भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/१४-१७ ]

अमृतानुकणिका—(अब यहाँ व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णके निज नित्य निवास-स्थानका निरूपण कर रहे हैं) भगवान् श्रीकृष्णका वह गोकुल धाम सहस्रदल कमलके स्वरूपमें सुशोभित है। उसकी विशेषता—वह चिन्तामणि स्वरूप है, भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति वह भी सच्चिदानन्दमय, सर्वव्यापक, विभु और सर्वत्र प्रकाशमान है। उस लोकको सर्वश्रेष्ठ लोक कहा जाता है। उस लोकको यहाँ जो सबसे ऊपर कहा गया है, वह भौगोलिक स्थानके समान ऊपर-नीचे नहीं है। सर्वव्यापी, अनन्त, विभु धामसमूहकी इस प्रकार भौगोलिक स्थानोंके समान ऊपर-नीचे अवस्थिति नहीं हो सकती। महिमाकी अधिकता अथवा न्यूनताके विवेचनसे ऊपर-नीचे कहा गया है। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृतम् (२/५/८७-८८) में लिखा है— “सुखक्रीड़ाविशेषोऽसौ तत्रत्यानाञ्च तस्य च। माधुर्यान्त्यावधिं प्राप्तः सिध्येत्तत्रोचितास्पदे॥ अहो किल तदेवाहं मन्ये भगवतो हरेः। सुगोप्यभगवत्तायाः सर्वसार-प्रकाशनम्॥” अर्थात् “लौकिक बन्धुके समान प्रेमका आधार वह गोलोकधाम ही है। वहाँ श्रीकृष्ण और उनके समस्त परिकरोंके द्वारा परम माधुर्यकी अन्तिम सीमातक पूर्ण रूपसे सुखमय विहार प्रकटित होता है। अहो! अधिक क्या कहूँ! मैंने यही निश्चित किया है कि भगवान् श्रीहरिने अपनी परम गोपनीय भगवत्ताका समस्त सार उस गोलोकमें ही प्रकटित किया है।” इस श्लोककी टीकामें श्रीसनातन गोस्वामीने कहा है—‘अहो' विस्मयके अर्थमें है तथा ‘किल’ शब्द निश्चयके अर्थमें है। मैं निश्चयपूर्वक कह रहा हूँ कि श्रीहरिके रूप-गुण-विनोदादि जो अन्यत्र विशेषरूपसे प्रकाशित नहीं हैं, उस गोलोकमें ही अपनी अन्तिम सीमा तक प्रकाशमान हैं। अथवा उस गोलोकमें ही श्रीभगवान्ने अपनी परम रहस्यपूर्ण भगवत्ताको अर्थात् परम ऐश्वर्यके सर्वश्रेष्ठ सारको प्रकाशित किया है। अन्यथा उस गोलोककी सर्वोच्च स्थिति असङ्गत होती। उसे कुछ लोग महावैकुण्ठ लोक भी कहते हैं। इस विषयमें किसीको कोई शङ्का उपस्थित ना हो, इसके लिये कहा है कि वह गोकुल नामक धाम है, जहाँ गोपावास अर्थात् गोप-गोपियोंका निवास स्थान है। इसी सन्दर्भमें श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धमें कहा है—'भगवान् गोकुलेश्वरः' अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलके ईश्वर, गोकुलपति हैं। भगवान् श्रीकृष्ण जहाँ अपने पिता नन्द महाराज तथा माता यशोदा आदिके साथ सदा निवास करते हैं, ऐसे महान् अन्तःपुरको गोकुल धाम कहा गया है। उसी गोकुल नामक नित्यधामका कर्णिकार ही षट्कोणमयी श्रीकृष्णकी निवास भूमि है। उसके ही भीतर प्रेमानन्द-महानन्द-रसमें मग्न होकर, अखिल जीव-जगत्के अद्वय और अव्यय बीजस्वरूप श्रीश्रीराधाकृष्ण विराज करते हैं। वे अपने अंश-सम्भूत कोटि-कोटि सखी ओर सखागणके द्वारा सदा सहस्ररूपोंमें सेवित और प्रमोदित होते हैं। वहाँ, उस पद्म-कर्णिकाको परिवेष्टित करते हुए किञ्जल्क अर्थात् लाखों पद्मकेशर और सूक्ष्म पँखुड़ियोंके समान श्रीकृष्णके अंशस्वरूप परम प्रेमीभक्त-सजातीय गोपोंकी आवासभूमि है ओर वह प्राचीरकी भाँति चारों ओर सुशोभित हो रही है। वे गोप-गोपीगण सर्वदा श्रीकृष्णसेवामें तत्पर होकर लाखों कामधेनुओं और बछड़ोंके साथ अपने-अपने स्थानमें सदा

पाँचवाँ अध्याय | २५५