करते हैं, इसका यहाँ विवेचन किया जा रहा है—‘इस प्रपञ्चमें जिस प्रकार भगवान्की प्रिय पुरियों (द्वारका-मथुरा-गोकुल) की अवस्थिति है, उसी प्रकार उनकी प्रिय तीन पुरियाँ उनकी उन-उन लीलाओंके उद्देश्यसे वैकुण्ठमें भी विराजमान
पाँचवाँ अध्याय | २५७
[ ५/१४-२० हैं' - स्कन्दपुराणके इस वाक्यके अनुसार वैकुण्ठमें जो सब स्थान विद्यमान हैं, वे-वे स्थान प्रपञ्चमें भी हैं- इस प्रकार जानना होगा। प्राकृत सृष्टिके ऊपरी भागमें सभी वैकुण्ठ लोकोंका स्थान है। स्वायम्भुवतन्त्रमें भी - स्वतन्तरूपसे सबके ऊपर वैकुण्ठका स्थान है- यह कहा गया है। इस ग्रन्थमें देवी-महेश्वर संवादमें चतुर्दश-अक्षरध्यानके प्रसङ्गमें कहा गया है- 'मन्त्रका जप करते हुए साधक नाना कल्पवृक्ष-लताओंसे व्याप्त, व्यापक, अखण्ड वैकुण्ठका स्मरण करेंगे। उस वैकुण्ठके नीचे जड़-जगत्की कारणस्वरूप सत्त्व-रज-तमगुणोंकी साम्यावस्थावाली प्रकृति अवस्थित है।' इसलिये 'जिस प्रकारसे पृथ्वीपर हरिधामसमूह वर्तमान हैं, वहाँपर भी उसी प्रकारसे हैं' - इस न्यायके अनुसार भी द्वारका, मथुरा और गोकुल धामवाले श्रीकृष्णलोककी स्वतन्त्रताकी ही उपलब्धि होती है, स्वयं भगवान्का विहारक्षेत्र होनेके कारण ये धाम सबसे ऊपर हैं, यह सिद्ध होता है। इसलिये वृन्दावन-गोकुल ही सर्वोपरि विराजमान हैं और ये गोलोक नामसे प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मसंहितामें भी कहा गया है- 'गोकुल नामक श्रीकृष्णलोक हजार पत्रोंसे युक्त कमलके सदृश है। उसके बाहर चारों ओर चतुर्भुजाकार 'श्वेतद्वीप' नामक अद्भुत धाम है।' उस श्रीकृष्णके धाममें नन्द-यशोदादिके साथ वासयोग्य श्रीकृष्णका महा-अन्तःपुर है। गोकुलका स्वरूप इस प्रकार है- श्रीबलदेव प्रभुके अंश अनन्तसे गोकुलका आविर्भाव हुआ है और यह नित्य धाम है। तन्त्रशास्त्रसे भी ऐसा ही समझा जाता है। अनन्तदेव जिनके अंश हैं, उन श्रीबलदेव प्रभुका जहाँ जन्म और निवासस्थान है, वही भगवद्धाम है। गोकुलके आवरणोंका वर्णन इस प्रकार है-उस गोकुलके बाहर चारों दिशाओंमें स्थित एक चतुर्भुजाकार स्थल है जिसे 'श्वेतद्वीप' कहते हैं, इस अंश श्वेतद्वीपको गोकुल नहीं कहा जाता है। किन्तु चतुष्कोणात्मक स्थलका भीतरी मण्डल 'वृन्दावन' नामसे विख्यात है और केवल बाहरी मण्डल 'श्वेतद्वीप' नामसे जाना जाता है तथा इसका दूसरा नाम 'गोलोक' है। 'ब्रह्मलोक' शब्दसे 'वैकुण्ठ' को समझना चाहिये। नारद-पञ्चरात्रमें विजयाख्यान-प्रसङ्गमें कहा गया है- 'वैकुण्ठमें सबसे ऊपरी भागमें गोलोकमें सदा स्वयं श्रीगोपीनाथ गोकुलाधिपति श्रीगोविन्ददेव परमानन्दसे विहार करते हैं। इसलिये सभी लोकोंके ऊपर श्रीकृष्णलोककी स्थिति सिद्ध होती है। उस श्रीकृष्णलोकमें ही उन-उन लीला और परिकरभेदसे और अंशभेदसे 'द्वारका', 'मथुरा' और 'गोकुल' नामक तीन विशिष्ट स्थान हैं, यही निर्णीत हुआ है। अन्यत्र यह कहा गया है-प्रपञ्चमें पृथ्वीमें उन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध स्थान उन्हींके समान हैं, ऐसा सुना जाता है, क्योंकि वे भी वैकुण्ठके समान प्रपञ्चसे अतीत, नित्य, अलौकिक रूपविशिष्ट और भगवान्के नित्य प्रिय कहे जानेके कारण इन्हें वैकुण्ठमें स्थित श्रीकृष्णलोकसे अभिन्न जानना चाहिये ॥ १४-१८ ॥ वह स्वप्रकाशित, श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रपञ्चमें अवतीर्ण हुआ है :- ब्रह्माण्डे प्रकाश ताँर कृष्णेर इच्छाय। एकइ स्वरूप ताँर, नाहि दुइ काय ॥ १९॥ भोगनेत्रोंसे प्रपञ्चके समान दिखनेपर भी भक्तिनेत्रोंसे श्रीकृष्णविलासक्षेत्र चिन्मयी चिन्तामणि-भूमि :- चिन्तामणि-भूमि, कल्पवृक्षमय वन। चर्मचक्षे देखे ताँरे प्रपञ्चेर सम ॥ २० ॥ २५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१९-२२ ] प्रेमनेत्रे देखे ताँर स्वरूप प्रकाश। गोप-गोपीसङ्गे याँहा कृष्णेर विलास ॥ २१ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १९-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य - श्रीकृष्णकी इच्छासे वह चिन्मय व्रजधाम जड़ ब्रह्माण्डमें प्रकाशित होकर भी एक ही स्वरूपसे विराजमान होता है। कोई-कोई व्यक्ति यह विचार रखते हैं कि परव्योममें स्थित गोलोकादि धाम प्रपञ्चमें प्रकटित व्रजधामसे भिन्न है, किन्तु यह सत्य नहीं है। वे एक ही स्वरूप हैं, एक ही समयमें परव्योम और प्रपञ्चमें प्रकाशित होकर विराजमान हैं। प्रपञ्चमें प्रकाशित व्रजमें भी भूमि चिन्तामणि है, वनोंके वृक्ष कल्प-वृक्ष हैं, उसका स्वरूप-प्रकाश प्रेम-नेत्रोंके द्वारा ही दिखलायी देता है, चर्म-चक्षुओंके द्वारा वह प्रपञ्चके समान ही प्रतीत होता है। गोप-गोपीके साथ श्रीकृष्ण यहाँ सदा विलास करते हैं॥ १९-२१॥ अमृतानुकणिका - प्रश्न हो सकता है- भौतिक ब्रह्माण्ड तो सीमाबद्ध और क्षुद्र है तथा उसके भी एक क्षुद्र अंशमें व्रजलोक प्रकटित हुआ है, तब व्रजलोक भी क्षुद्र और सीमाबद्ध होगा, परन्तु यह सत्य नहीं है। श्रीकृष्ण बाल्यलीलामें एक छोटे बालकके रूपमें दिखते हैं, परन्तु स्वरूपतः वे जैसे विभु- सर्वव्यापक हैं (यथा माँ यशोदाका स्तनपान करते हुए अपने मुखमें समस्त लोक दिखलाये थे), वैसे ही व्रजलोक धाम ब्रह्माण्डके एक क्षुद्र अंशमें प्रकट होनेपर सीमाबद्ध दिखनेपर भी विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, यह श्रीगोकुलकी अचिन्त्य शक्तिका प्रभावसे ही सम्भव हुआ है॥१९॥ गोलोकमें गोविन्द :- ब्रह्मसंहिता (५/२५)- चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष- लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्। लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २२ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - लाखों-लाखों कल्पवृक्षोंसे परिवेष्टित, चिन्तामणिसमूहसे निर्मित स्थानमें, कामधेनु गायोंका पालन करनेवाले तथा लाखों लक्ष्मियोंके द्वारा सम्भ्रम भावसे सेवित उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥२२॥ अनुभाष्य - कल्पवृक्षलक्षावृतेषु (कल्पवृक्षाणां प्रार्थनोचिताभीष्टफलप्रदवृक्षाणां लक्षैः असंख्यैः आवृतेषु मण्डितेषु) चिन्तामणिप्रकरसद्मसु (चिन्तामणीनाम् अभीष्टफलदानसमर्थरत्नानां प्रकरेण समूहेन रचितानि सद्मानि हर्म्याणि तेषु) सुरभीः (कामधेनुः) अभिपालयन्तम् (अभि सर्वतोभावेन गोपोचित-गो-परिचर्याप्रकारेण पालयन्तं) लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं (लक्ष्मयः गोपरामाः तासां सहस्राणां शतैः सम्भ्रमेण सेव्यमानं) तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-प्रार्थनाके अनुरूप असंख्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षोंसे मण्डित, चिन्तामणि अर्थात् अभीष्ट फलदान करनेमें समर्थ रत्नोंसे निर्मित भवनोंसे युक्त स्थानमें पाँचवाँ अध्याय | २५९
[ ५/२२-२५ कामधेनुओंका पालन करनेवाले अर्थात् गोपोचित परिचर्या करनेवाले और लाखों लक्ष्मियों (गोपियों) के द्वारा सम्भ्रम भावसे सेवित आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥२२॥ आदि चतुर्व्यूह :- मथुरा-द्वारकाय निजरूप प्रकाशिया। नानारूपे विलसये चतुर्व्यूह हैञा॥२३॥ सभी चतुर्व्यूहोंके अंशी :- वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध। सर्वचतुर्व्यूह-अंशी, तुरीय, विशुद्ध॥२४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२३-२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उस कृष्णधामके मथुरा और द्वारका प्रकोष्ठमें श्रीकृष्ण, वासुदेव-सङ्कर्षण- प्रद्युम्न-अनिरुद्ध-इस आदि-चतुर्व्यूहको प्रकाशितकर अनेक प्रकारसे विलास करते हैं। द्वारकामें जो चतुर्व्यूह है, वह अन्य सभी चतुर्व्यूहोंका अंशी है और विशुद्ध-चिन्मय है॥२३-२४॥ अमृतानुकणिका-'वासुदेव'-देवकी-वसुदेवके पुत्र; ये द्वारका-चतुर्व्यूहके प्रथमव्यूह और व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके प्रकाशरूप हैं। व्रजेन्द्रनन्दन द्विभुज हैं और उनका गोपवेश एवं गोप-अभिमान है। वासुदेव कभी द्विभुज और कभी चतुर्भुज होते हैं; उनका क्षत्रिय वेश एवं क्षत्रिय अभिमान है। 'सङ्कर्षण'-श्रीबलराम जिस स्वरूपमें द्वारका-मथुरामें लीला करते हैं, उसे सङ्कर्षण कहते हैं; देवकीके गर्भसे आकर्षणकर रोहिणीके गर्भमें स्थापित होनेके कारण उनको सङ्कर्षण कहते हैं। ये द्वारका-चतुर्व्यूहके द्वितीय व्यूह हैं। जो श्रीबलराम स्वयंरूपमें स्वयंरूप श्रीकृष्णकी लीलामें सहायता करते हैं, वही श्रीबलराम ही सङ्कर्षण रूपमें द्वारका-मथुरामें वासुदेवकी लीलामें सहायक हैं। वासुदेवको श्रीकृष्ण भी कहा जाता है, उसी प्रकार सङ्कर्षणको बलराम भी कहा जाता है। वर्ण और अङ्ग-सन्निवेशमें व्रजविलासी बलराम और द्वारका-मथुरा-विलासी सङ्कर्षणमें कोई पार्थक्य नहीं है-दोनों ही द्विभुज और श्वेत वर्ण हैं, किन्तु उनके भावोंका पार्थक्य है-व्रजमें उनका गोपभाव और द्वारका-मथुरामें क्षत्रियभाव है। अप्रकटलीलामें गोकुल, मथुरा और द्वारका, इन तीन धामोंमें श्रीकृष्ण और श्रीबलरामके पृथक् पृथक् विग्रह नित्य विराजमान होते हैं, किन्तु प्रकटलीलामें, एक धाममें जब वे लीला करते हैं, तब अन्य धामोंमें कोई भी प्रकटरूप नहीं होता है। 