भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ५/१३-१७ वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन विष्णु चतुर्व्यूहमें जो सङ्कर्षण रूपसे विराजमान हैं, उन श्रीनित्यानन्दरामकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥१३॥ अप्राकृत-षडैश्वर्ययुक्त 'परव्योम' :- प्रकृतिर पार 'परव्योम'-नामे धाम। कृष्णविग्रह यैछे विभूत्यादि-गुणवान्॥१४॥ ब्रह्म और उसके ऊपरके लोक एवं श्रीकृष्ण तथा उनके अवतारोंके धाम :- सर्वग, अनन्त, ब्रह्म-वैकुण्ठादि धाम। कृष्ण, कृष्ण-अवतारेर ताहाञि विश्राम॥१५॥ परव्योमके ऊपरके लोकोंमें तीन प्रकारके श्रीकृष्णलोक :- ताहार उपरिभागे 'कृष्णलोक' ख्याति। द्वारका-मथुरा-गोकुल-त्रिविधत्वे स्थिति॥१६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१४-१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चौबीस तत्त्वोंसे बने प्राकृत जगत्के ऊपर परव्योम नामसे एक चिन्मय धाम है। वह धाम श्रीकृष्णस्वरूपके समान ही समस्त विभूति आदि गुणोंसे युक्त है। उस धाममें सर्वव्यापी, अनन्त ब्रह्मधाम और वैकुण्ठादि धाम विराजमान हैं। उन समस्त धामोंमें साक्षात् श्रीकृष्ण और उनके सभी अवतार विश्राम (वास) करते हैं। उस धामके ऊपरी एक तिहाई भागमें जो सर्वोत्तम चिन्मयलोक है, उसका नाम 'कृष्णलोक' है। उस कृष्णलोकमें द्वारका, मथुरा और गोकुल नामसे तीन प्रकोष्ठ हैं॥१४-१६॥ अमृताणुकणिका-विभुत्वादि गुण अर्थात् जो सर्वव्यापी, अनन्त और विभु (बृहद्) है। परव्योममें समस्त भगवत्-स्वरूपोंका पृथक्-पृथक् धाम है। प्रत्येक भगवद्धाम ही सच्चिदानन्दमय, सर्वव्यापी, अनन्त और असीम है। परव्योममें अनन्त भगवत्-स्वरूप हैं। श्रीकृष्णके समान उनके धाम भी अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं। इस अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे एक ही परव्योममें असंख्य असीम-धामोंका समावेश सम्भव हुआ है। वस्तुतः स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण जैसे एक होकर भी लीलानुसार अनेक भगवत्-स्वरूपोंमें प्रकट होते हैं और इस कारण उन भगवत्-स्वरूपोंको उनका अंश कहा जाता है, वैसे ही स्वयं-भगवान्‌का धाम वृन्दावन भी स्वरूपतः एक होकर भी विभिन्न भगवत्-स्वरूपोंके धामरूपमें प्रकट होता है और सभी वैकुण्ठादि-धामको भी वृन्दावनका ही अंश कहा जाता है। “वैकुण्ठादि तदंशांशं स्वयं वृन्दावन भुवि" (पद्मपुराण, पातालखण्ड, ३८/९)॥१४-१६॥ सबसे ऊपर स्तरमें व्रज, गोलोक और श्वेतद्वीप :- सर्वोपरि श्रीगोकुल-व्रजलोक-धाम। श्रीगोलोक, श्वेतद्वीप, वृन्दावन नाम॥१७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उस परव्योम-धाममें सबसे ऊपर श्रीगोकुल अर्थात् व्रजलोक धाम, श्रीगोलोक अर्थात् स्वकीयभावयुक्त श्रीकृष्णधाम, श्वेतद्वीप और वृन्दावन हैं॥१७॥ २५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत