श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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आनन्दसे वास करते हैं। उस कमलके विस्तृत दलसमूह ही श्रीकृष्णप्रेयसी श्रीराधा आदि ब्रजाङ्गनाओंके उपवन-स्वरूप धामविशेष हैं। चित्-शक्तिसे प्रकाशित श्रीकृष्णलोक विविध आनन्दमय वैचित्र्य-विकाससे विभिन्न तरु, लता, पत्र, पुष्प, वन, सरोवर, नदी, पर्वत, पशु, पक्षी और पतङ्गादि शोभा-सम्पत्तिसे सुसज्जित होकर श्रीकृष्णका सुखसाधन करता है। परन्तु हमारे इन्द्रिय-ज्ञानके द्वारा गोचर मायिक जगत्की अनित्य शोभा-सौन्दर्यके समान वह सब चित्-वैचित्र्य परिणामी (नश्वर) नहीं है, अपितु अपरिणामी और नित्य नव-सुखप्रद है। वहाँ सभी वस्तुएँ ही चिन्मय, चिद्धर्म-समन्वित हैं और वे सभी सब प्रकारसे अपने नाथ श्रीकृष्णके सेवा-सुखमें रत हैं। श्रीकृष्णके एकात्म-रूप स्वयंप्रकाश श्रीबलदेव ही निजांशसे उस श्रीधाम-स्वरूपमें उनकी सेवा करते हैं। वहाँ कालका प्रवेश नहीं है। अनादि-अनन्त आनन्द-मुहूर्त चिरस्थिर-भावसे श्रीकृष्णसेवामें तन्मय है। वहाँ कभी भी भूत-वर्तमान-भविष्यरूपमें काल विभक्त नहीं है। किन्तु श्रीभगवान्की अचिन्त्य शक्तिसे भूत-वर्तमान-भविष्यकी जो आनन्दके लिये उपयोगिता है, वह श्रीकृष्ण-सुख-साधनकी सहायिका सेविकारूपमें सदा वर्तमान है। वहाँ कुसुम हैं, कुसुममें कीट नहीं हैं। वहाँ चन्द्र-सूर्यादि प्रकाश वितरण नहीं करते, वह चिदानन्दमय स्वप्रकाशित धाम है। ब्रह्मसंहिता (५/५६)— “श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो द्रुमा भूमिचिन्तामणिगणमयी तोयममृतम्। कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखी चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च॥ स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान् निमेषार्द्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः। भजे श्वेतद्वीपं तमहमिह गोलोकमिति यं विदन्तस्ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये॥” अर्थात् “जहाँ अप्राकृत लक्ष्मीगण कान्ताएँ हैं, परमपुरुष श्रीकृष्ण ही एकमात्र कान्त हैं, वृक्षमात्र ही चिन्मय-कल्पतरु हैं, भूमिमात्र ही चिन्तामणि अर्थात् चिन्मय मणियाँ हैं, जलमात्र ही अमृत है, कथामात्र ही संगीत है, गमनमात्र अर्थात् चलना-फिरना ही नृत्य है, वंशी-प्रियसखी है, ज्योति-चिदानन्दमय है, परम-चित्पदार्थमात्र ही आस्वादनीय या भोग्य है, जहाँ करोड़ों-करोड़ों सुरभी-गायोंसे चिन्मय महाक्षीरसमुद्र निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, वहाँ भूत और भविष्यत् रूप कालका खण्डत्व नहीं है—अखण्ड नित्यकाल वर्तमान है। इसलिये वहाँ निमेषार्द्ध काल (पलक झपकनेका आधा काल) भी अतीत नहीं होता। उसी श्वेतद्वीपरूप परमपीठका मैं भजन करता हूँ। उसी धामको इस जगत्में कोई-कोई विरले अल्पसंख्यक साधुजन ही गोलोक नामसे जानते हैं।” उस षट्कोण गोकुलके बाहर अवस्थित चारों ओर श्वेतद्वीप नामका अद्भुत चतुष्कोण युक्त स्थान है। श्वेतद्वीप—चार खण्डोंमें चारों ओरसे विभक्त है। उसके एक-एक भागमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका धाम है। उन चारों धामोंमें—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ हैं और उन पुरुषार्थोंके हेतुस्वरूप मन्त्रमय ऋक्, यजु, साम और अथर्व—ये चारों
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