'प्रद्युम्न'-श्रीरुक्मिणी देवीके गर्भजात श्रीकृष्णके पुत्र हैं। श्रीकृष्ण ही आश्रयरूपमें वात्सल्यरस आस्वादनके निमित्त प्रद्युम्न नामसे निज-पुत्र-अभिमानसे नित्य द्वारका लीला करते हैं। इसलिये श्रीप्रद्युम्न श्रीकृष्णके आविर्भाव-विशेष हैं, ये द्वारका-चतुर्व्यूहके तृतीय व्यूह हैं। 'अनिरुद्ध'-ये श्रीकृष्णके पौत्र हैं, रुक्मीकी कन्या रुक्मवतीके गर्भसे प्रद्युम्नके पुत्र हैं। प्रद्युम्नके समान ये भी श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं; ये द्वारका-चतुर्व्यूहके चतुर्थ व्यूह हैं॥२३-२४॥ गोकुल, मथुरा और द्वारकामें द्विभुजरूपमें लीला :- एइ तिन लोके कृष्ण केवल लीलामय। निजगण लञा खेले अनन्त समय॥२५॥ २६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/२५-२८ ] अनुवाद-इन्हीं तीन लोकोंमें श्रीकृष्ण अपने नित्य परिकरोंके साथ अनादि कालसे अनन्त कालतक केवल लीलाओंमें ही रत हैं अर्थात् वे सृष्टि-पालन-संहारादि कोई भी कार्य नहीं करते हैं॥ २५॥ अनुभाष्य-‘तिन लोके’—गोकुल, मथुरा और द्वारकामें॥ २५॥ परव्योम-वैकुण्ठमें चतुर्भुज-नारायणरूपमें आधिपत्य :- परव्योम-मध्ये करि' स्वरूप-प्रकाश। नारायणरूपे करेन विविध विलास॥ २६॥ अनुवाद-परव्योममें श्रीकृष्ण नारायण रूपमें अपना प्रकाश करते हैं और नाना प्रकारके विलास करते हैं॥ २६॥ स्वयंरूप श्रीकृष्ण-द्विभुज, ऐश्वर्यविलास नारायण-चतुर्भुज :- स्वरूपविग्रह कृष्णेर केवल द्विभुज। नारायणरूपे सेइ तनु चतुर्भुज॥ २७॥ शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म, महैश्वर्यमय। श्री-भू-नीला-शक्ति याँर चरण सेवय॥ २८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७-२८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णका स्वरूपविग्रह सदा द्विभुज है। परव्योममें उनका स्वरूप-प्रकाश नारायणरूपमें चतुर्भुज है और श्री, भू एवं नीला, ये तीन शक्तियाँ सदा उनकी सेवा करती हैं। (श्रीसम्प्रदायके वैष्णवोंके ग्रन्थोंमें इन तीन प्रकारकी शक्तियोंका विशेष वर्णन है)॥ २७-२८॥ अनुभाष्य-‘श्री-भू-नीला’—नीलाको बङ्गालमें कोई-कोई 'लीलाशक्ति' कहते हैं। ये तीनों शक्तियाँ वैकुण्ठमें नारायणकी सेवामें विराजमान रहती हैं। जब तीन आल्वार् (सिद्ध महापुरुष)—भूतयोगी, सरयोगी और भ्रान्तयोगीने गेहलीग्राममें रात्रिके समय एक ब्राह्मणके घरमें आश्रय ग्रहण किया था, तब नारायणने उन्हें साक्षात् दर्शन दिये थे। 'प्रपन्नामृत'–७७/६१-६२ श्लोकोंमें उन्होंने नारायणका वर्णन इस प्रकार किया है— “ताक्ष्र्याधिरूढं तड़िदम्बुदाभं लक्ष्मीधरं वक्षसि पङ्कजाक्षम्। हस्तद्वये शोभितशङ्खचक्रं विष्णुं ददृशुर्भगवन्तमाद्यम्॥ आजानुबाहुं कमनीयगात्रं पार्श्वद्वये शोभितभूमिनीलम्। पीताम्बरं भूषणभूषिताङ्गं चतुर्भुजं चन्दनरुषिताङ्गम्॥” अर्थात् “गरुड़की पीठपर बैठे हुए चतुर्भुज आदिपुरुष भगवान् विष्णुका विद्युत-समन्वित मेघवर्णका कमनीय शरीर है। उनके कमलके समान नेत्र हैं, घुटनोंतक लम्बी भुजायें हैं और उनके दो हाथोंमें शङ्ख एवं चक्र शोभायमान हो रहे हैं। उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ है, उनके चन्दनलेपित श्रीअङ्ग विभिन्न अलङ्कारोंसे विभूषित हैं और वक्षःस्थलपर 'लक्ष्मी' (श्री) तथा दोनों ओर 'भू' और 'नीला' अवस्थित हैं।” सीतोपनिषदि— “महालक्ष्मीर्देवेशस्य भिन्नाभिन्नरूपाचेतनाऽचेतनात्मिका। सा देवी त्रिविधा भवति—शक्त्यात्मना इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति। इच्छाशक्तिस्त्रिविधा भवति—श्री-भू-नीलात्मिका।” पाँचवाँ अध्याय | २६१
अर्थात् “परमेश्वरकी भिन्न-अभिन्नरूपा, चेतन-अचेतनात्मिका महालक्ष्मी अपनी शक्तिके द्वारा इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और साक्षात्शक्ति रूपोंमें तीन प्रकारकी हैं। इच्छाशक्ति पुनः श्री, भू और नीला भेदसे तीन प्रकारकी हैं।” श्रीमध्वाचार्य स्वकृत गीता-टीका (श्लोक ४/६)में— “महदादेस्तु माता या श्री-भू-नीलेति कल्पिता। विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुर्जॊऽपि हि। जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढ़-चेतसाम्॥” अर्थात् “महत्तत्त्वादिकी माता जो श्री-भू-नीलारूपमें निरूपित हैं और उन्हें विमोहनकारिणी ‘दुर्गा’ भी कहा जाता है। उनके साथ अजन्मा श्रीविष्णु भी अपने चित्-बलके प्रभावसे मूढ़ व्यक्तियोंको जन्म ग्रहण करनेवाले प्रतीत होते हैं।” व्यासयोग ७/१४ में— “श्रीभूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी। तच्छक्त्यनन्तांशहीनाथापि तस्याश्रयात् प्रभोः॥ अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलापि हि। तेषां दुरत्ययाप्येषा बिना-विष्णुप्रसादतः॥” अर्थात् “श्री-भू-दुर्गा—इन तीन रूपोंमें भिन्ना जो वैष्णवी (विष्णुकी अंशरूपा) महामाया हैं, वे अनन्तांश-हीन होनेपर भी विष्णुके आश्रयमें होनेके कारण उनकी कलाभाग अर्थात् अंशकी अंश शक्ति भी अनन्त ब्रह्मा-रुद्रादिके पास नहीं है। विष्णुके अनुग्रहके बिना ब्रह्मा-रुद्रके लिये भी उस मायाका अतिक्रम करना दुष्कर है।” गीता १४/३ मध्वभाष्य— “महद्ब्रह्म प्रकृतिः। सा च श्री-भू-दुर्गेति भिन्ना। उमा-सरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः॥” अर्थात् “महद्-ब्रह्मको प्रकृति भी कहते हैं। वही प्रकृति पुनः श्री, भू और दुर्गा, इन तीन भिन्न रूपोंसे जानी जाती हैं। सरस्वती, उमादि भी उस शक्तिके अंशसे युक्त अन्य जीवमात्र हैं।” तथा च कार्ष्यायण-श्रुतिः— “श्रीभूर्दुर्गा महती तु माया, सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिका च। उमा वागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः॥” इति। अर्थात् “श्री, भू और दुर्गा, इन रूपोंमें महामाया ब्रह्माण्डोंको प्रसव करनेवाली और जगत्में बाँधनेवाली हैं। उमा, वाक् (सरस्वती) आदि अन्य जीव उनके अंश हैं और महामायाके प्रभावसे ही उनकी कीर्त्ति शास्त्रोंमें गायी गयी है।” श्रीजीव गोस्वामीकृत भगवत्सन्दर्भ (८० संख्यामें)— “यथा पाद्मे-‘नित्यं तद्रूपमीशस्य परं धाम्नि स्थितं शुभम्। नित्यं सम्भोग्यमीश्वर्या श्रिया भूम्या च संवृतम्॥’ नामस्वरूपयोर्निरूपणेन महासंहितायामपि विविक्तं; तत्त्रिशक्तिः-श्रीभूर्दुर्गेति या भिन्ना जीवमाया महात्मनः। आत्ममाया तदिच्छा स्यात् गुणमया जड़ात्मिका॥” और (२२ संख्यामें)— ‘श्रीरत्र जगत्पालनशक्तिः, भूस्तत्सृष्टिशक्तिः, दुर्गा तत्प्रलयशक्तिः। तत्तद्रूपेण या भेदं प्राप्ता, सा जीवविषया तच्छक्तिर्जीवमायेत्युच्यते। पाद्मे श्रीकृष्णसत्यभामा-संवादे-‘अहमेव त्रिधा भिन्ना तिष्ठामि त्रिविधैर्गुणैः’ इत्येतद्वाक्यानन्तरं
५/२८-३३ ] 'ततः सर्वेऽपि ते देवाः श्रुत्वा तद्वाक्य-चोदिताः। गौरीं लक्ष्मीं धराञ्चैव प्रणेमुर्भक्तितत्पराः॥' इति।" अर्थात् “परमधाममें रहनेवाले ईश्वरका वह रूप नित्य, शुभ और श्री-भू-नीलाशक्तिसे संवृत होकर नित्य सम्भोग्य है। महासंहितामें नाम और स्वरूपके निरूपणके द्वारा तीन शक्तियोंका विवेचन हुआ है; जैसे, - महात्मा श्रीभगवान्की (१) जीवमाया, वह 'श्री', 'भू' और 'दुर्गा', इन तीन स्वरूपोंसे भिन्न है। उनकी (२) आत्ममाया उनकी इच्छा है और (३) गुणमाया जड़ात्मिका है।" 'श्री' जगत्पालन शक्ति है, 'भू' उनकी सृष्टि शक्ति है और 'दुर्गा' उनकी प्रलय शक्ति है। इन तीन रूपोंमें जो भेदको प्राप्त हो रही है, उस जीव विषयक शक्तिको 'जीवमाया' कहा जाता है। पद्मपुराणमें श्रीकृष्ण-सत्यभामा संवादमें- 'मैं ही तीन प्रकारके भेदोंमें विभक्त, तीन प्रकारके गुणोंके सहित वर्तमान रहती हूँ।' इस वाक्यके बादमें कहा गया है- 'तब सब देवताओंने यह सुनकर उनके वाक्यके द्वारा प्रेरित होकर गौरी (दुर्गा), लक्ष्मी (श्री) और पृथ्वी (भू) को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।'॥२८॥ श्रीकृष्ण केवल लीलामय होनेपर भी जीवोंके प्रति अहैतुक-कृपामय :- यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ामात्र धर्म। तथापि जीवेर कृपाय करे एक कर्म॥२९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केवल क्रीड़ामात्र ही उनका एकमात्र धर्म होनेपर भी श्रीकृष्ण जीवोंके प्रति कृपावशतः जीवनिस्ताररूप एक लीला करते हैं॥२९॥ चतुर्विध मुक्तिके द्वारा जीवोंका उद्धार-साधन अथवा वैकुण्ठमें लाना :- सालोक्य-सामीप्य-सार्ष्टि-सारूप्य-प्रकार। चारि मुक्ति दिया करे जीवेर निस्तार॥३०॥ अनुवाद-सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सारूप्य, ये चार प्रकारकी मुक्ति देकर श्रीकृष्ण जीवोंका निस्तार करते हैं॥३०॥ निर्विशेष ब्रह्मज्ञानीकी वैकुण्ठके बाहर स्थिति :- ब्रह्मसायुज्य-मुक्तेर ताँहा नाहि गति। वैकुण्ठ-बाहिरे हय तांसबार स्थिति॥३१॥ अनुवाद-ब्रह्म-सायुज्य मुक्ति पानेवालोंकी वहाँ गति नहीं है। उन सबकी स्थिति वैकुण्ठसे बाहर ही है॥३१॥ परव्योमके बाहरमें चिन्मय ब्रह्मलोक :- वैकुण्ठ-बाहिरे एक ज्योतिर्मय मण्डल। कृष्णेर अङ्गेर प्रभा, परम उज्ज्वल॥३२॥ मायातीत होनेपर भी वह चिद्विलासहीन, केवल चिन्मात्र :- 'सिद्धलोक' नाम तार प्रकृतिर पार। चित्स्वरूप, ताँहा नाहि चिच्छक्ति-विकार॥३३॥ पाँचवाँ अध्याय | २६३
[ ५/३२-३५ ब्रह्मधामका दृष्टान्त :- सूर्य्यमण्डल येन बाहिरे निर्विशेष। भितरे सूर्य्येर रथ-आदि सविशेष ॥ ३४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३२-३४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-['वैकुण्ठ'-शब्दसे 'कृष्णधाम' और 'परव्योम'को समझना चाहिये]। उस परव्योमके बाहर श्रीकृष्णकी अङ्गप्रभाका विस्तार एक ज्योतिर्मय मण्डल बनाता है। उसे 'सिद्धलोक', 'ब्रह्मलोक' आदि कहते हैं। ब्रह्मसायुज्यमुक्तिका वह एकमात्र स्थान है। वह धाम चित्स्वरूप तो है, परन्तु वहाँ चित्-शक्तिगत विकार अर्थात् विचित्रता नहीं है। सूर्य्यमण्डल जैसे बाहरसे निर्विशेष अर्थात् विचित्रतारहित ज्योतिर्मय मात्र है, किन्तु मण्डलके भीतर सूर्य्यके रथादि सविशेष अर्थात् अनेक विचित्रताएँ दिखायी देती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मज्योतिके भीतर वैकुण्ठ सविशेष और विचित्रायुक्त है। सूर्य्यमण्डलके बाहरका अंश ब्रह्मधामके सदृश है॥ ३२-३४॥ श्रीमद्भागवत (७/१/२९) कामाद्द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥ ३५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“बहुत लोगोंने ही भक्तिके समान काम, द्वेष, भय और स्नेहसे अपने मनको आविष्ट करके पापोंका त्याग करते हुए उस गतिको प्राप्त किया है।” अन्य किसी-किसी संस्करणमें यह अतिरिक्त श्लोक (भाः ७/१/३०) भी मिलता है- “कामाद्गोप्या भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः। सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो॥” अर्थात् [नारदजीने युधिष्ठिर महाराजसे कहा]-“गोपियोंने काम (प्रेम) से, कंसादिने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्रादि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने स्नेहयुक्त पारिवारिक सम्बन्धसे, तुम लोगोंने स्नेहसे और हम लोगोंने भक्तिसे अपने मनको भगवान्में लगाया है।”॥ ३५॥ अनुभाष्य-शिशुपाल श्रीकृष्णविद्वेषी होनेपर भी क्यों सायुज्य-मुक्तिके योग्य बना? धर्मराज युधिष्ठिरके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीनारदने कहा, - यथा [विहितया] भक्त्या (सेवनेन) ईश्वरे मनः आवेश्य [तद्गतिं गच्छन्ति], तथा कामाद् [यथा गोप्यः], द्वेषात् [यथा दन्तवक्र-शिशुपालादयः], भयात् [यथा कंसाद्याः], स्नेहात् [यथा पाण्डवाः] [एतादृशः] बहवः तदघं (कामादिनिमित्तं पापं) हित्वा तद्गतिं (मोक्षप्रकारभेदं) गताः (प्राप्ताः)। श्लोक-भावानुवाद-बहुत लोगोंने भक्तिके समान काम (जैसे गोपियोंने), द्वेष (जैसे दन्तवक्र, शिशुपालादिने), भय (जैसे कंसादिने) और स्नेहसे अपने मनको आविष्ट करके (जैसे आप पाण्डवोंने) पापोंका त्याग करते हुए उस (मुक्तिके भेदसे भिन्न-भिन्न) गतिको प्राप्त किया है। श्रीमद्भागवत सातवें-स्कन्धमें युधिष्ठिर महाराजके प्रश्न और श्रीनारदके उत्तरके प्रसङ्गमें ७/१/२२-४६ और ७/३/३०, ३२, ३४ श्लोकोंकी गौड़ीयभाष्यके तथ्यमें विभिन्न टीकाएँ द्रष्टव्य हैं॥ ३५॥ २६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत